बावरा मन : ​बोस्की की याद

लोकल और ग्लोबल दोनों से ही दुनिया हजारों सालों से चलती आ रही है और आगे भी चलती रहेगी. मानव सभ्यता का उद्भव और विकास दोनों पर ही टिका हुआ है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 1, 2020, 1:15 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
बावरा मन : ​बोस्की की याद
व्हाट्सएप पर चीनी सामानों के बहिष्कार के मैसेज की बाढ़ आ गई है.
बावरा मन आजकल व्हाट्सएप पर चीनी चीज़ों के बहिष्कार के फॉरवर्डस पढ़ रहा है. सोच रहा है, आज़ादी की लड़ाई स्वदेशी से लड़ी गई. 90 के दशक में ग्लोबलाइजेशन का राग चला. अब 2020 में हम फिर 'लोकल' पर आ टिके हैं. असलियत तो यह है, कि ना हम कभी पूरी तरह से लोकल हुए, ना ही ग्लोबल. दरअसल लोकल और ग्लोबल दोनों से ही दुनिया हजारों सालों से चलती आ रही है और आगे भी चलती रहेगी. मानव सभ्यता का उद्भव और विकास दोनों पर ही टिका हुआ है.

वैश्विक व्यापार, ट्रेड, यात्राएं... समुद्री और ज़मीनी, अनंत काल से चली आई हैं इसकी शुरुआत ना ही चीनी प्रीमियर Deng Xiaoping ने की, ना ही डॉ. मनमोहन सिंह ने. चूंकि इंसान एक समाजिक प्राणी है इसलिए उसके लिए, जो मेरा है, जो तुम्हारा है, आपसी लेनदेन से ही, हमारा बनता है. मेरे पास दाल है, तुम्हारे पास चावल है, एक-दूसरे से मिल बांट खाएंगे तो चावल दाल का मजा उठा पाएंगे. तभी तो खिचड़ी बनेगी.

हम ही हम हैं तो क्या हम हैं
तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो...
खैर, चूंकि बात चीनी प्रोडक्ट्स की चल रही है तो बावरा मन भी उसी की कहने को मचल रहा है. एक दौर था जब पासपोर्ट नहीं होते थे, ट्रेवल डॉक्यूमेंट का अता-पता नहीं होता था, आने-जाने के साधन अलग हुआ करते थे, चीन से व्यापारी तब भी दुर्गम दर्रों को पार करते, घोड़ों पर अपना सामान बेचने हमारे देश आया करते थे. यह वही रास्ते थे जिन पर चलकर कभी फाहियान और ह्वेन सांग आए थे. जिसके कारण बाद में 'हिंदी चीनी भाई भाई' भी हुआ. बात कोई बहुत पुरानी भी नहीं सिर्फ 100 साल पुरानी ही है.

ये वो वक़्त था जब हम भी ग़ुलाम थे, चीन भी ग़ुलाम था. हम भी ग़रीब, और वो तो हम से भी ग़रीब थे. कम से कम उस समय के भारत ने, चीन की बर्बादी की 'अफीम' तो नहीं चखी थी!!

2020 में हम फिर 'लोकल' पर आ टिके हैं.
आज़ादी से पहले अनडिवाइडेड प्री 1947 के पंजाब में कपड़ा खरीदने के तीन साधन हुआ करते थे.

पहला, इंग्लिश स्टोर्स जहां विलायत की मिलों में बना बढ़िया क्वालिटी का रिफाइंड मुलायम कपड़ा मिला करता था. इन इंग्लिश स्टोर्स में सिर्फ अंग्रेज़ अफ़सरों और संपन्न भारतीयों की ही पहुंच थी. यहां आम आदमी पैर भी नहीं रख सकता था. दूसरा, गांव के अपने हाट बाजार और लोकल दुकानें जहां पर सूती, खादी, लट्ठे का मोटा कपड़ा आसानी से मिला करते थे. ये कपड़े रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पहने जाते थे. और तीसरा, चीनी स्मॉल टाइम ट्रेडर्स. वे अपना सामान घोड़ों पर लाद कर, दुर्गम दर्रों से निकलते, पंजाब के गांव देहात में अपना कपड़ा बेचने आते थे. इन कपड़ों में चीन का रेशम, ब्रोकेड और बोस्की शामिल होता था. पंजाब के गांव में बोस्की के कपड़े सिला करते थे और इनमें सबसे मशहूर मार्का होता था 'दो घोड़े की बोस्की' का. यानी जिस बोस्की के कपड़े पर दो घोड़े बने होते थे सबसे बेहतर बोस्की मानी जाती थी. इसी बोस्की से सलवार सूट बनते थे, शरारे गरारे सिला करते थे, मर्दों के लिए पठान सूट बनाए जाते थे. शादी-ब्याह, सारे रस्मो रिवाज़ और सारे त्योहार इसी की बदौलत मना करते थे.

पेशावर से अब्दुल मजीद साहब कहते हैं, "मुझे याद है हमारे बचपन में मां ईद पर बोस्की के कुर्ते बनवाया करती थीं और लट्ठे की सलवार के साथ हम उसे पहनते थे. बोस्की तो आज भी यहां मिलती है पर दो घोड़े वाली देखे, अब अरसा हो गया है." ये चीनी व्यापारी पंजाब तक ही सीमित नहीं थे, इनकी पहुंच अवध तक थी. लखनऊ के करामत कॉलेज की रिटायर्ड प्रिंसिपल, नूर खान कहती हैं, "मेरे पास आज भी मेरी सास से मिले वो पुश्तैनी 'runner' और 'doilies' हैं जिन्हें उन्होंने कभी किसी 'चीनी बाबा' से खरीदा था. आज वो पुरानी और बदरंग हो रहीं हैं, पर धरोहर की तरह हमने उन्हें संभाल रखा है. ये वही चीनी बाबा, बैक पैक ट्रेडर होंगे, जो बोस्की भी लाया करते होंगे."

गुलजार साहब ने जब अपनी बेटी मेघना का नाम बोस्की रखा होगा तो उसी चीनी मुलायम रेशमी कपड़े की याद में रखा होगा. बोस्की ने भी फिर उसी मुलायमियत के साथ 'राज़ी' बनाई होगी. इसी 'दो घोड़े की बोस्की' के किस्से 'मेरे बावरे' मन ने भी अपने बुजुर्गों से सुने थे, इसीलिए आज भी उसकी मुलायमियत दिल में बसी है. आज 100 साल पहले की उस मुलायम बोस्की को याद कर रही हूं. व्हाट्सएप पर आए यह बॉयकॉट चीनी प्रोडक्ट्स के फॉरवर्डस पढ़ रही हूं. सोच रही हूं, लोकल हो या फिर ग्लोबल, क्या फर्क पड़ता है, बोस्की सी मुलायमियत हम इंसानों के दिलों पर हमेशा बनी रहनी चाहिए.
क्या है न, दिल मुलायम रहेंगे तभी तो इंसानियत बनी रहेगी.
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: June 1, 2020, 11:56 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading