उत्कृष्ट अभिनय से उम्मीद जगाती मर्डर मिस्ट्री- ‘रात अकेली है’

अक्सर ‘मर्डर-मिस्ट्री’ फ़िल्म में दो तरह की दुनिया रची जाती हैं. एक जासूस और उसकी दुनिया, दूसरी क़त्ल की घटना और उससे जुड़े किरदार. 'रात अकेली है' में ये दोनों टकराते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 9, 2020, 4:08 PM IST
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उत्कृष्ट अभिनय से उम्मीद जगाती मर्डर मिस्ट्री- ‘रात अकेली है’
रात अकेली है के पोस्टर में एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी.
हाल में ही नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘रात अकेली है’ ‘मर्डर-मिस्ट्री’ है. फ़िल्म निर्देशक हनी त्रेहन की ये पहली फ़िल्म है, जो अगाथा क्रिस्टी के पेटेंट और प्रतिष्ठित सिद्धांत ‘कातिल कौन’ (हु डन इट) की तर्ज पर बनी है. हिंदी सिनेमा में ‘मर्डर-मिस्ट्री’ एक गुमशुदा शैली सी लगने लगी थी लेकिन एक लम्बे अन्तराल के बाद फ़िल्म ‘रात अकेली है’ में ये शैली फिर से दिखाई दी है. मर्डर मिस्ट्री के साथ अक्सर हम गरिष्ठ खाने सा बर्ताव करते हैं. जिसका ज़ायका तो स्वादिष्ट लगता है लेकिन पचने में तकलीफ़ देता है. हम ऐसी कहानियों को देखना तो पसंद करते हैं, पर मान्यता नहीं देना चाहते.

फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अभिनय पक्ष है. हनी त्रेहन कास्टिंग डायरेक्टर भी रहे हैं, इसलिए फ़िल्म की कास्ट सेलेक्शन अपने आप में बहुत मुफ़ीद दिखी. नवाज़ुद्दीन के उम्दा अभिनय का असर फ़िल्म पर स्थायी रूप से दिखता है. राधिका आप्टे ने जिस तरह का भावनात्मक सुर पकड़ा है और अपने किरदार के दर्द को अभिनय से आक्रोश और विद्रोह में तब्दील किया है, ये दर्शाता है कि वे क्यों इस वक़्त की बेहतरीन एक्ट्रेस में शुमार की जा रही हैं. नकारात्मक भूमिका में रवि साह अपनी एक्टिंग से गहरी निशानदेही छोड़ जाते हैं. जानदार डायलॉग से भूरपूर इस फ़िल्म में बिना संवाद के रवि ने गहरा असर पैदा किया है. रमेश चौहान की भूमिका में स्वानंद किरकिरे, फ़िल्म के पूरे घटनाक्रम में तटस्थ रहते हैं. अपने किरदार के इस विशिष्ट गुण को वे अपने अभिनय और संवाद अदायगी में बदल देते हैं. बिना संवाद के उतार-चढ़ाव और चेहरे पर एक निरपेक्ष भाव रखकर, स्वानंद ने शानदार अभिनय किया है. इसके अलावा पद्मावती राव, इला अरुण, आदित्य श्रीवास्तव भी निराश नहीं करते .

अक्सर ‘मर्डर-मिस्ट्री’ फ़िल्म में दो तरह की दुनिया रची जाती हैं. एक जासूस और उसकी दुनिया, दूसरी क़त्ल की घटना और उससे जुड़े किरदार. और जल्द ही ये दोनों दुनिया आपस में टकराती हैं. क़त्ल कानपुर शहर की बड़ी हवेली में होता है जिसकी छानबीन के लिए इंस्पेक्टर जटिल यादव यानि नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी कई जटिलता समेटे किरदार में नजर आते हैं. संदिग्ध यहाँ परिवार का ही कोई एक सदस्य है.

माना जाता है कि ‘मर्डर-मिस्ट्री’ की कहानी का मूल्यांकन अख़बार की ख़बर की तरह होता है. सामान्य तौर पर वो फ़िल्म ठीक-ठाक मानी जाती है, जिसमें समाचार की तरह 5 ‘डब्लू’ और एक ‘एच’ का जवाब मिल जाता है . मतलब की कोई क़त्ल (क्या)- कब, कहाँ, क्यों, किसने और कैसे हुआ इस जिज्ञासा की तृप्ति हो जानी चाहिए. ये फ़िल्म इस मामले में तसल्ली देती है.
‘कातिल कौन’ सिद्धांत वाली फिल्मों में कहानी गढ़ते समय आमतौर पर अंत पहले ही तय कर लिया जाता है और फिर अक्सर कहानी लिखने की यात्रा पीछे से आगे की तरफ चलती है .जहाँ अंत तक पहुँचने के लिए लेखक कुछ अवशेष या सुराग बीच-बीच में छोड़ता चलता है, जिनको जोड़कर दर्शक तार्किक रास्ते से मुक्कमल अंत देखता है. फ़िल्म में इन उपयुक्त सुरागों की कमी नज़र आती है. बल्कि फ़िल्म में लम्बा वक्फा बीत जाने के बाद कुछ सुराग अपने आप जुड़ते हैं और सहसा सारे राज़ खुल जाते हैं.

चूँकि फ़िल्म में क़त्ल के सुराग सही जगह और सही समय पर नज़र नहीं आते, इसलिए दर्शकों और जासूस के बीच जो कातिल ढूँढने की अदृश्य प्रतिस्पर्धा इस तरह की फिल्मों को दिलचस्प बनाती है वो इसमें नदारद है. कहानी ऐसे भी नहीं खुलती है कि हर किरदार संदेह के दायरे में आये. इस फ़िल्म में शक सिर्फ चंद किरदारों पर आकर ठहर जाता है. इन कमियों के बावजूद फ़िल्म दर्शकों को काफी हद तक बांधे रखती है.

फ़िल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक एकरंगी है. वो फ़िल्म में लगभग अनुपस्थित दिखता है. गाने अच्छे हैं लेकिन फ़िल्म के नैरेटिव से तारतम्य नहीं मिला पाते. पर स्मिता ने फ़िल्म के डायलाग बहुत चुस्त, दुरुस्त और छूटने के बाद सुनने का रस देने वाले लिखे हैं. जैसे ‘मुंह खोले तो भजन टपके, कहाँ से लाये ऐसी नार’, ‘हमारा जटिल जब वर्दी पहनकर धूप का चश्मा लगाकर निकलता है, एकदम अजय देवगन लगता है’ ‘हम सोचते थे हिम्मत ही नहीं है, फिर पता चला नीयत ही नहीं थी’.कई जगह कैमरा और लाइट फ़िल्म के दृश्य के भाव को गहराई देते हैं, ख़ासकर रात के दृश्यों में जिस तरह की लाइटिंग की गयी है वो उल्लेखनीय है. फ़िल्म के एक सीन में रात के समय एक ट्रक, कार का पीछा कर रहा है. इस दृश्य में हत्या की साजिश और मारे जाने के डर को दर्शाने के लिए जिस तरह कैमरे की गति और ट्रक की भयावह लाइट का प्रयोग किया है, वो बिना संवाद बोले ही सीन के उद्देश्य को संप्रेषित कर देता है. फ़िल्म का प्रोडक्शन डिजाईन काफी बढ़िया है - पुलिस चौकी में धूल खाती फाइलें, जटिल यादव का घर, रघुबीर सिंह की हवेली, हवेली की नौकरानी का घर आदि काफी रियल और प्रभावी लगता है.

फ़िल्म की पटकथा और कहानी भी स्मिता सिंह ने लिखी है. स्मिता ने महिला पात्रों को मजबूत और दमदार बनाया है, जो पुरुषों के आगे रोती, रहम मांगती, खड़े रहने के लिए पुरुष का कंधा तलाशती नहीं दिखती हैं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर ख़ुद पुरुष की मदद करती हैं. जो झूठी सामाजिक नैतिकता के आगे अपने चरित्र को साबित करने में नहीं जुटती. फ़िल्म में राधा का किरदार अपने रंग-रूप, कपड़े और स्वभाव को लेकर बेहद आश्वस्त नज़र आता है वहीं जटिल यादव अपने रंग को लेकर असहज दिखता है. निर्देशक हनी त्रेहन और पटकथा लेखिका स्मिता से ये उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में मर्डर-मिस्ट्री शैली पर और भी बेहतर फ़िल्में देखने को मिलेंगी . (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
मोहन जोशी

मोहन जोशी रंगकर्मी, नाट्यकार

फ्रीलांस लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. एफटीआईआई पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन.

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First published: August 8, 2020, 9:37 PM IST
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