नाओमी ओसाका तो घर लौट गईं, मगर भविष्‍य के उन जैसे तमाम खिलाड़ियों का क्या?

जापान की नाओमी ओसाका (Naomi Osaka) ने डिप्रेशन के कारण फ्रेंच ओपन बीच में ही छोड़ दिया है. यह पहला मौका नहीं है जब किसी खिलाड़ी ने अपने डिप्रेशन को लेकर खुलकर बात की है. नाओमी महज 23 साल की हैं और उन्‍होंने सेरेना विलियम्‍स जैसे कई बड़े खिलाड़ियों को हराकर चार ग्रैंडस्‍लैम भी जीते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: June 4, 2021, 11:20 AM IST
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नाओमी ओसाका तो घर लौट गईं, मगर भविष्‍य के उन जैसे तमाम खिलाड़ियों का क्या?
नाओमी ओसाका ने 4 ग्रैंडस्लैम जीते हैं. (AP)
नई दिल्ली. एक टेनिस खिलाड़ी पिछले कुछ दिनों से चर्चा में हैं. नाम है नाओमी ओसाका (Naomi Osaka) जापान की हैं. उम्र भी ज्‍यादा नहीं है, महज 23 साल की है. उन्‍होंने सेरेना विलियम्‍स जैसे कई बड़े खिलाड़ियों को हराकर चार ग्रैंडस्‍लैम भी जीते. फ्रेंच ओपन के इस सीजन में भी उन्‍होंने विजयी आगाज किया था, मगर एक मैच के बाद ही नाओमी ने टूर्नामेंट से नाम वापस ले लिया. कारण था...डिप्रेशन. जी हां... सबसे ज्‍यादा कमाई करने वाली महिला टेनिस खिलाड़ियों में से एक नाओमी ओसाका डिप्रेशन (Naomi Osaka Depression) के कारण टूर्नामेंट से हट गईं. वो इससे करीब 3 साल से इससे जूझ रही हैं. एक खिलाड़ी और डिप्रेशन का शिकार, शायद किसी को समझ नहीं आ रहा, क्‍योंकि खिलाड़ी का टैग लगते ही उन्‍हें सबसे ज्‍यादा फिट होने का प्रमाण पत्र जो मिल जाता है. इसमें कोई शक नहीं है कि शारीरिक रूप से खिलाड़ी आम लोगों की तुलना में ज्‍यादा फिट होते हैं और मानसिक रूप से भी आम लोगों की तुलना में थोड़े ज्‍यादा बेहतर होते हैं, मगर क्‍या शारीरिक रूप जितने ही मानसिक रूप से भी फिट होते हैं. शायद नहीं...

नाओमी ने फ्रेंच ओपन (French Open 2021) के इस सीजन में पहली जीत हासिल करने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, वो मीडिया का सामना नहीं करना चाहती थीं. इस वजह से उन पर जुर्माना लगाया गया और उन्‍हें चेतावनी भी दी गई. फ्रेंच ओपन में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस का एक रिवाज है, जिसे नियम भी कहा जा सकता है. नाओमी अपने तरीके से चीजों को संभालना चाहती थीं. मगर शायद शब्‍द अंदर की हलचल को बयां करने की ताकत नहीं रखते. इसीलिए इस 23 साल की खिलाड़ी के शब्‍द उनकी हलचल को नहीं बता पाए और उन्‍हें सजा मिल गई, जिसके बाद उन्‍होंने टूर्नामेंट से हटने का फैसला लेना पड़ा.

फ्रेंच ओपन 2021 में घटी बड़ी घटना...पूरी दुनिया की नजर नाओमी पर आ गई. इसी से तो वो बचना चाहती थीं. सोशल एंग्‍जाइटी के कारण ही कोर्ट पर वो हेडफोन लगाकर आती हैं. दिग्‍गजों का साथ मिलने लगा और फिर फ्रेंच टेनिस फेडरेशन ने उनके टूर्नामेंट से हटने पर खेद और दुख दोनों जताया. नाओमी तो अपने घर लौट गईं और कुछ दिनों में फिर से अपने कंफर्ट जोन में आ जाएंगी, मगर भविष्‍य के तमाम नाओमी ओसाका जैसे खिलाड़ियों का क्‍या? क्‍या उनका सफर भी ऐसे ही खत्‍म होगा या फिर इससे भी दर्दनाक... ये फैसला किसी खिलाड़ी को नहीं, बल्कि फेडरेशन, मैनेजमेंट और हमें करना है. समय है मैदान के कुछ रिवाजों को बदलने की, क्‍योंकि डिप्रेशन भी एक गंभीर बीमारी है. कोरोना ने जैसे खेल के नियमों को बदला, वैसे ही कुछ नियमों का बदलाव की जरूरत है.

इन सबसे पहले स्‍वीकार करने की जरूरत है कि खिलाड़ी भी हमारे बीच में से ही निकले हैं. उनके पास भी हमारे जैसा दिल और दिमाग है. चोट लगने पर दर्द उन्‍हें भी होता है. बस खिलाड़ी होने के कारण उनको अपने दर्द से डील करने का तरीका हमसे बेहतर आता है. दर्द में भी मैदान छोड़कर न भागने की कला उनको हमसे बेहतर आती है. नाओमी जैसे कई खिलाड़ी इसका उदाहरण हैं. तीन साल से डिप्रेशन में हैं. इसके बावजूद वह अपने लक्ष्‍य से नहीं भटकीं. 2018 में सेरेना को हराकर यूएस ओपन जीतने के बाद 2019 में ऑस्‍ट्रेलियन ओपन, फिर 2020 में दूसरी बार यूएस ओपन और 2021 में फिर ऑस्‍ट्रेलियन ओपन जीता. भले ही क्‍ले कोर्ट पर उनका रिकॉर्ड बेहतर नहीं है, मगर वह जिस फॉर्म में नजर आ रही थीं, उससे माना जा रहा था कि वह यहां पर खाता खोल सकती हैं.
विजयरथ पर सवार नाओमी इस टूर्नामेंट से तो हट गईं, मगर उन्‍होंने हार नहीं मानी और अब उनकी लड़ाई मानसिक तनाव से हैं. जिससे वह तो जल्‍द ठीक हो जाएगी, मगर बाकियों का क्‍या... आखिर कब खुद पर जीत हासिल करेंगे. कब मानसिक बीमारी को शारीरिक बीमारी की तरह मानेंगे. कब स्‍वीकार करेंगे कि जिस तरह से शरीर के किसी हिस्‍से पर चोट लगने पर मरहम की जरूरत होती है, ठीक वैसी ही इमोशनली चोटिल होने पर भी मरहम की जरूरत होती है. या यूं कहें कि मानसिक रूप से फिटनेस शारीरिक फिटनेस से भी ज्‍यादा जरूरी है, क्‍योंकि जब व्‍यक्ति की इच्‍छा शक्ति मजबूत होती है तो वह शारीरिक रूप से भी मजबूत होता है.

एक बीमारी और है, जिस पर लगभग सभी को जीत हासिल करने की जरूरत है. वो ये कि खिलाड़ियों को जादूगर न मानने की. खिलाड़ी का टैग लगने के बाद उसे सुपरह्यूमन मानना बंद कीजिए. शारीरिक रूप से भले ही वो बाकी लोगों से ज्‍यादा फिट और मजबूत हो सकता है, मगर झटका लगने पर यह कहना बंद कीजिए कि अरे तुम तो खिलाड़ी हो... तुम सुपरह्यूमन हो... तुम तो आसानी से डील कर लोगे.

ऐसा कहकर उसे और अधिक मानसिक रूप से बीमार बनाने का कारण कहीं न कहीं आप और हम भी बन जाते हैं. खिलाड़ी का मतलब सिर्फ इंटरनेशनल स्‍तर पर खेलने वाला नहीं, बल्कि आपके मोहल्‍ले में भी खेलने वाला है. उसकी मानसिक चोट पर मरहम लगाने वाले बनें, न ही बीमार करने वाले, क्‍योंकि एक खिलाड़ी में भी आपकी और हमारी तरह करीब 300 ग्राम का दिल और 3 पाउंड का दिमाग होता हैं. चोट लगने पर सबकी तरह उसे भी दर्द होता है. वो भी अंदर ही अंदर कई चीजों से लड़ता है. वो भी उलझन में रहता है. जीत और हार से फर्क उसे भी पड़ता है.खेल में हार जीत जो चलती रहती है... यह कहना वाकई आसान है, मगर खिलाड़ी होना सच में बहुत मुश्किल है, क्‍योंकि खिलाड़ी होने के बाद शायद उसे खोना पड़ता है अपने दर्द पर रोने, अपनी चोट दिखाने और दिल को पूरी तरह खोलने का हक. उससे सिर्फ जीतने की, चोट लगने पर बिना आवाज निकालने फिर से खड़े होने ही उम्‍मीद की जाती है.

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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First published: June 4, 2021, 11:20 AM IST
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