‘द डिसाइपल’ एक फिल्मकार की जिद की उपज है, इसी ने फिल्म को खास बनाया है

फिल्म ‘द डिसाइपल’ (The Disciple) कई नामी और बड़े अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रशंसित और पुरस्कृत भी हुई है. ‘द डिसाइपल’ चैतन्य तम्हाणे (Chaitanya Tamhane) की पहली फिल्म ‘कोर्ट’ से अधिक चर्चा में रही, पर कोर्ट इस फिल्म के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण और बेहतर फिल्म है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 5, 2021, 9:42 PM IST
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‘द डिसाइपल’ एक फिल्मकार की जिद की उपज है, इसी ने फिल्म को खास बनाया है
चैतन्य तम्हाणे की ये फिल्म कला की शुद्धता और जीवन की व्यवहारिकता के अंतर्विरोध की कहानी है.
इटली के जाने-माने फिल्मकार फेदेरिको फेलीनी ने कहा था कि मेरी कोशिश है कि मैं अपनी फिल्मों को घटनाक्रम के विकास से मुक्त कर कविता के ज्यादा निकट लाऊं, जहां छंद और लय हों. ‘द डिसाइपल’ (The Disciple) का मुख्य किरदार, शरद नेरुलकर जब आधी रात में मुंबई की सुनसान सड़क पर बाइक चला रहा होता है तो फेलीनी के इस कथन के मायने समझ आते हैं.

बाइक एक मद्धम गति से बढ़ रही है... पर चाल इतनी धीमी भी नहीं कि बेवजह का ‘स्लो मोशन’ पैदा करे, जहां किरदार के आसपास का वातावरण धुंधला हो जाए या फिर गाड़ी चलने का अहसास ही न हो. पूरी फिल्म शरद की  बाइक की तरह छंद और लय के साथ कविता सी चलती है. कान में लगे इयरफोन से ‘माई’ की कांपती आवाज में निकलती कला की सीख जिस तरह धीरे-धीरे शरद के भीतर जज्ब होती है, ठीक उसी ठहराव के साथ फिल्म भी जेहन में उतरती है.

चैतन्य तम्हाणे की ये फिल्म कला की शुद्धता और जीवन की व्यवहारिकता के अंतर्विरोध की कहानी है. फिल्म का मुख्य पात्र शरद नेरुलकर शास्त्रीय संगीत की ख्याल गायकी को पूरी शिद्दत से साधने में लगा है. सच्चे साधक की तरह वो गुरु के  प्रति पूर्ण समर्पित है. शरद की दुनिया में कई गुरु हैं. एक, जिनसे वो संगीत सीखता है, दूसरे, उसके पिता जो किस्सों और यादों के शक्ल में दिखते हैं और तीसरी हैं ‘माई’, जो उनके गुरु की गुरु हैं. माई को न तो शरद ने देखा है, न ही उनकी गायकी सुनी है. अलबत्ता उसके पास माई के शिष्यों को दिए सबक के ऑडियो टेप्स ज़रूर हैं, जो उसके पिता से उसे विरासत में मिले हैं.

शरद अलग अलग समय में  अलग अलग गुरुओं की दुनिया में शरण लेता है. कला की साधना में अदनी सी रुकावट न आ जाए इस वजह से न तो वो कोई  नौकरी कर रहा है और ना ही विवाह.  यहाँ तक कि अपने परिवार से भी दूरी रखता है. मां को अनदेखा करता है पर गुरु की पूरी देखभाल करता है. घर की जिम्मेदारी नहीं उठाता पर गुरु के सारे दायित्व अपने सर पर लेता है. पर संगीत की साधना के बाद भी वो संगीत को साध नहीं पाता.
फिल्म में शरद और संगीत का रिश्ता उस बच्चे और गुब्बारे की तरह है, जहां गुब्बारा पकड़ने के लिए बच्चा जितनी तेज़ी से हाथ बढ़ाता है, वो पकड़ में आने की जगह और दूर छिटक जाता है.

शरद का किरदार उसके पिता के प्रतिरूप की तरह सामने आता है .  ख्याल गायकी के लिए उसके मन में जुनून और इच्छा तो है पर अच्छा गायक बनने के लिए जिस काबिलियत की ज़रूरत है वो हुनर वो हासिल नहीं कर पाता. शरद के भीतर भी कई अंतर्विरोध हैं जैसे एक तरफ संगीत के माध्यम से आध्यात्म को पाने के लिए सभी सांसारिक सुखों और बंदिशों को छोड़ने की कोशिश में लगा है वहीं दूसरी तरफ माई के टेप को सिर्फ अपने तक सीमित रखता है. वो गुरु की सेवा पर भी एकाधिकार चाहता है . अपने गुरु को कहता है कि ‘आपको पैसे कि ज़रूरत तो मुझसे कहियेगा, किसी और से मांगने कि ज़रूरत नहीं है’.

फिल्म को देखने पर लगता है कि उसकी कहानी को किसी एक धागे से नहीं बांधा गया है बल्कि कई कलाकारों के निजी अनुभवों और कहानियों के पैबन्दों को जोड़कर खूबसूरत कलात्मक पोशाक बनाई गयी है. फिल्म में एक किस्सा भी है जहाँ एक किरदार कहता है ‘पंडितजी ने एक बार कहा कि वो राग ललित बजायेंगे’. एक दर्शक ने कहा कि अभी तो पिछले हफ्ते दिल्ली में आपने ललित बजाया था, कुछ नया सुनाइए. इस पर पंडितजी ने कहा कि मैं एक हफ्ते से नहीं पिछले दो महीने से ललित ही बजा रहा हूं. ये राग मुझसे रूठ गया है उसे मनाने की कोशिश कर रहा हूं. उस दिन उन्होंने कमाल का ललित बजाया’.
कई बार ये किस्से कहानियां ही लोगों को, कला के कलात्मक पक्ष से ज्यादा अपनी ओर आकर्षित करती है. आगे जाकर कला जब अनुशासन और प्रतिभा की  माग करती है, तब वास्तविकता और इच्छा का फासला बढ़ जाता है .

हालांकि कला को लेकर ये सवाल कोई  नए नहीं है पर चैतन्य तम्हाणे ने अपनी एक अलग सिनेमाई भाषा से जिस तरह शरद की आतंरिक यात्रा के माध्यम से इन सवालों को प्रस्तुत किया है वो इस फिल्म को महत्वपूर्ण बनाती है. कैमरे पर स्थायी और लम्बे शॉट्स आपको उस दुनिया में  सीढ़ी दर सीढ़ी आराम से उतरने का मौका देते हैं  जहां कथानक बिना उछल कूद किए विशुद्ध अनुभव देता है. कैमरे पर स्थायी और लम्बे शॉट्स और न के बराबर क्लोजअप का इस्तेमाल, चैतन्य की मेहनत को भी दर्शाते हैं . इस तरह के प्रयोग में प्राय: एक छोटी सी गलती होने पर पूरा सीन दुबारा शूट करना पड़ता है जो समय, पैसे और संयम की मांग करती है . ऊपर से इस फिल्म के अधिकांश एक्टर गैर पेशेवर थे ऐसे में ये चुनौती कई गुना बढ़ जाती है .

‘द डिसाइपल’ एक फ़िल्मकार की ज़िद की उपज है. शायद इसी ज़िद ने इस फिल्म को विशिष्ट भी बनाया है. विख्यात फ़िल्मकार अल्फांसो क्वारोन भी इस फिल्म से कार्यकारी निर्माता के रूप में जुड़े हुए हैं. ये फिल्म कई नामी और बड़े अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रशंसित और पुरस्कृत भी हुई है.

‘द डिसाइपल’ चैतन्य तम्हाणे की पहली फिल्म ‘कोर्ट’ से अधिक चर्चा में रही, पर कोर्ट इस फिल्म के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण और बेहतर फिल्म है. ठहराव पसंद न करने वालों लोगों को ये फिल्म दुरूह और धीमी लग सकती है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
मोहन जोशी

मोहन जोशी रंगकर्मी, नाट्यकार

फ्रीलांस लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. एफटीआईआई पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन.

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First published: May 5, 2021, 9:40 PM IST
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