बावरा मन: साहिर... नाराज़, नादान, खुद्दार, खुदमुख्तार, अड़ियल, प्यासा और प्यारा शायर!

Tribute to SAHIR Ludhianvi: जितना साहिर ने दुनिया को लौटाया, उनके चाहने वालों ने उतना ही उन पर प्यार लुटाया. इधर वो तजुर्बे लौटाते, चाहने वाले उन पर बेशुमार प्यार लुटाते. ये दो तरफा प्रेम था. लेकिन साहिर को मालूम था दुनिया में बस दो ही चीजें उनकी अपनी हैं. एक उनकी तल्ख़ियां और दूसरी उनकी मां.

Source: News18Hindi Last updated on: October 25, 2020, 5:46 AM IST
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बावरा मन: साहिर... नाराज़, नादान, खुद्दार, खुदमुख्तार, अड़ियल, प्यासा और प्यारा शायर!
साहिर 25 oct 1980 को इस दुनिया से उनसठ साल की उम्र में विदा हो गए थे.
साहिर ने कहा था
"दुनिया ने तजुर्बातो हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है, लौटा रहा हूँ मैं."

जितना उन्होंने दुनिया को लौटाया, उनके चाहने वालों ने उतना ही उन पर प्यार लुटाया. इधर वो तजुर्बे लौटाते, चाहने वाले उन पर बेशुमार प्यार लुटाते. ये दो तरफा प्रेम था.
लेकिन साहिर को मालूम था दुनिया में बस दो ही चीजें उनकी अपनी हैं.
एक उनकी तल्ख़ियां और दूसरी उनकी मां.

जो जानते हैं, वो दोस्त मुझसे अक्सर पूछते हैं, ऐसा क्या था उनमें जो तुम्हें वो इतना पसंद हैं? मेरे ख्याल से दुनिया में शायद सबसे मुश्किल काम है, उस शख्स के बारे में बयां करना, जिसे आप बहुत बहुत बहुत चाहते हैं. और मैं उन्हें बहुत चाहती हूं. वो, जो इतनी शोहरत के बावजूद प्यासा था. वो, जो अपने करियर की बुलंदी पे भी बेपरवाह था. नाराज़ था. नादान भी था. खुद्दार था, खुदमुख्तार भी था. अड़ियल था, कमज़ोर भी था. इसलिए मुझे पसन्द ही नहीं, मुझे उस से बहुत प्यार था. जबकि 25 oct 1980 को जब साहिर इस दुनिया से उनसठ साल की उम्र में गए, हम उस बच्चे की उम्र के थे, जिसे उनके होने या ना होने का भी आभास ना था.तो फिर ये जादू कैसे हुआ?

देखिए, इतना ज़रूर था कि जब कुछ बड़े हुए, कुछ नए अनुभव हुए. जब सिनेमा हॉबी बन गया. जब गुरुदत्त समझ में आने लगे. प्यासा का कल्ट स्टेटस मुझे छू गया. जानने लगी थी कि प्यासा जितनी गुरुदत्त की थी, उतनी ही वो साहिर की थी. लेकिन साहिर से असली प्यार तब हुआ, जब जीवन में AIR हुआ. जब FM पर पहली बार साहिर पर शो किया.

फिर क्या था!
पहले उनके बारे में पढ़ा.
फिर उनको पढ़ा.
और फिर, कुछ और जानने कि प्यास, प्यार में बदल गई.

And this was love at first go...
मुझे उनका 8 साल की उम्र में पिता की बजाय "मां" को चुनना पसंद था. मुझे उनका लाहौर से लौट के आना और "हिन्दुस्तान" की आज़ाद फिज़ा को चुनना, पसंद था. मुझे उनका खानदानी रईस होने के बावजूद भी (मां के साथ) तप तप के संघर्ष का दामन चुनना पसन्द था. मुझे उनका विरासत/ जायदाद को ठुकराना पर एक रुपए के लिए लता जी के सामने अड़ कर खड़ा हो जाना, पसन्द था. मुझे उनका बुलंदियों पर रह के भी मिट्टी से जुड़ा होना पसंद था.

खैर उनके जीवन, उनके काम पर मैं एक पूरी थीसिस लिख सकती हूं. मुझे उनकी रचनाओं में वो साहित्यिक ऊचायीं और गहराई, दोनों दिखती हैं, जो उन्हें गीतकार के तौर पर भी और शायर के तौर पे भी मुकम्मल बनाती है. लेकिन बात बस आज एक गीत की...

वो एक गीत
लेकिन आज मैं सिर्फ और सिर्फ उनकी एक ही नज़्म की बात करना चाहती हूं. साहिर की एक मशहूर नज़्म है, जो फिल्म "कभी कभी" में आप मुकेश साहब की आवाज़ में अमिताभ बच्चन को गाते सुनते हैं.

मैं पल दो पल का शायर हूं
मुझसे पहले कितने शायर
आए और आकर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए
कुछ नग़मे गाकर चले गए
वो भी एक पल का किस्सा थे
मैं भी एक पल का किस्सा हूँ
कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा
वो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ
मैं पल दो पल का...

कल और आएंगे नग़मों की
खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझसे बेहतर कहने वाले
तुमसे बेहतर सुनने वाले
कल कोई मुझको याद करे
क्यूँ कोई मुझको याद करे
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिये
क्यूँ वक़्त अपना बरबाद करे
मैं पल दो पल का…

ये नज़्म, आज भारत के ही नहीं, दुनिया भर के सिकंदरों को एक सन्देश देती है. और सिर्फ सिकंदरों को ही क्यों, सिकंदर बनने के ख़्वाब देखने वालों के लिए भी ये नज़्म एक आईना है. ग़ज़ब की बात तो ये है कि शोहरत की बुलंदी पे भी साहिर को "अपने से बेहतर" किसी और के होने का एहसास होता था. उस से भी बड़ी बात ये है कि, इस एहसास से उन्हें इनसिक्युरिटी भी नहीं होती है.

उनके इस "अपने से भी किसी और के बेहतर" होने के एहसास के आभास के कारण, मैं उन्हें प्यार करती हूं. जो इन्सान अपने को ही full stop ना मानता हो, आज ऐसा इंसान कितना कम दिखता है. अपने होने का एहसास तो सबको होता है, अपने ना होने का एहसास और फिर उसका मलाल भी ना होना, ये कोई साहिर ही कर पाता है. इसलिए, बस साहिर से ही प्यार हो पाता है.

साहिर जब कहते हैं कि,
"वो भी एक पल का किस्सा थे, मैं भी एक पल का किस्सा हूं", तो उनका इस तरह से अपने को "गुज़रा हुआ" मान पाना, अपने को जीते जी, बीता सिकंदर समझ पाना, उन्हें एक अलग पंक्ति में खड़ा करता है. ये कोई बहुत पहुंचा हुआ इन्सान ही कर पाता है. यहां मानो साहिर, गुज़रे हुए सिकंदरों को भी अपनी tribute दे रहे हों. जैसे उनसे कह रहे हों, " घबराओ नहीं, ये जो आज तुम्हें नहीं पूछ रहे, मुझे पूछ रहे हैं, ये कल मुझे भी नहीं पूछेंगे. मैं भी जल्दी आपके पास आ कर, आपके साथ बैठूंगा और आपके साथ बैठ कर आने वाले सिकंदरों को देखूंगा".

क्षणभंगुरता
फिल्म कभी कभी,साहिर के जीवन की एक कामयाब फिल्म साबित हुई. जब ये गीत साहिर ने लिखा होगा, उन्हें नहीं मालूम रहा होगा, कि उनके जाने के बाद उनके शायर होने को इसी नज़्म से ज़िंदा रखा जायेगा.

आज साहिर ज़िंदा होते, जुहू के उस कब्रिस्तान में जाते जहां उन्हें दफ़नाया गया था, जहां उनकी कब्र थी, जिसके बगल में उनकी प्यारी मां की भी क़ब्र थी. उन्हें अपनी लापता/ गायब क़ब्र देख, ज़रा मलाल ना होता. साहिर को वैसे भी अपने पीछे कौन से "TajMahal" खड़े करने थे. उन्हें तो बस मेरे दिल पे राज करना था. बताइए...
कौन है ऐसा ज़माने में जिसे ताज महल पसंद ना हो. वो ताज जिसके लिए साहिर कहते हैं…

"ये चमनज़ार, ये जमुना का किनारा, ये महल,
ये मुनक़्क़श दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़

मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से!"

जी, चूंकि साहिर को महलों और ताजों से प्यार नहीं था, बस इसीलिए मेरे बावरे मन को उनसे प्यार था. धन्यवाद!
(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: October 25, 2020, 5:45 AM IST
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