गुरुदत्त: कैमरे में जिसने डाल दिए अपने प्राण

कई बार गुरुदत्त किरदार की भावनाओं की अभिव्यक्ति से ज्यादा उससे उपजने वाली प्रतिक्रिया को कैद करने को अहमियत देते हैं. इसलिए उनका कैमरा किसी किरदार की प्रतिक्रिया लेने के लिए एक सीधी लाइन में उसकी तरफ़ बढ़ता या ‘ज़ूम इन’ करता दिखता है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 15, 2020, 11:11 AM IST
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गुरुदत्त: कैमरे में जिसने डाल दिए अपने प्राण
जाने-माने अभिनेता गुरुदत्त.
कई बार हम यूं ही किसी फ़िल्मकार के बारे में दावा कर देते हैं कि वो अपने समय से आगे के फ़िल्मकार हैं. ये बात कहने की कोई पुख्ता वजह नहीं होती, पर जिनके काम से हम अभिभूत रहते हैं, उनकी किसी तात्कालिक विफलता पर पैबंद लगाने के लिए भी अक्सर हम ये तर्क दे दिया करते हैं. वैसे ये भविष्य तय करता है कि कोई अपने समय से आगे का फ़िल्मकार है. जब सही वक़्त आता है तब वो फ़िल्मकार अपनी कला के साथ पुनर्जीवित होता है, फिर शाश्वत बना रहता है. गुरुदत्त को हम ऐसे ही फ़िल्मकारों की श्रेणी में सबसे आगे रख सकते हैं.

अभी हाल में ही गुरुदत्त की जयंती थी. एक निर्देशक के रूप में अगर आप गुरुदत्त की तलाश करें, तो अपनी खोज को आपको दो हिस्सों में बांटना होगा. एक प्यासा से पहले के गुरुदत्त और दूसरे, प्यासा और उसके बाद के गुरुदत्त. प्यासा से पहले की अपनी फ़िल्में जैसे बाज़ी, जाल, बाज़ और मिस्टर और मिस 55 में गुरुदत्त निर्देशक के रूप में अपनी विशिष्ट शैली और पहचान तलाशते दिखते हैं और प्यासा तक आते-आते वे अपनी मौलिक फिल्म भाषा ढूँढ लेते हैं. आगे की फिल्मों में वो उस मौलिक भाषा को तराशने का काम करते हैं.

कई बार गुरुदत्त के 'गुरुत्व' पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है. उनके अभिनय, निर्देशन और निर्माण के खातों में फिल्मों की फ़ेहरिस्त जितनी लम्बी है उसके मुकाबले गुरुदत्त की उम्र बहुत छोटी दिखती है. महज 39 वर्ष में ही उनकी मृत्यु हो गयी, लेकिन अपने पीछे वो पूरा एक फिल्म स्कूल छोड़ गए हैं .


गुरुदत्त पर अरुण खोपकर अपनी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किताब ‘गुरुदत्त-ए ट्रेजेडी इन थ्री एक्ट’ में रूमानियत पर दिलचस्प बात कहते हैं . वो बताते हैं कि ‘कलाकार की कला और उसके जीवन के बीच का गहन और घनिष्ट रिश्ता ही रूमानियत या रोमांटिसिज्म है’. ये रूमानियत गुरुदत्त की फिल्मों में नज़र आती है . इसलिए गुरुदत्त की फिल्म प्यासा, कागज़ के फूल और साहिब बीबी और गुलाम देखते वक़्त अक्सर आपको लगेगा कि आप उनके जीवन के कई हिस्सों से गुजर रहे हैं. इन तीनों फ़िल्मों को अगर आप देखें तो लगता है कि एक तरह से गुरुदत्त ने कई टुकड़ों में अपनी आत्मकथा कह दी है. हालाँकि इस तरह की रूमानियत में ये खतरा बना रहता है कि ये लोकप्रिय और व्यवसायिक नहीं होतीं। ये रूमानियत जीवन के सत्य से आपको एक मखमली पलायन नहीं देती बल्कि कटु साक्षात्कार कराती हैं. प्यासा से बड़ा उनके जीवन का भविष्यवक्ता क्या होगा, जिसमें एक कलाकार की मौत के बाद ही दुनिया उसका मोल समझ पाती है.
वैसे गुरुदत्त की रूमानियत का दायरा बहुत व्यापक है. गुरुदत्त ने कैमरे को अपने प्रतिनिधि की तरह देखा, और इसके जरिए वो एक विलक्षण दुनिया रचते रहे . उनका कैमरा एक मासूम प्रेमी की तरह रहा जो बड़ी तसल्ली और निश्छलता से महिला पात्रों को निहारता. ख़ासकर इश्क के शरारती मिजाज़ को इस अंदाज में कैद करता कि दर्शक जब-जब इसे देंखे, मोहब्बत के अपने खूबसूरत एल्बम को टटोलने लगें.

जैसे प्यासा में वहीदा रहमान जब पहली बार परदे पर आती हैं तो दर्शकों से उनका प्रथम परिचय ‘जाने क्या तूने कही’ गीत से होता है. इस गाने में कैमरा गुलाबो (वहीदा रहमान) का कुछ इस तरह पीछा करता है, कि मानो खड़े रह कर उन्हें ताक रहा हो. कैमरा ऐसा कोण लेता है जहाँ कभी सिर्फ उनकी आँखों या भौहों की थिरकती लय दिखती हैं, और दर्शकों के मन में एक सम्मोहन पैदा हो जाता है . दर्शकों को काफी देर बाद ये अहसास होता है कि गुलाबो की तरह कैमरे भी एक भ्रम रच रहा है, गुलाबो एक वेश्या है और ये पूरा खेल आकर्षण का छलावा.

प्यासा का दूसरा गाना ‘हम आप की आँखों में इस दिल को बसा दें तो’ को देखें. ये गीत ‘ड्रीम सीक्वेंस’ की तरह परदे पर उतरता है. माला सिन्हा का एक-एक नटखट भाव जिस तरह कैमरा अपने भीतर समाता है वो दर्शक के भीतर प्रणय की तड़प बढ़ा देता है. इस गाने की शुरुआत पर नज़र डालें तो हम देखते हैं कि चाँद से होते हुए सीढ़ियाँ ज़मीन पर आ रही हैं और माला सिन्हा धुंधले साये की तरह इन सीढ़ियों से नीचे उतरती दिखती हैं. यही छवियाँ भारतीय सिनेमा के लिए ‘नॉस्टेलजिया’ पैदा करती हैं. इसका श्रेय सिनेमेटोग्राफर वी के मूर्ति को भी जाता है, लेकिन ऐसा विज़न रचने के लिए गुरुदत्त को हमेशा याद किया जाएगा. गुरुदत्त और मूर्ति की जोड़ी ने ब्लैक एंड वाइट कैनवास पर फिल्मों को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया कि आज के रंगीन दौर की फ़िल्में उनके आगे फीकी दिखती हैं. उजाले और अँधेरे का मिश्रण जिस तरह से भावों के अनुरूप ढलता है वो एक कशिश भरा जादू कायम कर जाता है .
अक्सर कैमरे में छवियों को कैद करने के लिए कई तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. उदहारण के लिए यदि हमें आगे के हिस्से को  जिसे हम फ़ॉरग्राउंड कहते हैं, को उभारना होता है, तो कैमरे के लेंस को आगे के हिस्से में फोकस किया जाता है, और पीछे का हिस्सा यानि बैकग्राउंड ‘डीफोकस’ रहता है . या फिर पीछे के हिस्से या बैकग्राउंड को केंद्र में रखना होता है तो कैमरे में उसको फोकस किया जाता है . इसके अलावा एक तीसरा तरीका भी है जिसका गुरुदत्त ने खूब इस्तेमाल किया जिसे हम “डीप फोकस’ कहते हैं . इस तकनीक में कैमरे की पूरी छवि को फोकस में रखा जाता है  . गुरुदत्त इसका इस्तेमाल अपने किरदार को उसकी दुनिया के साथ स्थापित करने के लिए किया करते थे . गुरुदत्त अपने चरित्र को उसकी दुनिया से पृथक करके नहीं बल्कि उसको समग्रता में देखते थे.

कई बार गुरुदत्त किरदार की भावनाओं की अभिव्यक्ति से ज्यादा उससे उपजने वाली प्रतिक्रिया को कैद करने को अहमियत देते हैं.  इसलिए उनका कैमरा किसी किरदार की प्रतिक्रिया लेने के लिए एक सीधी लाइन में उसकी तरफ़ बढ़ता या ‘ज़ूम इन’ करता दिखता है. कई बार ‘ज़ूम इन’ करने के बजाए वो अपने किरदार को थिएटर के अंदाज़ में खुद आगे चलकर आने को कहते हैं . इसलिए गुरुदत्त की फिल्म में आपको अक्सर पात्र अँधेरे से उजाले के तरफ आगे आते नज़र आयेंगे.

गुरुदत्त साहब के अलग-अलग अंदाज.


इसके अलावा उनकी फिल्मों में कैमरा स्टाइलाइज्ड अंदाज़ में नज़र आता है. कई बार जब किसी पार्टी या जलसे में अँधेरे और उजाले में जब कैमरा बढ़ता है तो अक्सर आपको किरदार जड़ नज़र आयेंगे, जो एक तरह से  पेंटिंग की अनुभूति देते हैं . इस शॉट को क्रियाशील बनाने के लिए कोई एक शख्स सिगरेट पीता नज़र आएगा, सिगरेट से निकलता धुंआ पेंटिंगनुमा सीन को मद्धम गति दे देता है.

इन सब प्रयोग को देखते हुए हम कह सकते हैं कि गुरुदत्त एक तरह के ‘रेफेरेंस’ फ़िल्मकार है. जिनसे सीखने-समझने के लिए कई फ़िल्मकार उनकी फिल्मों को अक्सर टटोलकर-पलटकर देखते हैं, ताकि फिल्म निर्माण के उन महीन सूत्रों का अध्ययन कर पाएं जो गुरुदत्त को 'फिल्म- गुरु' बनाते हैं .

(यह लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
मोहन जोशी

मोहन जोशी रंगकर्मी, नाट्यकार

फ्रीलांस लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. एफटीआईआई पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन.

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First published: July 14, 2020, 6:24 PM IST
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