भोंसले- अस्मिता के टकराव में कुत्ते-बिल्ली और कौवे का दखल

कहानी एक रिटायर कांस्टेबल गणपत भोंसले की है. सेवानिवृत होने के बाद भोंसले के दस्तूरी जीवन की दफ्तरी लय टूटती है, जो धीरे-धीरे भोंसले को आन्तरिक और बाहरी रूप से ध्वस्त कर रही है. उसी दौरान एक बहन-भाई का परिवार उसके पड़ोस के चौल में किराए पर रहने आता

Source: News18Hindi Last updated on: June 30, 2020, 12:39 PM IST
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भोंसले- अस्मिता के टकराव में कुत्ते-बिल्ली और कौवे का दखल
मनोज बाजपेयी अभिनीत फिल्म ‘भोंसले’ की तस्वीर.
मनोज बाजपेयी अभिनीत फिल्म ‘भोंसले’ सोनी लिव के ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर हाल में रिलीज़ हुई.  हालांकि वर्ष 2018 से ही इस फिल्म की गुनगुनाहट देश-विदेश के फिल्म समारोह में सुनाई देने लगी थी, पर पिछले शुक्रवार को इसे विधिवत आम दर्शकों के लिए रिलीज़ किया गया. भोंसले को देखते हुए अक्सर अपर्णा सेन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘36 चौरंगी लेन’ की प्रमुख पात्र ‘मिस स्टोनहेम’ का सूनापन याद आता रहा. एक मायूस सी दोपहरी में 'कलकत्ता' की गालियों से गुजरती हाथगाड़ी में अकेली बैठी मिस स्टोनहेम या फिर स्थायी रूप से ख़राब हो चुकी लिफ्ट को अस्थायी रूप से बिगड़ी दर्शाता एक नोटिस, जिसे रोज़ पढ़ने के बाद सीढियाँ चढ़कर घर पहुँचती मिस स्टोनहेम या फिर पार्श्व में बजते रेडियो की धुन पर अपने लिए कॉफ़ी बनाती मिस स्टोनहेम. ये दृश्य रिसते-रिसते ज़ेहन में उतरते जाते हैं, उनके जीवन की इस धीमी लय से धीरे-धीरे दर्शक कदम मिलाने लगते हैं और फिर वो एक अनुभव-यात्रा पर चल पड़ते हैं . भोंसले को देखते हुए उसी एकाकीपन का एहसास होता है.

कहानी एक रिटायर कांस्टेबल गणपत भोंसले की है. सेवानिवृत होने के बाद भोंसले के दस्तूरी जीवन की दफ्तरी लय टूटती है, जो धीरे-धीरे भोंसले को आन्तरिक और बाहरी रूप से ध्वस्त कर रही है. उसी दौरान एक बहन-भाई का परिवार उसके पड़ोस के चौल में किराए पर रहने आता है. इस परिवार के साथ स्नेहिल जुड़ाव भोंसले को भाव-शून्यता और अमिलनसारिता से बाहर लाने का उत्प्रेरक बनता है. लेकिन कहानी का केन्द्रीय विषय महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों का विरोध और मराठी अस्मिता के पीछे की राजनीति को उजागर करता है. हालाँकि फिल्म ना तो पूरी तरह उत्तर भारतीयों के पक्ष में खड़ी दिखती है ना तो मराठी अस्मिता के आड़ में हो रहे विरोध को जायज़ करार देती है. पर ये ज़रूर इशारा करती है कि राजशाही ही लोकशाही को प्रभावित करती है.

महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के विरोध में भाषा भी एक अहम् मुद्दा है पर भोंसले के निर्देशक और लेखक देवाशीष मखीजा अपनी फिल्म में भाषा या शब्दों के मोहताज़ नहीं दिखते. देवाशीष कहानी को पूर्णतया दृश्य-श्रव्य के भरोसे लेकर चलते हैं. इसलिए उन्होंने फिल्म के मुख्य किरदार भोंसले को पूरी फिल्म में सिर्फ 20-21 संवाद ही दिए हैं. खासकर अकेलेपन, संवेदनशून्यता जैसे कई अमूर्त (एबस्ट्रक्ट) विषयों की पड़ताल करते समय भी वो शब्द अभिव्यक्ति की आसान राह नहीं लेते. वो मानते हैं कि हिंदी सिनेमा में शब्द-निर्भरता आवश्यकता से ज्यादा है जो फिल्म के शिल्प को रचनात्मक ढंग से खंगालने में बाधा बनती है, जबकि यूरोप का सिनेमा शब्दों के बंधन से मुक्त हो चुका है. देवाशीष प्रख्यात फिल्म निर्देशक स्टेनले क्यूब्रिक की उस बात को दोहराते हैं कि फिल्मकार को हर बार एक नई दृश्य संरचना गढ़नी होती है जो पहले कभी नहीं देखी गयी हो.

वैसे ये माना जाता है फिल्म की सबसे बड़ी खूबी कई बार उसकी खामी भी बन जाती है. एक लम्बे समय तक संवाद की अनुपस्थिति या संवाद की कमी फिल्म की लय यानि पेस को प्रभावित करती है, जो दर्शकों से धीरज की मांग करती है. खासकर ऐसे वक़्त में जब ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर वेब सीरीज़ की बहुलता ने कंटेंट की लय को बहुत फुर्तीला बना दिया है, ताकि दर्शक जब वेब सीरीज देखने बैठे तो वे  उसके सभी एपिसोड्स को एक बार में ही देखकर उठे. इसलिए अधिकांश दर्शकों को जो व्यावसायिक फिल्में और वेब सीरीज़ देखने के आदी हैं, उन्हें फिल्म की लय धीमी और शिथिल लगेगी.  दर्शकों को चाहिए कि वे अधीर हुए बिना, रूककर इस फिल्म को देखें और महसूस करें, तभी जाकर फिल्म आहिस्ता से आपके भीतर समाएगी.
अदृश्य शब्दों की तरह फिल्म में एक अदृश्य लेकिन खूबसूरत प्रेम कहानी भी है. हालाँकि ये प्रेम, कहानी की ऊपरी सतह पर आकर अपनी अभिव्यक्ति नहीं करता लेकिन कहीं अनकहा और अकथ्य ज़रूर है. फिल्म में सीता का किरदार निभा रही इप्शिता चक्रवर्ती सिंह कहती हैं ‘जब पहली बार सीता, भोंसले के घर की किवाड़ खटखटाती है, तो वो उसके सूनेपन और किसी भी तरह के प्रेम को प्रतिबंधित कर चुके उसके मन पर भी दस्तक देती है.’

पर फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका अभिनय है. खासकर मुख्य भूमिका में मनोज बाजपेयी की अदाकारी लाजवाब है. फिल्म में उनकी आँखें, चेहरा और शरीर अभिनय करते हैं. अपने चलने के अंदाज़, नज़रें उठाकर देखने का ढंग, निस्तेज भाव से खाना बनाने और दैनिक काम करने के तरीके में उनकी अभिनय की गहराई और सूक्ष्मता, इस बात का प्रमाण भी है कि वो क्यों फिलहाल हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हैं. हालांकि पिछले कई सालों से मनोज बाजपेयी ने चरित्र की आन्तरिकता (इन्टरनलाईजेशन) को बखूबी अपने अभिनय में उतारा है, जहाँ वो चरित्र के शरीर का व्याकरण खुद बनाते हैं. फिल्म ‘अलीगढ़’ इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है.

वैसे जहाँ मनोज बाजपेयी के अभिनय में भोंसले की जटिलता दिखती है वहीं सीता के किरदार में इप्शिता की सरलता और सहजता भी नज़र आती है .  टैक्सी चालक और मराठी मानुष का प्रतिनिधित्व करते विलास के किरदार में संतोष जुवेकर अपनी एक विशेष उपस्थिति दर्ज कराते हैं. फिल्म के निर्देशक देवाशीष मखीजा कहते हैं – ‘मेरे लिए एक्टर एक तरह  का टूल हैं  वैसे ही जैसे आप किसी सीन के लिए एक तरह की लाइट या फिर कैमरे का किसी विशेष लेंस या फिल्म के विशेष प्रोडक्शन डिज़ाइन का चयन करते हैं. फ़र्क सिर्फ इतना है कि एक्टर सबसे महत्त्वपूर्ण टूल है.  और अच्छा एक्टर वही है जो किसी दृश्य के लिए सबसे उपयुक्त टूल बनकर सामने आए.’

फिल्म में कई जगह कौआ, कुत्ते, बिल्लियाँ नज़र आते हैं, जो पालतू नहीं हैं.  ये जानवर दृश्य संरचना का अहम हिस्सा हैं पर प्रत्यक्ष तौर पर कहानी से उनका कोई लेना-देना नहीं है . इन जानवरों के माध्यम से निर्देशक ‘भीतरी’ और ‘बाहरी’ की बहस को और व्यापक बनाते हैं . वो इस ओर इशारा करना चाहते हैं कि मराठी मानुष और उत्तर भारतीय के संघर्ष  के बीच इस शहर पर इनका हक सबसे पुराना है, क्योंकि चौल या घर बनने से पहले ये जगह इनका आशियाना रही, जिनपर आज मनुष्य का कब्ज़ा है. फिल्म को देखते हुए हिंदी के जाने माने साहित्यकार कुंवर नारायण की एक टिपण्णी याद आती है  जो कहते हैं कि ‘कई बार फिल्म के कथानक से उसका रवैया ज्यादा अर्थपूर्ण होता है और इस रवैये में ही फिल्म का मूल अभिप्राय पढ़ा जाना चाहिए’
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
मोहन जोशी

मोहन जोशी रंगकर्मी, नाट्यकार

फ्रीलांस लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. एफटीआईआई पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन.

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First published: June 30, 2020, 12:39 PM IST
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