लाइव टीवी

'सांसों का सातवां व्यूह' तोड़ेंगी कठपुतलियां?

आधुनिक पपेट (Puppet theatre) की ट्रेनिंग के लिए कोई संस्थान तक नहीं है, जो कुछ हो रहा है वो व्यक्तिगत प्रयासों के बूते ही हो पा रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 21, 2019, 4:48 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
'सांसों का सातवां व्यूह' तोड़ेंगी कठपुतलियां?
अनुरूपा द्वारा निर्देशित महाभारत का एक दृश्य. फोटो सौजन्य : कठकथा आर्ट ट्रस्ट
महाभारत का सबसे मार्मिक दृश्य. कौरवों के चक्रव्यूह में फंसा अभिमन्यु. एक तरफ धुरंधर योद्धा और दूसरी तरफ उनसे मुकाबला करता एक अकेला अभिमन्यु. छह व्यूह तोड़े और सातवें व्यूह में मारा गया अर्जुन पुत्र. दुख का ये संसार गढ़ा कठपुतलियों ने और वहां मौजूद हर शख्स को मानो काठ मार गया. कठपुतलियां शौर्य की दास्तान में उदासी का संसार गढ़ रही थीं और आंसुओं से सराबोर थीं वहां मौजूद हर आंखें. इनमें शरीक था केरल का वह परिवार भी जो अपने बेटे की मौत के बाद मायूस था.

बेटे की चिता को हाल में ही अग्नि दी और तेरहवीं पर कठपुतली के कलाकारों को अभिमन्यु की कथा कहने के लिए बुला लिया. कठपुतलियां कैसे हमारी सांसों से संवाद करती हैं, इसकी मिसाल दिखी उस गमजदा परिवार के बीच. लेकिन अफसोस कठपुतली कला की ये परंपरा भी मानो एक साथ कई व्यूह में घिरती जा रही हैं, पता नहीं वो सातवें व्यूह को तोड़ अपनी सांसें कायम भी रख पाएंगी कि नहीं.

अनुरूपा द्वारा निर्देशित महाभारत का एक दृश्य. फोटो सौजन्य : कठकथा आर्ट ट्रस्ट


बहरहाल, कठपुतली कलाओं पर रिसर्च कर रहीं और इन्हें जिंदा रखने की सतत कोशिशों में जुटी अनुरूपा के पास कठपुतली कलाकारों से जुड़े तमाम किस्से और तथ्य हैं, जो हमारे 'काठ-हृदय' को कंपित करते हैं. अनुरूपा बताती हैं कि आज कठपुतली सिर्फ एक कला ही नहीं है वो समाज के लिए ‘थेरेपी’ भी है. मंच पर मौजूद कठपुतलियां अपनी रचनात्मक ताकत दर्शकों से लेती हैं, वो दर्शकों से हौसला अफजाई की कोई उम्मीद नहीं रखतीं, बल्कि वो दर्शकों को इसका हिस्सा बना लेती हैं, अपना हमसफर बनाकर बोलती-बतियाती हैं.
कठपुतली कला की दुनिया में जब कहानी अपना विस्तार लेना शुरू करती है तो आप भी उस कहानी के हमराही बन जाते हैं- साथ खुश होते हैं, साथ-साथ गमगीन भी.


विधा के केंद्र में कठपुतली है, जिसमें कहने को न तो जीवन है, और ना स्पंदन और ना संवेदनाएं. लेकिन सच तो ये है कि इन कठपुतलियों के जरिए एक प्रभावशाली भावनात्मक दुनिया की रचना होती है. जिसकी धड़कन आप हर पल महसूस करते हैं. पपेटियर कहानी में कुछ अपनी कहता है तो कुछ 'अनकहा' दर्शक की कल्पना के लिए छोड़ देता है. ऐसे में ये कठपुतली प्रस्तुति दूसरी विधाओं के मुकाबले ज्यादा जीवंत होती चली जाती है और कहानी के आखिर-आखिर तक हर दर्शक खुद ही पपेटियर हो जाता है.

अनुरुपा रॉय आधुनिक पपेट थिएटर का एक महत्वपूर्ण नाम है. उनकी प्रस्तुति देखने के बाद कठपुतली थिएटर को लेकर आपके कई सारे भ्रम टूट जाते हैं. इन प्रस्तुतियों को देखने के बाद आप न तो कठपुतली को किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित कर पाएंगे और न ही किसी आयु विशेष के दायरे में बांध पाएंगे. कठपुतलियां राजस्थान के आपके तथाकथित दायरे को तोड़ बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी का कला माध्यम नजर आने लगेंगी.
तोलपावाकुथु’- छाया कठपुलती  (गूगल)


कठपुतली पर बात करते हुए बताते चलें कि परम्परागत कठपुतली और आधुनिक कठपुतली की दो धाराएं यहां भी नजर आती हैं. परंपरागत कठपुतली का एक रिवायती ढांचा मौजूद है, जो बंधी हुई सीमाओं में चलता है. जो एक समुदाय विशेष द्वारा प्रस्तुत की जाती है. उदाहरण के लिए केरल की ‘तोलपावाकुथु’- छाया कठपुलती. तोलपावाकुथु में कथा कम्ब रामायण की होती है. ये केरल के भद्रकाली मंदिर में खेली जाती है. आधुनिक कठपुतली धर्म और परंपरा के दायरे तोड़ आधुनिक जीवन शैली की कथाओं, बिम्बों और प्रयोगों तक विस्तार पाती है.

अनुरुपा का कहना है कि परम्परागत पपेट थिएटर में और आधुनिक पपेट थिएटर की चुनौतियां बिलकुल अलहदा हैं. परम्परगत पपेट थिएटर अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है, अपने वास्तविक स्वरुप को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है. तो वहीं आधुनिक पपेट थिएटर के लिए अपना अलग दर्शक वर्ग तैयार कर पाना आसान नहीं है.

आधुनिक पपेट की ट्रेनिंग के लिए कोई संस्थान तक नहीं है, जो कुछ हो रहा है वो व्यक्तिगत प्रयासों के बूते ही हो पा रहा है.


एक समय था जब इसकी वृहद समाजिक पैठ थी. विवाह जैसे सबसे बड़े सामाजिक कार्य कठपुतली कलाकार ही सिद्ध करते थे. विवाह के लिए रिश्ते एक परिवार से दूसरे परिवार कठपुतली कलाकार ही ले जाया करते थे. जब यह कला अपने उरूज पर थी तब सत्ता और व्यवस्था पर उन्हीं की उपस्थिति में कठपुतली कलाकार बेमुरव्वत टिप्पणी करते थे. उनको ये अघोषित अधिकार स्वयं सत्ताधीशों द्वारा मिला हुआ था. अंग्रेजों के सामने कठपुतली प्रतिरोध सबसे धारधार हथियार थी. अंग्रेज बाद में इनसे इतना डर गए कि कई जगह इनके प्रदर्शन पर प्रतिबंध तक लगा दिया. पर आज पपेट कला के लिए सरकार की उदासीनता का ये आलम है कि हमारे पास सामान्य आंकड़े तक नहीं हैं कि कितने कलाकार बचे हैं, इनकी आय के स्रोत क्या बचे रह गए हैं और कितनी प्रस्तुतियां मुमकिन हो पा रही हैं. परम्परागत कठपुतली के अधिकांश दिग्गज 70 की उम्र लांघ चुके हैं. इन कलाकारों के लिए अभी से कोई सपोर्ट सिस्टम हमने तैयार नहीं किया तो पपेट कला का सातवां व्यूह टूटेगा, इसकी उम्मीद बेहद कम है.

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. FTII पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स किए हुए. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन कर चुके हैं.)
facebook Twitter whatsapp
ब्लॉगर के बारे में
मोहन जोशी

मोहन जोशी रंगकर्मी, नाट्यकार

फ्रीलांस लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. एफटीआईआई पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन.

और भी पढ़ें

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए ब्लॉग से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: October 21, 2019, 1:10 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading