संगम अंकल की सेवईं

असीम को "संगम अंकल" के यहां की सेवईयां बचपन से बहुत पसंद थीं। बड़े हुए, खुद नौकरी में आए तो...

Source: News18Hindi Last updated on: May 26, 2020, 12:22 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
संगम अंकल की सेवईं
(प्रतीकात्मक फोटो)
असीम को "संगम अंकल" के यहां की सेवईयां बचपन से बहुत पसंद थीं। बड़े हुए, खुद नौकरी में आए तो जहां भी पोस्टिंग रहती, पापा-मम्मी "संगम अंकल" के यहां से आई सेवईं, असीम तक ज़रूर पहुंचवाते। दिल्ली तक यह सेवईयां "लखनऊ मेल" से सफर तय करके पहुंचती थीं। फिर हफ़्ता भर मलाई में मिला मिला कर चाव से खाई जाती। क्या मजाल कि यह सेवईं किसी और के संग शेयर की जाती। "असीम बड़प्पन" के मालिक असीम, इस सेवईं के कारण, तंग दिल बचपन्ने में चले जाते।

फिर एक बार खबर आई कि "संगम अंकल" अल्लाह को प्यारे हो गए हैं।.…अंकल चले गए पर सेवईयां तब भी बादस्तूर आती रहीं। "संगम अंकल" के सबसे छोटे बेटे नौशाद भाई ने अब यह ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले रखी थी। ईद आती, नौशाद भाई ईद की नमाज़ अदा करते, फिर अपनी अम्मी के हाथ की बनी सेवईयां ले निकल पड़ते हमारे घर की ओर। उन्हें हमारे घर सेवईयां पहुंचाने की कोई जुनूनी जल्दी रहती थी। लगता था शायद हमें जब तक खिला ना लें, खुद खा नहीं पाएंगे।

खैर, नौशाद भैया की भी अपनी एक ख़ासियत है। बात नहीं कर पाते हैं। कम बोलते हैं। दिल में जितने जज़्बात हों, लब तक कभी नहीं आते। जो पूछ लो, जितना पूछ लो, बस उतना ही बताते हैं। निहायत सीधे सच्चे सरल इंसान हैं। कभी-कभी लगता है, इस जमाने में ऐसे भी लोग हैं क्या?

नौशाद भाई ने लेट शादी की। उन्हें एक ही लगन थी अपनी अम्मी को हज करवाने की। 2 साल पहले सीमित साधनों में, किसी तरह अपनी मां को हज करवा ही लाए। अपने दिल की मुराद पूरी कर ही ली। लेकिन क्या है ना, वापिस आते ही सबसे पहला जो काम किया वह था हमारे यहां आने का। हमारे यहां सौगात लेकर आये। उनका असीम प्रेम, असीम के लिए देख दिल भर आता है।
 कल जब ईद का चांद निकला, तो लगा यह पहली ईद होगी जब "संगम अंकल" के यहां की सेवईयां हमें नसीब नहीं होंगी। और फिर हमने तुरंत भैया को फोन मिलाया कहा हम आ रहे हैं। करोना काल में यह मुलाकात बाहर मेन रोड पर ही हुई। ना गले लगे ना ज्यादा बात की। हमारे सारे जज़्बात भैया उसी तरह समझ गए जैसे बरसों से हम उनके समझ रहे थे। खामोशी से। लॉक डाउन की वजह से आज हमें पहली बार "संगम अंकल" की सेवईं नसीब नहीं हुई पर नौशाद भैया की ईद अच्छी रही होगी हमें यकीन है। 2020 की यह सड़क वाली ईद मिलाई हमें हमेशा याद रहेगी।

दरअसल IT चौराहे पर "संगम टेलर" नाम से अंकल की  दुकान हुआ करती थी। यहां पर जेंट्स कपड़े सिला करते थे। पापा और अंकल में दोस्ती हो गई थी। घर के से तालुकात हो गए थे। पापा असली नाम से बुलाते थे पर छोटे बच्चे असीम के लिए वो बचपन वाले "संगम अंकल" जीवन भर के "संगम अंकल" होकर रह गए थे। संगम अंकल ने ही असीम की शादी का सूट सिला। बाद सालों में भी पापा, अंकल से हमारे बच्चों के पठान सूट बनवा बनवा कर भेजते रहे। एक ही थान से असीम, अर्जुन और अमन के पठान सूट बनते थे। यही पठान सूट पहन के हम जिस भी शहर में रहे, हमारी ईद मनती थी।

रेडीमेड के ज़माने में अब सभी भाई बड़ी ब्रांड के कपड़े सिलते हैं। दिल्ली, मुंबई चले गए हैं। सिर्फ नौशाद भाई ही लखनऊ में हैं। अपनी अम्मी का प्रेम और लखनऊ की अपनाइयत उन्हें कहीं और जाने ही नहीं देती। जितने सीधे, सरल और सच्चे हैं शायद किसी और शहर में उनका गुज़र है भी नहीं। हमारे बच्चों के लिए अब नौशाद भाई ही "संगम अंकल" हो गए हैं।
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: May 26, 2020, 11:32 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading