Opinion: क्योंकि केजरीवाल जैसे नहीं हैं नीतीश, पटनायक और विजयन

क्या आप जानते हैं कि बिहार (Bihar) जैसे गरीब राज्य की सरकार अब तक कोरोना से मृत 3737 लोगों के परिवारों को चार-चार लाख रुपये मुआवजा दे चुकी है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 17, 2021, 10:48 AM IST
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Opinion: क्योंकि केजरीवाल जैसे नहीं हैं नीतीश, पटनायक और विजयन
जनता के पैसों को वाहवाही लूटने के लिए विज्ञापन की जगह सरकारी योजनाओं में खर्च किया जाना चाहिए.
पटना. पिछले कुछ दिनों में आपने देखा होगा कि हर रोज किसी न किसी राज्य ने अपनी 12वीं की बोर्ड परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया. केंद्र तो पहले ही CBSE की 12वीं की परीक्षा रद्द कर चुका है. क्या आप जानते हैं कि जिस बिहार को गया-गुजरा राज्य कहा जाता है, वहां सरकार ने कोरोना की दूसरी लहर शुरु होने से पहले ही बोर्ड परीक्षा के साथ रिजल्ट भी जारी कर दिया था?

फर्ज कीजिए कि अगर केजरीवाल मुख्यमंत्री होते और उन्होंने ये उपलब्धि हासिल की होती तो क्या करते? अगले रोज दिल्ली से छपने वाले तमाम बड़े अखबारों के तमाम संस्करणों के मुख्य पृष्ठ पर फुल पेज विज्ञापन छपता और टेलीविजन स्क्रीन पर दिन भर ढिंढोरा पीटा जाता कि हमने 10वीं और 12वीं का इम्तिहान कराकर रिजल्ट भी जारी कर दिया.

फर्ज कीजिए की केजरीवाल ने कोरोना के कारण मृत व्यक्ति के अगर 100 परिवारों को दो-दो लाख रुपये भी मुआवजा दिया होता तो इसका प्रचार-प्रसार उन्होंने किस तरह किया होता? क्या ये कहने की बात है कि दिन भर अखबार से लेकर टेलीविजन तक वो अपनी सरकार का बखान कर रहे होते कि उन्होंने चांद तारे तोड़कर जमीं पर उतार दिए.

क्या आप जानते हैं कि बिहार जैसे गरीब राज्य की सरकार अब तक कोरोना से मृत 3737 लोगों के परिवारों को चार-चार लाख रुपये मुआवजा दे चुकी है. अपनी इस उपलब्धि का बिहार सरकार ने बस इतना ही प्रचार किया कि इस बारे में एक साधारण विज्ञप्ति के माध्यम से मीडिया को बता दिया.
इसकी जानकारी देश के लोगों तक पहुंचे
मैं ये नहीं कह रहा कि बिहार में जो गर्वनेंस चल रहा है उसमें सब कुछ परफेक्ट है. नीतीश कुमार खुद कह चुके हैं कि कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां बहुत सारी कमियां हैं. लेकिन, बिहार सरकार की जिन उपलब्धियों को हमने ऊपर बताया है उसे नीतीश सरकार ने अगर विज्ञापन के केजरीवाल स्टाइल में प्रचारित नहीं किया है तो इतना तो फर्ज बनता है कि इसकी जानकारी देश के लोगों तक पहुंचे.

क्या केजरीवाल फॉर्मूला चुनाव में कामायाबी की गारंटी है?केजरीवाल लगातार लोकप्रिय बहुमत के साथ 8 साल से दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं. आखिर चुनाव जीतने का केजरीवाल फॉर्मूला क्या है? बहुत पहले की बात नहीं है. पिछले दिनों कोरोना की दूसरी लहर जब चरम पर थी तब दिल्ली का हेल्थ इंफ्रस्ट्रक्चर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा था. अस्पताल में बिस्तर नहीं थे लोगों तक ऑक्सीजन का सिलिंडर नहीं पहुंच पा रहा था.

केंद्र सरकार ने 8 ऑक्सीजन प्लांट लगाने का जो लक्ष्य दिया था वो भी समय पर पूरा नहीं हुआ था. बेड और ऑक्सीजन की कमी के कारण लोगों की जान जा रही थी. देश की राजधानी में अफरातफरी का माहौल था. और उस समय केजरीवाल क्या कर रहे थे? केजरीवाल अपनी नाकामियां छिपाते हुए केंद्र सरकार पर दोष मढ़ रहे थे. मीडिया दिल्ली सरकार की नाकामियों पर सवाल ना करे, इसके लिए मीडिया को जमकर विज्ञापन बांट रहे थे.

केजरीवाल ने गर्वनेंस के दो मॉडल विकसित किए. वोट पाने के लिए अमीर-गरीब और मिडिल क्लास को सब्सिडी के जरिए कथित मुफ्त बिजली-पानी दो. और जब संकट से घिरो तो मीडिया में दिन रात विज्ञापन दिखाकर अपनी नाकामियों पर चर्चा करने का मौका ही ना दो.


दो दशक से लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं
आपको याद होगा इसी कोरोना काल में पश्चिम बंगाल और ओडिशा में चक्रवाती तूफान आया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तबाही का जायजा लेने ओडिशा गए थे. मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद इतना ही कहा कि देश कोरोना से जूझ रहा है, प्रधानमंत्री जी, अभी आप उस पर ध्यान केंद्रित करें, हम चक्रवात से हुई बर्बादी का मुकाबला स्वयं कर लेंगे. नवीन पटनायक दिल्ली के उलट ओडिशा जैसे एक बड़े राज्य के करीब दो दशक से लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं.

जनता नीति और नीयत दोनों को बखूबी समझती है
मुख्यमंत्री पटनायक को लोगों ने दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबारों और राष्ट्रीय चैनलों पर अपनी उलबल्धियों का ढोलक बजाते कितनी बार देखा है? नीतीश कुमार भी लगभग 16 साल से बिहार जैसे बड़े, पिछड़े और मुश्किल राज्य के मुख्यमंत्री हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी केजरीवाल की तरह अखबारों और टीवी स्क्रीन पर नहीं देखा जाता है.

नीतीश कुमार हों या नवीन पटनायक या फिर दूसरी बार चुनकर आए केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री पी विजयन. इन्होंने गर्वनेंस की ऐसी व्यवस्था बनाई है कि कई खामियों के बाद भी जनहित की सरकारी योजना का लाभ जनता तक पहुंच जाता है. ऐसे में इन राज्यों को केजरीवाल की तरह जनता का पैसा विज्ञापन पर लुटाने की जरुरत नहीं पड़ती है. देश की जनता नीति और नीयत दोनों को बखूबी समझती है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
मनोज मलयानिल

मनोज मलयानिलSr Editor,Bihar,Jharkhand

25 years of experience in radio, newspaper and television journalism. After working with Doordarshan, Sahara TV, Star News, ABP News and Zee Media, currently working as senior editor with News18 Bihar-Jharkhand, a part of country's largest news network.

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First published: June 15, 2021, 9:02 AM IST
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