किसान आंदोलन या गुमराह गैंग की साजिश?

मई 2016 में कांग्रेस के दिग्गज नेता पी चिदंबरम ने कहा था कि मोदी सरकार को आर्थिक सुधार के बड़े फैसले (Bold reforms) लेने चाहिए. अब जबकि मोदी सरकार ने उसी रास्ते पर सुधार का कदम उठाया और कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए संसद ने कानून बनाया तब वही कांग्रेस नेता इसका विरोध कर रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: December 31, 2020, 11:26 AM IST
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किसान आंदोलन या गुमराह गैंग की साजिश?
किसान सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आए फैसले को लेकर मंथन कर रहे हैं. (फाइल फोटो)
साल 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने अल्पमत सरकार का मुखिया रहते हुए अपने आर्थिक उदारीकरण के फैसले से भारत को हमेशा के लिए बदल दिया. सरकारी जंजीर में बंधी अर्थव्यवस्था को मुक्त कराने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया. पूर्ण बहुमत में नहीं रहने के बाद भी नरसिम्हा राव सरकार ने पांच साल के दौरान कठिन पर कई बड़े आर्थिक फैसले लिए.

साल 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की महज़ दस महीने की सरकार में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपना ड्रीम बजट पेश किया था. इस बजट में लिए गए टैक्स रिफॉर्म की चर्चा आज भी होती है. कांग्रेस की बैसाखी पर टिकी देवगौड़ा की कम समय की कमज़ोर सरकार में भी आर्थिक सुधार जारी रहा.

20 से भी ज्यादा दलों के गठबंधन की अगुवाई करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने न सिर्फ आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को जारी रखा बल्कि टीवी न्यूज इंडस्ट्री, टेलिकॉम और विनिवेश को लेकर कई मुश्किल पर बड़े आर्थिक सुधारवादी फैसले लिए.

मई 2016 में कांग्रेस के दिग्गज नेता पी चिदंबरम ने कहा था कि मोदी सरकार को आर्थिक सुधार के बड़े फैसले (Bold reforms) लेने चाहिए. एक मौक़े पर चिदंबरम ने अफ़सोस जताते हुए कहा था कि वह और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आपस में यही बात करते हैं कि जितना प्रचंड बहुमत मोदी सरकार के पास है, काश ये मौक़ा उन्हें मिला होता.
हैरानी की बात है कि अब जबकि मोदी सरकार ने उसी रास्ते पर सुधार का बड़ा कदम उठाया है और कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए संसद ने कानून बनाया तब वही कांग्रेस नेता इसका विरोध कर रहे हैं. विपक्ष भले विरोध के नाम पर सरकार का विरोध कर रहा हो, पर  देश की जनता का समर्थन मोदी सरकार को बदस्तूर जारी है. नए कृषि सुधार कानून के बनने के बाद बिहार में चुनाव हुए. यूपी सहित देश के कई हिस्सों में उपचुनाव हुए. कर्नाटक और राजस्थान में पंचायत के चुनाव हुए. हैदराबाद नगर निगम के चुनाव हुए. इन सभी चुनावों में जनता ने मोदी सरकार को भरपूर समर्थन दिया.

इस सूरतेहाल में आप उस निर्णायक और मजबूत छवि वाले प्रधानमंत्री से क्या उम्मीद करते हैं जिसके पास प्रचंड बहुमत है. क्या आप चाहते हैं कि वो बड़े सुधारवादी और मुश्किल फैसले ना लें जो कमजोर होने और गठबंधन की मजबूरी के चलते पहले की सरकारें नहीं ले पायी थीं? जाहिर है प्रधानमंत्री कुछ किसानों और बिचौलियों की अनुचित मांगों और दिल्ली को ठप करने की साजिश में जुटे लोगों के सामने समर्पण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो मोदी जैसे सशक्त और कड़े फ़ैसले लेने वाले नेता के लिए इस तरह के निर्णायक फैसले लेना आगे के लिए मुश्किल हो जाएगा.

हम दोहरी मानसिकता में जीने वाले समाज हैं. किसानों के लिए हम कुछ करें या ना करें, हमारे लिए ये एक संवेदनशील मामला है. प्रधानमंत्री मोदी अपनी छवि और मामले की संवेदनशीलता के बीच समाधान निकालने की कोशिश में धैर्य के साथ जुटे हैं.
आइये अब समझने की कोशिश करते हैं कि जिस कृषि सुधार कानून का सीमित स्थानों में विरोध हो रहा है उसके पीछे की सच्चाई क्या है. साल 1991 में लाइसेंस राज का खात्मा कर आर्थिक उदारीकरण का जब फैसला लिया गया था तो कहा गया कि भारत को आजादी तो 1947 में  मिली लेकिन आर्थिक आजादी अब जाकर मिली है. तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ मनमोहन के आर्थिक सुधार के फैसले का तब परंपरागत बिजनेस घरानों वाले ‘बॉम्बे क्लब’ ने खुलकर विरोध किया था. नरेन्द्र मोदी के नए कृषि कानूनों को भारत के दिग्गज कृषि अर्थशास्त्री कृषि क्षेत्र में 1991 की आर्थिक आजादी की तरह देख रहे हैं. गौर से देखें तो नए कृषि कानूनों का विरोध करने वाले दिल्ली बॉर्डर पर जुटे संपन्न किसान, उसी बॉम्बे क्लब के कारोबारी की तरह हैं.

किसानों के बीच सबसे बड़ा भ्रम ये फैलाने की कोशिश की जा रही है कि नए कृषि सुधार कानून से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी. सच्चाई ये है कि एमएसपी के खत्म होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है. जब तक देश के गरीबों का पेट भरने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), अंत्योदय अन्न जैसी कल्याणकारी योजनाएं चलेंगी पंजाब के किसानों से गेहूं और धान जैसे जरूरी अनाज की सरकारी खरीद जारी रहेगी. मैं पंजाब के किसानों का खासकर नाम क्यों ले रहा, वो इसलिए कि एमएसपी के जरिये सरकार जो गेहूं और धान खरीदती है उसका करीब 96 फीसदी हिस्सा पंजाब के किसानों का होता है.

किसान नेताओं की सबसे बड़ी मांग ये है कि सरकार एमएसपी को कानूनी दर्जा देने का एलान करे. सवाल उठता है कि क्या कोई अर्थव्यवस्था एमएसपी से चलती है? अगर सरकार किसानों की इस मांग को मान भी ले तो क्या इसे खुली अर्थव्यवस्था में लागू करना संभव हो पाएगा? फर्ज कीजिये कि एमएसपी को कानूनी मान्यता दे दी जाती है, पर किसी कृषि उत्पाद की आपूर्ति अगर मांग से बहुत ज्यादा हो गई तो उसे कौन खरीदेगा? मसलन एक लाख टन चने की बाजार में मांग है जबकि सप्लाई उसकी 5 लाख टन हो गई फिर उसे कौन कारोबारी खरीदेगा? बाजार तो डिमांड और सप्लाई के फॉर्मूले से चलता है.

प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आये करीब छह साल हो रहे हैं. इस दौरान कृषि उत्पादों की एमएसपी में की गई बढ़ोतरी के ट्रेंड को देखें तो उससे भी ये स्पष्ट हो जाता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर पीएम मोदी की नीयत साफ है.


मनमोहन सरकार के समय गेहूं पर एमएसपी 1400 रुपये प्रति क्विंटल थी. इस समय मोदी सरकार प्रति क्विंटल पर 1975 रुपये एमएसपी दे रही है. यूपीए सरकार के समय धान पर एमएसपी 1310 रुपये थी. इस समय मोदी सरकार धान पर प्रति क्विंटल 1870 रुपये एमएसपी दे रही है. पहले मसूर की दाल की एमएसपी 2950 रुपये थी अब मोदी सरकार के समय मसूर दाल की कीमत 5100 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है. पिछली सरकार ने अपने पांच साल में किसानों से लगभग 1700 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा था मोदी सरकार ने पांच साल के दौरान 3000 लाख मीट्रिक टन धान किसानों से एमएसपी पर खरीदा. यूपीए सरकार के पांच साल के दौरान किसानों को धान और गेहूं की एमएसपी पर खरीद के बदले 3 लाख 74 हजार करोड़ रुपये मिले थे जबकि मोदी सरकार ने इतने ही समय में गेहूं और धान की खरीद करके किसानों को 8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा दिये हैं. जाहिर है ये आंकड़े बताते हैं कि एमएसपी को लेकर मोदी सरकार कितनी संजीदा है. ऐसे में सरकार की नेक नीयती पर शक करने की गुंजाइश क्या बनती है?

कृषि सुधार कानून को लेकर किसान नेताओं की दूसरी सबसे बड़ी चिंता ये है कि कॉन्ट्रेक्ट फार्मिग की नई व्यवस्था के बाद बड़ी कंपनियां किसानों की जमीन पर कब्जा कर लेंगी. पहली बात कि कृषि कानून में इस बात की साफ-साफ व्यवस्था की गई है कि किसान के जिस खेत को लेकर कॉन्ट्रेक्ट किया गया है उसे कंपनी नहीं खरीद सकती. दूसरी बात अकेले पंजाब में इस समय एक लाख से ज्यादा किसान अपनी गाय-भैंस के दूध अमूल और नेस्ले को बेचते हैं. ये वो छोटे किसान हैं जो डेयरी फॉर्म नहीं चलाते हैं, मुश्किल से उनके पास दो-तीन पशु हैं. नेस्ले ने पंजाब में ऐसे किस किसान की जमीन और पशुओं पर कब्जा कर लिया?

1991 में वित्त मंत्री बनने के बाद डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि अगले तीन साल देश में कोहराम मचने वाला है. याद कीजिए अपने ऐतिहासिक फैसलों से कोहराम मचाने वाले नरसिम्हा राव एक अल्पमत सरकार के मुखिया थे. नरेन्द्र मोदी करीब चार दशक के इतिहास में अपने दम पर लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं. क्या आप चाहते हैं कि मोदी सरकार असली किसान नहीं बल्कि किसान के नाम पर सियासत करने वाले आढ़तियों के सामने समर्पण कर दें?

पिछले साल ठीक यही समय था जब नागरिकता संशोधन कानून( सीएए) को लेकर वितंडा खड़ा किया गया था. अंध मोदी विरोध में वामपंथी सियार एक सुर में हुआ-हुआ कर रहे थे कि मुस्लिमों को भगाने के लिए सीएए लाया गया है. जिस कानून से हिन्दुस्तानी नागरिकों की हैसियत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला था उसको लेकर शाहीन बाग कांड किया गया ताकि देश की राजधानी को पंगु बनाया जा सके. ऐसे हालात पैदा किये जिससे हिंसा और गोली-बारी का दौर शुरू हो गया. आंदोलनकारी का विरोध इस बात को लेकर था कि तीन इस्लामिक देश के सताये गए अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने में कुछ शर्तें ढीली क्यों की जा रही हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि ये छूट उनको (उन देशों के बहुसंख्यकों को) भी मिलनी चाहिये जिन्होंने इन्हें सताया है. इस कानून का विरोध करने वाले ‘बुद्घिजीवी’ भूल गए कि ये वही बहुसंख्यक हैं जो हिन्दुओं के साथ नहीं रहना चाहते थे और धर्म के आधार पर देश बांट कर अलग हो गए. सवाल उठता है फिर दोबारा उन्हें हिन्दुस्तान की नागरिकता में प्राथमिकता क्यों मिलनी चाहिये? पर इस सवाल का जवाब देने के बजाय मोदी विरोधियों ने सीएए के खिलाफ लोगों को हिंसा के लिए भड़काया. सीएए का मामला ना तो समानता का था और ना ही सेक्युलरिज्म का. ये मामला मानवीय संवेदना, मानवाधिकारों और सिविलाइजेशनल स्टेट के रूप में भारत की जिम्मेदारियों का था. पर वामपंथियों ने तथ्य के बजाय लोगों को गुमराह करने का काम किया जिससे भ्रम और हिंसा का साम्राज्य खड़ा करके केंद्र की सरकार को बदनाम किया जा सके. जिस तरीके से सीएए आंदोलन के समय दिल्ली को अलग-थलग करने की कोशिश की गई उसी तर्ज पर झूठ के सहारे सिंधु बॉर्डर पर मोदी को हिलाने की साजिश चल रही है.

विपक्ष का आरोप है कि नए कृषि कानून से किसान खतरे में आ जाएंगे. पर सवाल है कि खतरे में किसान हैं या देश के बड़े सियासी परिवार? कांग्रेस के आह्वान पर पिछले दिनों  देशभर में चक्का जाम की कोशिश हुई. कांग्रेस का मुखिया कौन है- गांधी परिवार. समाजवादी पार्टी के कहने पर यूपी की सड़कों पर हंगामा किया गया. समाजवादी पार्टी का मुखिया कौन है- मुलायम परिवार. अकाली दल के कहने पर पंजाब की सड़कें जाम हो गईं. अकाली दल का मुखिया कौन है- बादल परिवार.

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की लगातार बढ़ रही लोकप्रियता से विपक्ष के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है. ऐसे में विपक्षी दल किसानों की जमीन पर अपनी सियासी फसल लहलहाना चाहते हैं. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
मनोज मलयानिल

मनोज मलयानिलSr Editor,Bihar,Jharkhand

25 years of experience in radio, newspaper and television journalism. After working with Doordarshan, Sahara TV, Star News, ABP News and Zee Media, currently working as senior editor with News18 Bihar-Jharkhand, a part of country's largest news network.

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First published: December 31, 2020, 11:26 AM IST
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