बावरा मन: मुहर्रम और हम❣

हमारा देश तो विभिन्न आस्थाओं का देश है. मिलिजुली संस्कृति के ऐसे नमूने देश में हर प्रांत, हर जिले और हर शहर में मौजूद होंगे. धार्मिक सहिष्णुता और सह-अस्तित्व ही हमारे समाज के मुख्य स्तंभ हैं और यह स्तंभ और मजबूत हो, इसकी कोशिश हमें जारी रखनी चाहिए…

Source: News18Hindi Last updated on: August 14, 2021, 6:00 am IST
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बावरा मन: मुहर्रम और हम❣

 



इस क़दर रोया हूँ सुनकर दास्ताने कर्बला।

मैं तो हिन्दू ही रहाआँखें हुसैनी हो गईं।।


                                               (स्व० माथुर लखनवी)


हुसैनी आंखें रखने वाले अकेले लखनऊ के माथुर साहब ही नहीं थे. हुसैनी आंखें और दिल रखने वालों में बहुत से हिन्दू नाम और भी हैं. इनमें कुछ नाम “खास” हिंदुओं के हैं और बहुत से नाम “आम” हिंदुओं के हैं.


आम वाले नाम

दरअसल, हमारा देश भी ना अजब गजब का मिला जुला है. ये बात मुझे उस दिन कन्फर्म हो गई, जब ऑफिस के 30% स्टॉफ ने बारी-बारी से अपनी छुट्टी की अर्जी लगाई. बात बलरामपुर की है. फैजाबाद और गोंडा के बीच बसा ये पूर्वी उत्तर प्रदेश का छोटा सा ज़िला है. पोस्टिंग हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे कि मुहर्रम का त्योहार आ गया था. पूछने पर मालूम पड़ा कि सबको ताजिया निकालना है.


अब महेश, राजकुमार, श्यामसुंदर ताजिया निकालेंगे, ये बात कुछ हजम नहीं हुई. छोटा शहर था, एक ही बड़ा जुलूस शहर के बीचों बीच से निकलता था. इसलिए अपनी आंखों से महेश, राजकुमार, श्यामसुंदर को ठेलों पर सजे ताजिए निकालते देखा. और ये देख दिल्ली की “इस लड़की” के बावरे मन में बार-बार ये विचार उमड़ घुमड़ कर आया कि, ऐसा कैसे?


अभी तक के जीवन में तो हमने सिर्फ़ यही सुन रखा था कि शाहरुख खान और रज़ा मुराद ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत रामलीला से की थी. पर ये मुहर्रम में ताजिया निकालने का मामला मेरे लिए ज़रा हट के वाला निकला. ख़ैर, थोड़ा और जानकारी ली तो मालूम चला कि लखनऊ और उस से आगे  पूरब के जिलों में ये प्रथा सदियों से चली आ रही है. मन्नत मांगिए और जब इच्छा पूरी हो जाए तो ताजिया निकालिए.


हुसैनी आंखों वाले लखनऊवा

ख़ैर, लखनऊ की बात करें, तो यहां भी हुसैनी आंखें और हुसैनी दिल रखने वाले हिन्दुओं की कमी नहीं. इसी शहर में कुछ हिंदू हैं जिन्हें मोहर्रम की मजलिसें पढ़ने से ही फुर्सत नहीं. हमारे खास मित्र हिमांशु बाजपाई जी की भी मर्सिया पढ़ने वालों में गिनती होती है. और इसी बात के लिए हमें उन पर और उनके शहर लखनऊ पर नाज़ है, क्योंकि इसी लखनऊ की धरती पर हमने नवरात्रि के नौ दिन, बहुत से मुस्लिम दोस्तों को शाकाहारी होते देखा है.


यूपी के बाहर वाले हुसैनी

लेकिन, बात यूपी तक ही सीमित क्यों रहे. सुनते तो हैं कि झारखंड के गिरीडीह और बिहार के नवादा में कुछ गांव ऐसे हैं जहां हिंदुओं द्वारा मुहर्रम आज भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है. मुहर्रम का ताजिया यहां हिंदू परिवार पीढ़ियों से लगाते आ रहे हैं. पीढ़ियां गुज़र गईं हैं, पर पूर्वजों की देन, यानि मोहर्रम मनाने का रिवाज़, आज भी चला आ रहा है. वो भी पूरी शिद्दत के साथ. चांद दिखते ही मुहर्रम के समय यहां की महिलाएं श्रृंगार बंद कर देती हैं.



गांव के सभी नवयुवक जो महानगरों में रोजगार करते हैं, वो भी मुहर्रम मनाने के लिए अपने घर पहुंचते हैं. अपनी मन्नतें पूरी करने के लिए कई कर्बलों में जाकर हाजरी लगाते हैं. मान्यता है कि ये रिवायत बंद हो गई, तो गांव पर कोई आफत आ सकती है इसलिए गांव में मुहर्रम का ताजिया लगना कभी बंद नहीं हो सकता.


भाई, आस्था बड़ी चीज़ है और फिर हमारा देश तो विभिन्न आस्थाओं का देश है. मैंने जो दिए, वो चंद उदाहरण हैं. मुझे यकीन है कि मिलिजुली संस्कृति के ऐसे नमूने देश में हर प्रांत, हर जिले और हर शहर में मौजूद होंगे. धार्मिक सहिष्णुता और सहअस्तित्व ही हमारे समाज के मुख्य स्तंभ हैं और यह स्तंभ और मजबूत हो, इसकी कोशिश हमें जारी रखनी चाहिए


पंजाब के हुसैनी ब्राह्मण

अब एक खास नाम का ज़िक्र. हिंदी सिनेमा का एक खास नाम है, सुनील दत्त साब. बहुत कम लोग जानते हैं कि सुनील दत्त साब के पूर्वजों ने कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन का साथ दिया था. कैसे? वो भी बताती हूं…



बचपन में मैंने “अदे हिंदू और अदे मुसलमान” वाली बात अपनी पंजाबी नानी से सुनी थी. मेरी रावलपिंडी की ब्राह्मण नानी, कर्बला की लड़ाई का ज़िक्र किया करती थीं. “या हसन, या हुसैन” का ज़िक्र कर उनकी आंखें उसी तरह गीली होती थीं जैसे, गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों की शहादत को याद कर होती थीं.या हसन या हुसैन भी उन्ही से सुना था और “निक्कियां जिंदां, वड्डे साके भी वही कहा करती थीं.


दरअसल, रावलपिंडी/लाहौर के ब्राह्मणों में से कुछ का जबरदस्त हुसैनी कनेक्शन है. “मोहियाल ब्राह्मणों के एक समुदाय को हुसैनी ब्राह्मण भी कहा जाता है. मुहम्मद साहब के शासनकाल में राजा राहिब सिद्ध दत्त एक खास नाम हुआ करता था. राहिब दत्त, महाभारत युद्ध वाले अश्वत्थामा के वंशज माने जाते हैं. निःसंतान होने के कारण राहिब दत्त, पैगंबर साहेब के दर पर संतान का आशीर्वाद मांगने गए.


वहां पता चला कि इनके भाग्य में संतान का सुख है ही नहीं. निराश राहिब दत्त को मुहम्मद साहब ने 7 पुत्र होने का आशीर्वाद दिया. आशीर्वाद काम कर गया और सिद्ध दत्त 7 पुत्रों के पिता बने. लेकिन इनके जीवन काल में ही ये सातों पुत्र हुसैन के लिए अपना बलिदान दे गए.


कर्बला की जंग में पैगंबर साहेब के नाती, इमाम हुसैन की शहादत के बारे में जब राहिब दत्त को पता चला तो वो उनका बदला लेने चल पड़े. इमाम हुसैन के सिर की मर्यादा रखने के लिए इन्होंने अपने सातों बेटों के सिर का बलिदान दे दिया. उन्होंने हुसैन के कातिलों से जमकर जंग की. कर्बला की इस जंग में भाग लेने के कारण, दत्त मोहयाल ब्राह्मण, हुसैनी ब्राह्मण कहलाने लगे. इसलिए आज भी दत्त ब्राह्मण, कर्बला की लड़ाई में शहीद हुए अपने पूर्वजों के गम में मोहर्रम मनाते हैं.


सुनील दत्त साब को “अमन की आशा” वाली घुट्टी, अपने पूर्वज राहिब दत्त से ही मिली थी. वो राहिब दत्त जिनके लिए मशहूर था…



वाह दत्त सुल्तान, हिंदू का धर्म, मुसलमान का ईमानऔर

दत्त सुल्तान, ना हिंदू ना मुसलमान.


अपने धर्म में रह कर, किसी और के धर्म में भी आस्था रखना, यही हमारी गंगा जमुनी तहज़ीब है, यही हमारी पूंजी भी है. भारत की इस समावेशिय आत्मा को समझेंगे तभी तो “मोहर्रम में हम” को ढूंढ पाएंगे.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: August 14, 2021, 6:00 am IST
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