बावरा मन: ताज वक्त से पहले नहीं, किस्मत से ज़्यादा नहीं

ब्रिटिश शाही परिवार के सदस्य यूं तो अपने देश के एक आम नागरिक की तरह ही वोटिंग का अधिकार भी रखते हैं और प्रेम करने का भी, लेकिन दोनों ही मामलों में आम नागरिक के विपरीत इनके हाथ ज़रा तंग रहते हैं. जीवन में आज भी कुछ बन्धन ऐसे हैं, जिन्हें तोड़ पाना उनके लिए ज़रा मुश्किल रहता है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 26, 2020, 8:46 AM IST
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बावरा मन: ताज वक्त से पहले नहीं, किस्मत से ज़्यादा नहीं
प्रिंस हैरी और मेगन मार्कल की फाइल फोटो (रॉयटर्स)
प्रिंस हैरी और उनकी अमेरिकन पत्नी मेगन मार्कल फिर खबरों में हैं. दोनों ने हाल ही में अमेरिका के लोगों को इलेक्शन में वोट करने का एक आवाहन किया. प्रिंस हैरी खुद अमेरिका में वोट नहीं कर सकते हैं और ना ही उन्होंने कभी अपने देश इंग्लैंड में इससे पहले कभी वोट किया है. पर शायद यही कारण है कि वो वोट की अहमियत को समझते हैं. दरअसल ब्रिटिश शाही परिवार के सदस्यों को यूं तो अपने देश में किसी भी और नागरिक की तरह वोट करने का हक है, परंतु वो किसी भी इलेक्शन में कभी वोट नहीं करते हैं. उनका मानना है कि शाही परिवार को पार्टीबाज़ी से दूर रहना चाहिए. उन्हें पॉलिटिकली न्यूट्रल होना भी चाहिए और पॉलिटिकली न्यूट्रल दिखना भी चाहिए.

वोटिंग के मामले में भी और प्यार के मामले में भी, क्या करना है और कैसा दिखना है, शाही परिवार को इसका बहुत ध्यान रखना पड़ता है. सख्त प्रोटोकॉल मानने पड़ते हैं. ब्रिटिश शाही परिवार के सदस्य यूं तो अपने देश के एक आम नागरिक की तरह ही वोटिंग का अधिकार भी रखते हैं और प्रेम करने का भी, लेकिन दोनों ही मामलों में आम नागरिक के विपरीत इनके हाथ ज़रा तंग रहते हैं. जीवन में आज भी कुछ बन्धन ऐसे हैं, जिन्हें तोड़ पाना उनके लिए ज़रा मुश्किल रहता है. जिन हालातों में हैरी और मेगन को देश छोड़ कर जाना पड़ा, वो उन्हीं बंधनों का ही नतीजा था. खैर, हैरी और मेगन की आज की ज़िन्दगी येे बताती है कि शाही परिवार का एक राजकुमार आज भी कैसे राजशाही के नियमों के विरुद्ध जब किसी आम लड़की से शादी करता है, तो उसे उसका दंश झेलना ही पड़ता है.

दंश झेलने वाले और एक अमेरिकी लड़की से प्रेम करने वाले, हैरी पहले राजकुमार नहीं हैं. ब्रिटिश राज परिवार ने अपने इतिहास में ऐसे पल पहले भी देखे हैं. प्रेम प्रसंग के कारण संवैधानिक संकट तक की स्थिति का, राजपरिवार ने सामना किया है. प्रिंस हैरी को मेगन से शादी करने के लिए कोई बड़े त्याग नहीं करने पड़े पर उनके एक पूर्वज एडवर्ड अष्टम को प्रेम में तख़्त और ताज, दोनों से ही हाथ धोना पड़ा था.

एडवर्ड अष्टम
प्रिंस हैरी की दादी, महारानी एलिज़ाबेथ, इतिहास में सबसे लंबे समय तक बनी रहने वाली ब्रिटिश साम्राज्ञी बन गईं हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वो लक बाई चांस से साम्राज्ञी बनीं थीं. उनका सम्राज्ञी बनना अपने आप में एक किस्मत का खेल था. ब्रिटिश साम्राज्य का ताज नियति ने उनके सर रखा था. ये शायद उनकी ही नियति थी या फिर कहें कि उनके हाथ की लकीरें ऐसी थीं कि उनको तो ब्रिटिश साम्राज्य पर अब तक की सबसे लंबी हुकूमत करनी ही थी. इस का ज़रिया भर बना, उनके ताऊ जी, एडवर्ड अष्टम का प्यार, वो भी एक अमेरिकन डबल डिवोर्सी से.

दरअसल, जॉर्ज पंचम के बाद उनके पुत्र एडवर्ड अष्टम ब्रिटिश साम्राज्य के सम्राट बने थे. एडवर्ड अष्टम, ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे कम समय तक राज करने वाले सम्राट रहे. वो राजगद्दी पर सिर्फ 11 महीने ही सम्राट रह पाए. ब्रिटिश साम्राज्य की बागडोर उनके हाथ जॉर्ज पंचम की मृत्यु के बाद 20 जनवरी 1936 में आई थी और वो सिर्फ 11 दिसंबर 1936 तक ही सम्राट रहे.

एडवर्ड अष्टम का कार्यकाल 11 महीने का था लेकिन उनके तख़्त त्याग का ही नतीजा था कि उनके छोटे भाई, जॉर्ज षष्ठम को ब्रिटिश साम्राज्य का ताज पहनाया गया और जॉर्ज षष्ठम की मृत्यु के बाद उनकी बेटी महारानी एलिज़ाबेथ, के सर येे ज़िम्मेदारी आयी.
कह सकते हैं, ना एडवर्ड अष्टम ताज और तख़्त तजते, ना हीं एलिज़ाबेथ, साम्राज्ञी बन पातीं. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर एडवर्ड अष्टम को तख़्तो ताज क्यों तजना पड़ा?... जवाब है, प्रेम की खातिर…


प्रेम की खातिर
इसे आप राज हैंगओवर कहें या फिर राज ऑब्सेशन कि मां के मुंह से जो बचपन में पहली प्रेम कहानी सुनी, वो थी एडवर्ड अष्टम और वॉलिस सिंपसन की. मां ने कहानी को कुछ इस तरह से सुनाया था कि मुझे पूरी उम्र येे बात कभी खली ही नहीं कि जिस महिला से ब्रिटिश सम्राट प्रेम करते थे वो एक तलाकशुदा महिला थीं. सम्राट से शादी करने के लिए उन्हें अपने दूसरे पति, अर्नेस्ट सिम्पसन से भी तलाक़ लेना पड़ा था. इस प्रेम कहानी में बचपन से ही जिस चीज़ ने मेरी मां और मुझे, थ्रिल दिया, वो था सम्राट का इस प्यार की वजह तख़्त और ताज, दोनों को त्यागना. महिला का तलाकशुदा होना, जैसे कभी मायने ही ना रखता हो. आखिर ये तो कहानियों में ही होता है ना जब कहा जाता है, कि प्यार की कोई कीमत नहीं होती, तुम्हारे लिए दुनिया छोड़ दूंगा, तुम्हारे लिए जान दे दूंगा. असल ज़िन्दगी में येे कभी होते नहीं देखा. बस मां की सुनाई इस कहानी में ही एक शहंशाह को सब लुटाते देखा. और यही अच्छा लगा…

प्रेम बनाम राजशाही
सोचने वाली बात ये है कि, जो बात, (वॉलीस सिंपसन का तलाकशुदा होना) मेरे बाल मन को विचलित ना कर पाई, उस बात ने उस समय की ब्रितानी बादशाही हुकूमत को हिला के रख दिया था. संवैधानिक संकट की सी स्थिति आ गई थी. एडवर्ड अष्टम, ने यहां तक कह दिया था कि शादी के बाद उनकी पत्नी सिर्फ पत्नी का ही दर्जा लेंगी और वो कभी भी क्वीन वाला संबोधन अपने लिए नहीं चाहेंगी. सम्राट, जिस चर्च के खुद हेड थे, वो उसी चर्च के बनाए नियमों के विद्रोही के रूप में देखे जाने लगे. प्रधानमंत्री स्टैनली बाल्डविन ने भी सम्राट की मदद करने में असमर्थता ज़ाहिर कर दी थी. ब्रिटिश प्रेस उस समय लेडी सिंपसन के हर कदम पर, उनकी हर बात पर यूं नज़र रखती, जैसी पैनी नज़र बाद में लेडी डायना या फिर मेगन मार्कल ने भोगी. उनके बारे में कई तरह की अफ़वाह उड़ती, और उस अफ़वाह को सच मान लिया जाता. वॉलिस सिंपसन को जान से मारने की धमकियां मिलती. लंदन की मेट्रोपोलिटन पुलिस उन की जासूसी करने लगी थी. वॉलिस की ज़िन्दगी में एक वक़्त ऐसा भी आया जब उन्हें ब्रिटेन छोड़ फ्रांस में किसी मित्र के यहां शरण लेनी पड़ी.

वॉलिस से यह नज़दीकियां एडवर्ड को शाही परिवार व उनके अपने भाई से दूर ले जा रही थी. एडवर्ड अपनी भाभी को बहुत मानते थे, पर अब उनकी उनसे भी दूरी होने लग गई थी. मानो पूरी कायनात, एडवर्ड को वॉलिस से मिलाने की, और तख़्तोताज से दूर ले जाने की साज़िश करने लगी थीं.


इस सब के बीच एडवर्ड अष्टम को आख़िरकार वो कदम उठाना पड़ा जो कदम उस से पहले किसी शासक ने नहीं उठाया था. उन्होंने ताज त्याग दिया. ये ताज सिर्फ इंग्लैंड का ही ताज नहीं था, येे ताज ब्रिटिश साम्राज्य का ताज था जिसमें ब्रिटेन शासित, हिन्दुस्तान समेत और भी देश, शामिल थे. इंग्लैंड के इतिहास में एक सम्राट के ज़िंदा रहते किसी और को सम्राट बनाया जाए, ऐसा पहली बार हुआ था. जॉर्ज षष्ठम की ताजपोशी हुई और एडवर्ड वॉलिस एक हुए.

एडवर्ड और वॉलिस ताउम्र एक दूसरे के साथ रहे. उन्हें, शाही परिवार इंग्लैंड की धरती से दूर रखने के लिए राजसी ज़िम्मेदारी देता रहा, जिसे वो दोनों इस उम्मीद से निभाते थे कि उन्हें एक दिन बेहतर पहचान ज़रूर मिलेगी और राज परिवार उन्हें फिर अपनाएगा. पर ऐसा हुआ नहीं. शाही परिवार से पहचान और इज्जत पाने की उनकी ख्वाहिश, बस ख्वाहिश ही रही. राजघराने के नियमों को लांघना 1936 में भी मुश्किल था और 2020 में भी. दुनिया वाले इस बात को, इस 1936 वाली प्रेम कहानी को भूल सकते हैं, हैरी और मेगन उस कहानी को आज भी जी रहे हैं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: September 26, 2020, 8:46 AM IST
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