बावरा मन: सोना, किताबें और निवेश!!

भई त्योहारी मौसम है. हम आपको स्टील की चम्मच, चांदी के सिक्के, बिटकॉइन में निवेश, वाली दुविधा से निकाल, ‘बहुत’ की दुनिया में ले जाना चाहते हैं. भई पैसा सबको अच्छा लगता है. और पैसे वाले तो सबको लुभाते हैं. तो आज अपना ‘वक्त’ निवेश कीजिए दुनिया के सबसे अमीर आदमी पर...

Source: News18Hindi Last updated on: October 16, 2021, 12:17 PM IST
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बावरा मन: सोना, किताबें और निवेश!!

इब्ने बतूता थे. पहन के जूता चले थे. एक ‘बावरा मन’ है, जो लेके कलम चलता है. जिस सदी में चाहे घूम लेता है, जिस इलाके में भी चाहे, पहुंच जाता है. ना पासपोर्ट, ना वीज़ा, ना रोकटोक, ना पूछताछ, ना रेंजर्स ना बीएसएफ. बावरा है, आज़ाद है, बेखौफ है. ख़ैर, आज मिलवाएंगे आपको दुनिया के सबसे अमीर आदमी से. आप पूछेंगे क्यों?


वो इसलिए कि, भई त्योहारी मौसम है. हम आपको स्टील की चम्मच, चांदी के सिक्के, बिटकॉइन में निवेश, वाली दुविधा से निकाल, ‘बहुत’ की दुनिया में ले जाना चाहते हैं. भई पैसा सबको अच्छा लगता है. और पैसे वाले तो सबको लुभाते हैं. तो आज अपना ‘वक्त’ निवेश कीजिए दुनिया के सबसे अमीर आदमी पर…


आप पूछेंगे, जेफ़ बेज़ोज़ ??


ना भाई ना, जेफ़ बेज़ोज़ नहीं. मानसा मूसा. माना जाता है कि मानसा मूसा आज तक के दुनिया के इतिहास का सबसे अमीर व्यक्ति था. अगर जेफ़ बेज़ोज़, डॉलर 131 बिलियन की संपति का मालिक है तो मानसा मूसा डॉलर 400 बिलियन की संपति का मालिक हुआ करता था.


बात करते हैं आज अफ्रीका के सबसे अमीर, सबसे ताकतवर, सबसे बड़े साम्राज्य के शासक, मानसा मूसा की. वो मानसा मूसा जिसको इतिहासकार, नेपोलियन, सिकंदर और जूलियस सीज़र की श्रेणी में रखते हैं.


मानसा मूसा का साम्राज्य

बॉब मार्ले के ‘अफ्रीका यूनाइट’ गाना गाने से तकरीबन साढ़े छै सौ साल पहले, अफ्रीका को एक बड़े एकल रूप में देखने का ख्वाब बॉब मार्ले से कहीं पहले, मानसा मूसा ने भी देखा था. पश्चिम अफ्रीका के 24 बड़े शहरों पर 25 साल तक उसकी लगातार हुकूमत रही. ये उस समय की बात है जब आज के मोरीतेंनिया, चैद, नाइजर, नाइजीरिया, गैमबिया, गिनी, सेनेगल, बुर्किना फासो आदि देश भी, मानसा मूसा के इस वृहद माली साम्राज्य का हिस्सा बने थे. सहारा रेगिस्तान का एक बड़ा हिस्सा उसके इस साम्राज्य में शामिल था.


मानसा मूसा, मध्यकाल का जेफ़ बेज़ोज़

साम्राज्य तो खड़ा कर लिया था पर मानसा मूसा पहली बार दुनिया भर में आकर्षण का केंद्र तब बना जब उसने, अपनी मक्का यात्रा की.


… उसके लाव लश्कर में ज़री और रेशम पहने 60,000 लोग और 12000 गुलाम शामिल थे. हर गुलाम तकरीबन दो किलो की सोने की छड़ उठा कर चला करता था.


…उसके इस काफिले में 80 ऊंठ थे. प्रत्येक ऊंठ 23 से 136 किलो गोल्ड डस्ट उठा कर चलता था.


…मूसा रास्ते में जो गरीब गुरबा मिलता, उसे सोना दान करता.


…अपनी इस यात्रा में वो जिस भी शहर से निकलता वहां इतना सोना देता कि वहां एक मस्जिद बन जाती.


…कहते हैं वो हर शुक्रवार एक नई मस्जिद की नींव रखता था.


… इस मक्का यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था मिस्र. मानसा मूसा के साथ चल रहे लाव लश्कर ने काहिरा में इतना सोना खर्च किया, कि मिस्र की अपनी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई और अगले 12 साल तक मिस्र की अर्थव्यवस्था इस से उबर नहीं पाई थी.


…अभी तक मिस्र, सोने का सबसे बड़ा बाज़ार हुआ करता था लेकिन इस यात्रा ने इस खेल को बिगाड़ दिया. अब दुनिया में सोने का रेट तय करने वाला व्यक्ति ‘मानसा मूसा’ बन चुका था.


…मानसा मूसा ने ‘सोने और नमक’ का व्यापार कर के, यूरोपीय बाज़ार को भी अंगूठा दिखा दिया था.


…नाइजर नदी और अटलांटिक महासागर का साहिल, जिसके साम्राज्य और उसके व्यापार के लिए, रीड़ की हड्डी साबित हुए थे.


… सारे यूरोपियन शासक उसके वैभव को देख, आश्चर्य और ईर्ष्या से भर गए थे.


…यही नहीं, यूरोप से छपने वाले बेहद प्रतिष्ठित, कैटलन मानचित्र में भी मानसा मूसा ने जगह बना ली थी.


ख़ैर, मन तो कर रहा है इन पे फिल्म बना दूं. पर क्या है ना, जिसका काम वही कर साजे, सुन रखा है. इसलिए ध्यान मटर पनीर यानि कलम पर ही रखना, बेहतर होगा. वैसे सच पूछिए तो वो इब्न बतूता की कलम ही थी जिसने इस माली साम्राज्य की गाथा इतिहास में दर्ज करवाई है.


मस्जिद, मदरसे, विश्वविद्यालय

ख़ैर, मानसा मूसा ने ना सिर्फ़ अपने साम्राज्य को एक बड़ा विस्तार दिया, बल्कि उसने अपने साम्राज्य को एक सुरक्षा भाव भी दिया. ये सुरक्षा भाव यात्रियों, व्यापारियों और विद्वानों के पनपने, फलने फूलने के लिए एक सकारात्मक और सांस्कृतिक माहौल बनाने में कामयाब हुआ.


उस वक्त की किताबें, अभिलेख, मस्जिदें, पुस्तकालय, मदरसे, विश्वविद्यालय उस दौर की उदार सोच को दर्शाती हैं. और शायद यही कारण है कि ये सारी निशानियां आज के दौर में धार्मिक कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं. यूनेस्को के लिए इन धरोहरों को आज बचा पाना अपनेआप में एक बड़ी चुनौती का काम है.


टिंबकटू विश्वविद्यालय





मानसा मूसा ने शिक्षा और अध्य्यन पर बड़ी पूंजी का निवेश किया. उसके शासन काल में टिंबकटू शहर में सैनकोर, जिंनगिराबेयर और सीदी याहया जैसे तीन बड़े उच्च शिक्षा के मदरसे/शैक्षणिक संस्थान बनाए गए. इन संस्थानों में विज्ञान, गणित, धर्म, दर्शन के विद्वान पढ़ाया करते थे. पूरी इस्लामिक दुनिया के लिए ये क्षेत्र और ये संस्थान, उच्च शिक्षा के लिए मशहूर हो गए. इन तीनों संस्थानों को मिला कर टिंबकटू विश्वविद्यालय बन गया. और 1988 में इस अद्भुत शहर को यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज सिटी घोषित कर दिया गया.


टिंबकटू और किताबें

टिंबकटू के लोगों में गज़ब का किताब प्रेम था. दुनिया भर से किताबें यहां लाई जाती थीं. सिर्फ़ पुस्तकालयों में ही नहीं, घर घर में किताबों, अभिलेखों को सहेज के रखने की लोगों में यहां आदत हो गई थी. इस शहर को सिटी ऑफ स्कॉलर्स कहा जाता था. सैनकोर  के पुस्तकालय में सात लाख पुस्तकें और अभिलेख रखे हुए थे. माना जाता है कि एक समय में सैनकोर में 25000 विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था थी और पूरी इस्लामिक दुनिया के अमीर घरों के बच्चे यहां पढ़ने आते थे.


मज़े की बात तो ये है कि मानसा मूसा इस्लाम मानने वाला शासक ज़रूर था परंतु उसने अपने द्वारा जीते हुए नए इलाकों पर कभी अपना धर्म थोपा नहीं था.


इब्न बतूता का माली विवरण

मोरक्कन यात्री इब्न बतूता ने अपने जीवन की आखरी यात्राओं में से एक यात्रा, माली साम्राज्य की, की थी.


यात्री इब्न बतूता, माली साम्राज्य के उदार रूप का जिक्र अपनी यात्रा संस्मरण में करते हैं. बकौल इब्न बतूता, यहां की महिलाए पर्दा नहीं करतीं थीं. यहां मर्द औरत घुल मिल कर रहते थे. वो लिखते हैं कि संगीत और नृत्य के प्रति यहां के लोगों का जुड़ाव था. इब्न बतूता यहां के न्यायप्रिय और शांतिपसंद राजा और प्रजा दोनों से बहुत प्रभावित थे.


इब्न बतूता लिखते हैं, ‘यहां के लोग हिंसा से कोसों दूर हैं. और बस यही विडंबना है.


विडंबनाअब विडंबना देखिए, जिस मध्यकालीन साम्राज्य में इतनी शांति थी, इतनी खुशहाली थी, इतनी उदारता थी, आज वहीं धार्मिक कट्टरवाद अपना दमनकारी रूप दिखा रहा है.


जिस इलाके में किताबों की इतनी बड़ी धरोहर थी, आज कट्टरपंथी व्यापक तरीके से उन्हीं किताबों को लूटने, जलाने का काम कर रहे हैं.


जिस साम्राज्य में कभी सोने का व्यापार होता था, आज गोलियों की रासलीला होती है.


जिस मध्यकालीन इस्लामिक साम्राज्य में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित थीं, धार्मिक कट्टरवाद ने उन्हें भी परदे के पीछे जाने को मजबूर कर दिया है.


चलते चलते

इसीलिए कहते हैं, किताबे पढ़नी चाहिएं. इतिहास और समाज शास्त्र की जानकारी लेनी चाहिए. किताबों से सबक मिलता है. हर दौर की मजबूरियां और विडंबनाएं साफ़ समझ आती हैं. चश्में के शीशे पर से धुंधलका, साफ़ होता  है. सोने में, बिटकॉइन में, निवेश से ज़्यादा फायदेमंद किताबों में निवेश है.


कुछ पढ़ के सो,

कुछ लिख के सो,

जिस जगह जागा तू सबेरे,

उससे आगे बढ़ के सो…!


आज बावरा मन, मानसा मूसा की अमीरी से, उसके सोने से प्रभावित नहीं है. वो तो इस बात से प्रभावित है… कि मानसा मूसा ने किस तरह पश्चिमी अफ्रीका में एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जिस साम्राज्य ने व्यापार तो सोने का किया, पर निवेश किताबों में किया. जिसने दुनिया को तो नमक बेचा, पर अपने पुस्तकालयों के लिए किताबें खरीदवायीं.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: October 16, 2021, 12:17 PM IST
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