गुलदी और प्रभात दा का ‘एलबीटी’ आज संकट में क्यों?

एलबीटी ट्रस्ट से जुड़े लोग इस संस्थान को बचाने के लिए अपने स्तर पर हर संभव कोशिश कर रहें हैं पर बिना सरकारी मदद के ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल नज़र आ रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 25, 2020, 11:32 AM IST
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गुलदी और प्रभात दा का ‘एलबीटी’ आज संकट में क्यों?
एलबीटी की बैले प्रस्तुति 'रामायण'
भोपाल स्थित रंगश्री लिटिल बैले ट्रुप (एलबीटी) नृत्य और नाट्य से जुड़ी देश की अग्रणी कला संस्था है. कला-संस्कृति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों में शायद ही कोई ऐसा होगा जो इस संस्था के नाम से वाकिफ़ न हो. इस संस्थान का 68 वर्ष का एक लम्बा गौरवशाली इतिहास रहा है. इस संस्थान ने आधुनिक नृत्य के जन्मदाता कहलाने वाले उदयशंकर की सांस्कृतिक विरासत को नए प्रतिमान देने का काम किया. शुरुआत में  स्व. शांतिबर्द्धन और उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी गुल बर्द्धन (गुल दी ) और प्रभात गांगुली (प्रभात दा ) ने इसकी परवरिश कर इसे देश के  शीर्ष कला संस्थान के रूप में स्थापित किया.

रचनात्मक नृत्य शैली के लिए प्रभात दा और गुल दी को शिखर सम्मान और संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.  इसके अलावा गुल दी को पद्मश्री से भी नवाज़ा गया. एलबीटी की बैले प्रस्तुति 'रामायण' को संगीत नाटक अकादमी ने 'बैले ऑफ द सेंचुरी' का सम्मान भी दिया था. गुल दी और प्रभात दा ने इस संस्था को स्थापित और संचालित करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया. आज ये एलबीटी संस्था एक घोर आर्थिक संकट से गुजर रही है.

एलबीटी के कैंपस में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का क्षेत्रीय संस्थान मध्य प्रदेश स्कूल ऑफ़ ड्रामा चला करता था. मध्यप्रदेश सरकार किराये के रूप में करीब एक लाख रूपए प्रति माह संस्थान को दिया करती थी. लेकिन कोरोना संकट के दौर में राज्य सरकार ने अपनी ख़राब माली हालत का हवाला देते हुए, एलबीटी के परिसर से मध्य प्रदेश स्कूल ऑफ़ ड्रामा को स्थानांतरित करने का फैसला किया है. संस्थान के लिए ये किराया राशि कई सारे जरूरी खर्चों को जुटाने का जरिया थी. संस्थान से जुड़े लोग इसे एक तरह से संस्कृति मंत्रालय, मध्यप्रदेश सरकार द्वारा एलबीटी को दिए जाने वाली अप्रत्यक्ष मदद की तरह देख रहे थे. अचानक इस तरह आय का स्रोत बंद हो जाने से एलबीटी पर गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है.

कोरोना महामारी के चलते सांस्कृतिक प्रदर्शन पर प्रतिबन्ध के कारण एलबीटी संस्थान किसी भी वैकल्पिक तरीके  से भी आर्थिक सहायता जुटा सकने में खुद को असमर्थ पा रहा है. वर्तमान परिस्थितियों में कोरोना की भयावहता को देखकर लगता नहीं कि सरकार सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति जल्द ही देगी. चार-पांच महीनों में यदि प्रदर्शन की अनुमति मिल भी जाती है तो ये कह पाना मुश्किल है कि कितने दर्शक सभाग्रह में आयेंगे.  ऐसे में एलबीटी का भविष्य सरकार के वित्तीय सहयोग पर ही निर्भर करता है .
पद्मश्री से सम्मानित,जानेमाने रंगकर्मी बंसी कौल ने हाल में ही एक फेसबुक लाइव के दौरान एलबीटी के भविष्य को लेकर अपनी गहरी चिंता ज़ाहिर की. बंसी कौल ने कहा “ऐसे वक्त में एलबीटी के लिए ड्रामा स्कूल से मिल रहा 'किराया' एक तरह से 'वेंटिलेटर' का काम कर रहा था. सांस्कृतिक संस्थाओं की सांसों के संकट के इस दौर में 'वेंटिलेटर' का हट जाना मेरे लिए एक दुखद और परेशान कर देने वाली घटना है.”


एलबीटी की कीर्ति यात्रा साझा करते हुए बंसी कौल आगे कहते हैं  कि मुंबई, ग्वालियर के बाद एलबीटी ने भोपाल को अपना कर्मक्षेत्र बनाया. ये भोपाल शहर के लिए बड़े नाज की बात है कि एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बैले संस्था यहां काम कर रही है. प्रभात दा और गुल बर्द्धन दी ने अपनी जिंदगी की जमा पूंजी इस संस्था को खड़ा करने में लगा दी. जब तक सांसें चलीं, एलबीटी के बारे में सोचते रहे. गुल दी और प्रभात दा ने लोगों से चंदा मांगा, साथियों के आगे हाथ पसारे. ये सब कला संस्था को जिंदा रखने के लिए किया. एलबीटी ने दुनिया के 30 से ज्यादा मुल्कों में शो किए. देश के तमाम शहरों में प्रदर्शन किया. भारतीय संस्कृति को 'रामायण' जैसे बैले के जरिए लाखों लोगों तक पहुंचाया. वो ये भी पूछते हैं कि खेलों में पदक जीत कर लौटने वाले खिलाड़ियों को केंद्र और राज्य सरकारें, सामाजिक संस्थाएं बड़ी सम्मान राशि देती हैं, उनकी हौसला-अफजाई के लिए तमाम उपाय किए जाते हैं. सांस्कृतिक संस्थाओं और कलाकारों को भी एक अलग नजरिए से देखना होगा, सम्मान देना होगा.

एलबीटी स्थित मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय का पूर्व परिसर.
एलबीटी ट्रस्ट से जुड़े लोग इस संस्थान को बचाने के लिए अपने स्तर पर हर संभव कोशिश कर रहें हैं पर बिना सरकारी मदद के ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल नज़र आ रहा है. एलबीटी की शिकायत सरकारों से नहीं है. कोरोना संकट के बीच एलबीटी से मध्यप्रदेश ड्रामा स्कूल को कहीं और शिफ्ट किया जाना वक्त की जरूरत हो सकता है लेकिन जब बात सांस्कृतिक संस्थाओं की हो तो तकाजा कुछ और भी होता है, होना चाहिए. भोपाल के रंगकर्मी तो अब ये सवाल भी करने लगे हैं कि 10-12 लाख सालाना की राशि की बचत तो कई और मदों में कटौती के जरिए भी की जा सकती थी.

कुछ समय पहले, अपने एक लेख के लिए मैं जापान की परम्परागत कठपुलती कला ‘बुनराकू’ पर अध्ययन कर रहा था.  बुनराकू के प्रति जापानी सरकार और लोगों के सम्मान का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस कला को संजोने और इसे संस्थागत तरीके से चलाने वाले दिग्गज कलाकारों को सरकार ‘राष्ट्रीय धरोहर’ (लिविंग नेशनल ट्रेजर) घोषित कर देती है. इनसे जुड़े लोगों और संस्थानों को जापान सरकार अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और गरिमा से जोड़ कर देखती है . ऐसे में भारत में, जिसकी सांस्कृतिक परम्परा बाकी देशों से ज्यादा समृद्ध और गौरवशाली है, क्यों अपने कला संस्थानों को अपने पैरों पर खड़ा रखने की मुकम्मल रणनीति नहीं बनती.
ब्लॉगर के बारे में
मोहन जोशी

मोहन जोशी रंगकर्मी, नाट्यकार

फ्रीलांस लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. एफटीआईआई पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन.

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First published: June 22, 2020, 5:13 PM IST
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