भारत रंग महोत्सव : जिंदगी के कुछ ख्‍वाब, चंद उम्मीदें 'द ओल्ड मैन'

युवा निर्देशक, डिजाइनर और अभिनेता शाहिदुल हक ने हेमिंग्वे के क्लासिक उपन्यास को एक देसी असमिया कलेवर के रूप में प्रस्तुत किया. इसका मंचन अभी हाल ही में संपन्न हुए 21वें भारत रंग महोत्सव में हुआ. कहानी एक बूढ़े मछुआरे बोदई की है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 24, 2020, 4:15 PM IST
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भारत रंग महोत्सव : जिंदगी के कुछ ख्‍वाब, चंद उम्मीदें 'द ओल्ड मैन'
पीढ़ियों के बीच बदलते विचार, मूल्य और जीवन जीने के सलीके में आए बदलाव के चित्रण की कहानी है 'द ओल्ड मैन.'
उम्मीद एक ऐसा मानवीय भाव है जो सघन विषमताओं में भी संघर्षरत रहने के लिए ऊर्जा देता है.  परिस्थितियां, लोग और उम्र भले आपके खिलाफ हों, पर  एक महीन-सी जिजीविषा इन सब को भेदकर जिंदगी की खुशनुमा रौशनी तक पहुंच जाती है. मशहूर साहित्यकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे (Ernest Hemingway) का उपन्यास- 'द ओल्ड मैन एंड द सी' (The Old Man and the Sea) इसी जिजीविषा और उम्मीद की कहानी कहता है. हेमिंग्वे की लेखनी को आलोचक 'आइसबर्ग' शैली कहते थे. बर्फ का वह टुकड़ा जो ऊपर से सपाट, चिकना और सख्त हो, लेकिन भीतर से पानी का एक बड़ा जखीरा समेटे हुए हो. हेमिंग्वे की कहानी, घटनाएं और विचार, ऊपरी सतह पर जितने सरल, सीधे और भोले नजर आते हैं, भीतरी सतह पर उनके अन्तर्निहित अर्थ बहुत गहरे और विस्तार लिए हुए होते हैं.

युवा निर्देशक, डिजाइनर और अभिनेता, शाहिदुल हक ने हेमिंग्वे के इसी क्लासिक उपन्यास को एक देसी असमिया कलेवर के रूप में प्रस्तुत किया. जिसका मंचन अभी हाल ही में संपन्न हुए 21वें भारत रंग महोत्सव (Bharat Rang Mahotsav) के अभिमंच सभागार में हुआ. कहानी एक बूढ़े मछुआरे बोदई की है, जो पिछले 84 दिनों से एक भी मछली नहीं पकड़ पाया है. आस-पास के लोग उसे मनहूस और अभिशप्त मानने लगे हैं. उसका एकमात्र युवा साथी रोंगमोन भी अपने मां-बाप के दबाव में आकर बोदई के साथ अब मछली पकड़ने नहीं जाता, पर उसका स्नेह बोदई के लिए बरकरार है. वह रोज रात को उसके लिए खाना ले कर आता है और दिन भर की उसकी कहानियों को सुनता है. पीढ़ियों के बीच बदलते विचार, मूल्य और जीवन जीने के सलीके में आए बदलाव के चित्रण की भी कहानी है 'द ओल्ड मैन.' अपने अकेलेपन का एहसास होते हुए भी बूढ़ा मछुआरा बोदई अपनी बची-खुची जिंदगी अपनी शर्तों, अपने  तरीकों और पुराने ढर्रे पर ही जीना चाहता है.

हेमिंग्वे की कहानी में नहीं है बिल्ली 
जब कोई कलाकार अपनी कहानी, बिंब या घटनाएं अपने जीवन और उसके आस-पास घटित होते परिवेश में से लेता है, तो उसके कथ्य में एक तरह की निश्छलता और अबोधता नजर आती है. यही वजह है कि नाटक के निर्देशक शाहिदुल हेमिंग्वे की कहानी में अपनी स्थानीयता खोज लेते हैं. इसके अलावा कहानी में वह कुछ ऐसी चीजों को भी जोड़ देते हैं, जिससे हेमिंग्वे उनकी मिट्टी के और करीब आ जाते हैं. जैसे किबिल्ली. शाहिदुल कहते हैं कि 'बिल्ली हेमिंग्वे की कहानी में नहीं है, लेकिन उम्मीद तलाशते बोदई मेरी कहानी का अहम हिस्सा है. हमारे यहां मछुआरों के घर में बिल्ली बहुत आम है, जो बड़े चाव से मछली के कांटे को खाती है. कहानी में जब बोदई कई दिनों तक मछली पकड़ने में नाकाम रहता है, तो उसके घर पर रोज आने वाली बिल्ली भी उसके यहां आना बंद कर देती है. अब वह पड़ोस के घरों में जाने लगती है. बोदई इसमें भी उम्मीद यह कहकर ढूंढ लेता है कि जब उसका अच्छा समय लौटेगा, तो बिल्ली भी उसके घर वापस लौटेगी.
नाटक के निर्देशक शाहिदुल कहते हैं कि 'बिल्ली हेमिंग्वे की कहानी में नहीं है, लेकिन उम्मीद तलाशते बोदई मेरी कहानी का अहम हिस्सा हैं.
नाटक के निर्देशक शाहिदुल कहते हैं, 'बिल्ली हेमिंग्वे की कहानी में नहीं है, लेकिन उम्मीद तलाशते बोदई मेरी कहानी का अहम हिस्सा हैं.


नाटक 'कथा-कला' से ज्यादा 'दृश्य-कला'
अक्सर भारत रंग महोत्सव में जब गैर हिंदी भाषी नाटक शामिल होता है, तो नाटक देखने की दर्शकों कीउत्सुकता कम हो जाती है या फिर अच्छा नाटक देखने के बाद भी दर्शकों के मन में यह कसक रह जाती है कि अगर यह हिंदी भाषा में होता, तो इसे और बेहतर तरह से सराहा जा सकता था. इस पर शाहिदुल की राय कुछ अलग है. वह कहते हैं, 'शुरुआत में मैंने इसे हिंदी भाषा में ही मंचित करने के बारे में सोचा था. पर जब मैंने इसकी रिहर्सल शुरू की तो मैंने देखा कि हिंदी के संवादों से उत्पन्न होने वाली ध्वनियों में मुझे एक अपनापन सुनाई नहीं दे रहा है. संवाद अदायगी में एक्टर भी हिंदी भाषा के भाव को जहनी तौर पर महसूस नहीं कर पा रहे थे. मैंने फिर इसे मूल असमिया भाषा में करने का सोचा. मुझे नाटक हिंदी में सिर्फ इसलिए नहीं करना था कि लोगों को उसके संवाद समझ में आएं, क्योंकि नाटक सिर्फ संवाद नहीं, बल्कि यह कई कलाओं का गुलदस्ता होता है.' वैसे भी माना जाता है कि नाटक 'कथा-कला' से ज्यादा 'दृश्य-कला' है.चंकू निरंजन नाथ का सराहनीय अभिनय
अभिनय के लिहाज से बोदई के किरदार में चंकू निरंजन नाथ का काम सराहनीय रहा. उनके अभिनय में एक स्वाभाविकता नजर आती है. मंच पर उनकी उपस्थिति एक सहज सम्मोहन पैदा करती है. इसका श्रेय उनके अभिनय और दीखामोणि बोरा का आलेख दोनों को जाता है. कहानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच आए बदलाव की है, इसलिए बोदई के संवादों में इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो अब प्रचलन में नहीं रहे. इससे कथ्य और किरदार में एकरूपता दिखाई देती है. निर्देशक ने मंच पर मौजूद बाकी कलाकारों को किरदार कम, नेपथ्य और दृश्य-बिंब का हिस्सा ज्यादा बनाया है.

अद्भुत दृश्य बिंब पैदा करती प्रकाश परिकल्पना
नाटक की प्रकाश परिकल्पना आमतौर पर होने वाली प्रस्तुतियों से बिलकुल अलग और खास दिखाई देती है. प्रकाश की गहनता (इंटेंसिटी) को जानबूझ कर कम रखा गया है. इसके अलावा मंच पर अंधेरे और उजाले की मिलीजुली प्रकाश व्यवस्था दिखती है. इसमें कुछ छुपा रहता है और कुछ दिखाई पड़ता है. इससे एक अद्भुत दृश्य बिंब पैदा होता है. आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली एलईडी लाइट से निर्देशक परहेज करते हैं. उन्हें लगता है एलईडी लाइट से बनावटी पन आता है, जो नाटक के साथ मेल नहीं खाता. इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि लाइट किस कोण से मंच पर गिर रही है और अभिनेता के शरीर  के किस हिस्से पर पड़ रही है. नाटक में अलग-अलग कोण से और भाग पर दी जाने वाली लाइट अलग-अलग भाव और अर्थ पैदा करती है. अंधेरे और उजाले का मिश्रण दृश्य को एक पेंटिंग की तरह प्रस्तुत कर रहा था, जहां वह कुछ हिस्सों को उभार रहा था, कुछ हिस्सों को दबा रहा था.

नाटक में इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि लाइट मंच पर किस कोण से गिर रही है और अभिनेता के शरीर के किस हिस्से पर पड़ रही है.
नाटक में इसका खास ध्यान रखा गया है कि लाइट मंच पर किस कोण से गिर रही है और अभिनेता के शरीर के किस हिस्से पर पड़ रही है.


'सरप्राइज एलिमेंट' की मौजूदगी
नाटक में लगातार एक 'सरप्राइज एलिमेंट' बना रहता है. यह दर्शकों में अचानक कुछ अप्रत्याशित होने की उत्‍सुकता बनाए रखता है. निर्देशक कहते हैं नाटक की लय धीमी है, पर कुछ नया होने का रोमांच इसकी लय को उदासीन नहीं होने देता. जैसे कि मंच पर तह किए कपड़े से अचानक एक विशालकाय मछली बन जाती है. दर्शकों ने ऐसी कल्पना नहीं की थी. सेट में न्यूनतम चीजों का अधिकतम इस्तेमाल किया गया है. एक चौकोरनुमा बॉक्स, जो कभी नाव तो कभी घर में तब्दील हो जाता है. बड़े और लंबे कागजों का उपयोग, लाइट के संपर्क में आने पर बेहतरीन दृश्य सरंचना बनाते हैं. ये कागज कभी समुद्र की लहरें, कभी आकाश, कभी चिड़ियां, कभी तूफान, तो कभी सपनों की दुनिया रचते हैं. यही कागज जब चौकोरनुमा बॉक्स से टकराते हैं, तो लहरों की ध्वनि भी पैदा करते है. एक दृश्य में मछली के जाल को रस्सी की मदद से मंच के आगे के हिस्से में बांध दिया गया था, जो दर्शकों की आंखों में एक छलनी का आभास दे रहा था. इससे निर्देशक ने पेंटिंग में ब्रश स्ट्रोक जैसा अनुभव देने की सफल कोशिश की है. नाटक एक तरफ जहां 'गुलिवर', 'बेताल पचीसी' की दृश्य यात्रा की तरह चलता है, वहीं दूसरी तरफ बोदई की एकांत यात्रा से रूबरू कराता है. जहां उम्मीद, जिजीविषा और सकारात्मकता उसके हमराही बनकर चलते हैं. इस यात्रा में बोदई का अल्हड़पन भावुक करता है और बांधकर भी रखता है, कुछ वैसा ही जैसे निदा फाजली कहते हैं - 'यही है जिंदगी कुछ ख्‍वाब चंद उम्मीदें, इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो.'

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ब्लॉगर के बारे में
मोहन जोशी

मोहन जोशी रंगकर्मी, नाट्यकार

फ्रीलांस लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. एफटीआईआई पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन.

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First published: February 24, 2020, 4:04 PM IST
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