बि‘हार’ का डर या कुछ और... 11 साल पहले भी शिवराज की जुबां पर आया था ये नाम

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है राज्य की सरकारी नौकरियां प्रदेश के लोगों के लिए आरक्षित की जाएंगी. अब यह कभी न खत्म होने वाली चर्चा हो सकती है कि शिवराज सरकार का यह फैसला सही है या गलत. लेकिन एक सच यह भी है कि शिवराज 11 साल पहले ऐसी ही घोषणा करके भूल चुके हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 18, 2020, 8:39 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
बि‘हार’ का डर या कुछ और... 11 साल पहले भी शिवराज की जुबां पर आया था ये नाम
एमपी में उपचुनाव से पहले शिवराज सरकार ने बड़ा ऐलान किया है. (फाइल फोटो)
दरअसल, हम पढ़ते नहीं है... या फिर जानबूझकर नजरअंदाज कर देते है. मसला मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मौजूदा ऐलान से जुड़ा है. करीब एक साल के ब्रेक के बाद सत्ता में लौटे शिवराज ने उपचुनाव की बेला में फैसला किया है कि मध्य प्रदेश में अब सिर्फ एमपी के निवासियों को ही सरकारी नौकरी मिलेगी. अब यह कभी न खत्म होने वाली चर्चा हो सकती है कि शिवराज सरकार का यह फैसला सही है या गलत. लेकिन कुछ देर के लिए इस मुद्दे को छोड़कर करीब 11 साल पीछे चलते है. वर्ष 2009... सतना में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शिवराज ने कहा था, ‘मध्य प्रदेश में लग रहे कारखानों में स्थानीय लोगों को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए. कारखाना लगाओगे सतना में और नौकरी करने वाले आ जाएंगे बिहार से, ये नहीं चलेगा.’

शिवराज के इस बयान पर बवाल होना जाहिर था. देशभर में इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई तो सबसे ज्यादा तीर बिहार के नेताओं के तरकश से निकले. जुबानी हमलों के बाद शिवराज ने बैकफुट पर जाने में ज्यादा वक्त नहीं लिया. सतना से इंदौर पहुंचते ही उनके सुर बदले हुए थे. बैकफुट पर आए शिवराज ने कहा कि बिहार, उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत, पंजाब और अन्य राज्यों से आने वाले लोगों का वह स्वागत करते हैं.

शिवराज के बयान के बाद विरोध के स्वर मंद हो गए. जनता इस मुद्दे को कुछ दिनों बाद भूल गई. और एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह शिवराज भी इस पर चुप्पी साधकर बैठ गए. शायद उन्हें इस बात का बखूबी अहसास है कि आम लोगों की ‘मेमोरी’ में ऐसे मुद्दे ज्यादा देर तक ‘सेव’ नहीं रहते हैं. इसलिए 11 साल बाद जब उनके सामने कोरोना से लड़ रहे प्रदेश में अपनी सरकार बचाने की चुनौती बड़ी नजर आ रही थी... तो उन्होंने एक बार फिर चुनावी बेला में पुराने प्रोडक्ट को नए रैपर में लपेटकर लोगों के सामने पेश कर दिया.

हालांकि, इस पर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले एक बार फिर डेढ़ साल पीछे चलते है. महीना दिसंबर और वर्ष 2018. शिवराज तब भूतपूर्व हो चुके थे. और उनकी गद्दी पर कमलनाथ की ताजपोशी हो चुकी थी.
कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद 17 दिसंबर को कहा था कि मध्य प्रदेश के जो उद्योग सरकार से सुविधाएं प्राप्त करते हैं, उन्हें 70 प्रतिशत स्थानीय नौजवानों को नौकरियां देनी होंगी. उन्होंने कहा था, ‘बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग यहां नौकरियां पा लेते हैं और स्थानीय नौजवान नौकरियों से वंचित रह जाते हैं.’

बतौर, नेता प्रतिपक्ष शिवराज सिंह चौहान को कमलनाथ का यह बयान रास नहीं आया था. चूंकि विपक्ष के नेता थे तो सरकार के फैसले का विरोध करने का ‘नैतिक’ दायित्व तो बनता है. बस फिर क्या उन्होंने अपने तोपखाने का रुख कमलनाथ सरकार की तरफ मोड़ दिया. जुबानी हमले के साथ ही ट्विटर पर भी जमकर हल्ला किया गया. और 19 दिसंबर 2018 को लिखा गया, ‘मध्यप्रदेश में ना कोई इधर का है, ना कोई उधर का है. मध्यप्रदेश में जो भी आता है, यहां का होकर यहीं बस जाता है. प्रदेश को हिंदुस्तान का दिल ऐसे ही नहीं कहते! क्यों ठीक कहा ना?’

क्यों शिवराज जी ठीक कहा ना. अब आपका नजरिया बदल चुका है. क्योंकि अब आपका कहना है. ‘प्यारे भांजे-भांजियों! आज से मध्यप्रदेश के संसाधनों पर पहला अधिकार मध्यप्रदेश के बच्चों का होगा. सभी शासकीय नौकरियां सिर्फ मध्यप्रदेश के बच्चों के लिए ही आरक्षित रहेंगी. हमारा लक्ष्य प्रदेश की प्रतिभाओं को प्रदेश के उत्थान में सम्मिलित करना है.’अंत में बस संजीव शर्मा और स्वानंद किरकिरे के शब्दों में
इंडिया सर ये चीज़ धुरन्दर
इंडिया सर ये चीज़ धुरन्दर
रन रंगीला पर्जातंतर
रन रंगीला पर्जातंतर.
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)
facebook Twitter whatsapp
First published: August 18, 2020, 8:39 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर