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शहरी परिंदों को नहीं सुहाता ध्वनि प्रदूषण, लॉकडाउन के दौरान इन्हें आसानी से मिले सकेंगे जोड़ीदार

COVID-19 के कारण जो लॉकडाउन (Lockdown) इस समय है, वह परिंदों के लिए बहुत ही सुकून देनेवाला है. शोर का स्तर ज्यादा होने से चिड़ियों में सोने के तरीके बाधित हो जाते हैं.

Source: News18India Last updated on: April 1, 2020, 11:15 PM IST
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शहरी परिंदों को नहीं सुहाता ध्वनि प्रदूषण, लॉकडाउन के दौरान इन्हें आसानी से मिले सकेंगे जोड़ीदार
बीकानेर में संदिग्ध कबूतर को पुलिस ने अपने कब्जे में लिया है. (फाइल फोटो)
एन शिव कुमार

माना जाता है कि जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण (sound pollution) का मानव स्वास्थ्य पर काफी असर डालती हैं. लेकिन दिन रात महानगरों में कलरव करने वाले परिंदों के लिए भी ये बड़ा खतरा बन चुकी है. दरअसल, यातायात से होनेवाला बढ़ता ध्वनि प्रदूषण परिंदों के आपस के संवाद को प्रभावित करता है. इन परिंदों को अपने संवाद को सुधारने के लिए अपने सुरों की लंबाई और उनकी आवृत्ति को बदलना पड़ रहा है. परिंदे संगीतमय कलरव से अपनी विशेष भाषा में संवाद करते हैं और अपने जोड़ीदार की तलाश इसके माध्यम से करते हैं. वे अपने बच्चों से बातचीत के लिए भी इसका प्रयोग करते हैं और अपने समूह के अन्य परिंदों को कहीं पर चारे की उपलब्धता के बारे में जानकारी देने के लिए इसी तरह के संगीतमय कलरव का प्रयोग करते हैं.

परिंदे मार्च और अप्रैल में बनाते हैं घोंसला

भारत में कई प्रजातियों के परिंदों के लिए मार्च और अप्रैल का महीना घोंसला बनाने का होता है. अपने जोड़ीदार के साथ घोंसला बनाकर ये इनमें अंडे देते हैं और अपने बच्चों को पालते हैं. ये अपने बच्चों का काफी खयाल रखते हैं और अंडे से निकलने के बाद इनको नियमित रूप से दाना खिलाते हैं. यातायात के कारण होनेवाले शोर की वजह से परिंदों पर काफी बुरा असर पड़ता है. उन्हें अपने उपयुक्त जोड़ीदार को बुलाने के लिए अपनी आवाज को काफी बुलंद करना पड़ता है. जिसके लिए उन्हें ज्यादा ऊर्जा भी खर्च करनी पड़ती है.
मानव जनित शोर करता है परेशान

दरअसल, परिंदों की कई प्रजातियों को प्राकृतिक रूप से तेज आवाज़ों जैसे जलधारा (streams), जलप्रपात (waterfalls) और तेज गति की हवा से निकलनेवाली आवाज को सहने की आदत होती है. पर मानव जो शोर पैदा करता है उससे उनका वास्ता अपेक्षाकृत नया है और लगभग पूरी दुनिया में परिंदों को अब इन्हें बर्दाश्त करने की आदत डालनी पड़ रही है. ध्वनि हमेशा से प्रकृति में मौजूद रहा है पर शोरगुल से होनेवाला प्रदूषण पिछले एक सदी में और विशेषकर पिछले कुछ दशकों में नाटकीय रूप ज्यादा बढ़ा है. इसकी वजह से प्राकृतिक इको-सिस्टम की समग्रता भंग हो गई है. गाड़ियों के आवागमन से पैदा होने वाला शोर सबसे ज़्यादा होता है, हजारों की संख्या में फैक्ट्रियां और आसमान में उड़ते हजारों विमान भी इन परिंदों को काफी परेशान करते हैं.

शोरगुल के प्रति पक्षियों की प्रतिक्रिया पर कई शोध हुए हैं. इस तरह के शोध उनके कान, उनको होनेवाले तनाव के प्रति उनकी प्रतिक्रिया, उनकी परवाज (flight) और उनके चेहरे के भाव, उनकी खुराक और अन्य व्यवहारों पर केंद्रित रहे हैं.
जर्मनी में हुआ है अध्ययन

जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर ओर्निथोलॉजी में शोधकर्ताओं की एक टीम ने शोर के कारण अंडे देनेवाली चिड़ियों में तनाव (stress) हार्मोन के स्तर, उनके स्वास्थ्य और प्रजनन पर पड़नेवाले प्रभावों का अध्ययन किया है. अध्ययन के दौरान चिड़ियों के दो समूहों में से एक का शोरगुल वाले वातावरण में पालन-पोषण किया गया. जबकि दूसरे समूह को इससे दूर रखकर बड़ा किया गया. शोर में जिन्हें पाला गया, उन्हें उनके प्रजनन अवधि के दौरान म्यूनिख के कई व्यस्त चौक-चौराहों पर होनेवाले यातायात से होने वाली तेज आवाज के संपर्क में रखा गया.

ऐसे बच्चे जिनके मां-बाप को यातायात के शोर के संपर्क में रखा गया, उनका आकार उन चिड़ियों के बच्चों के आकार से छोटा था, जिन्हें शोर से दूर शांत जगह पर प्रजनन के लिए रखा गया. शोधकर्ता इस बात से इंकार नहीं कर रहे कि शोर का दीर्घकालिक प्रभाव चिड़ियों के इन बच्चों पर नहीं पड़ता. शोधकर्ता इस बारे में निश्चित हैं कि परिंदों की अलग-अलग प्रजातियों में शोर के प्रभाव की वजह से उनकी उम्र कम हो रही है. शोधकर्ताओं का मानना है कि शोर के प्रभाव में रहनेवाले पक्षियों के अंडे स्वस्थ नहीं होते और इनसे पैदा होनेवाले बच्चे तनावग्रस्त होते हैं और उनकी मौत जल्दी हो जाती है.

ध्वनि प्रदूषण कम होने से कलरव में नहीं पड़ेगी खलल

इस समय सन बर्ड (sun bird), बया (tailor bird), बुलबुल, कबूतर, गानेवाली चिड़िया (babblers), बसंतगौरी (barbets), और हुदहुद (woodpeckers) आदि चिड़िया बहुत ही खुश हैं. क्योंकि कोविड-19 के कारण लगी पाबंदियों के कारण ध्वनि प्रदूषण का स्तर कम हुआ है और वे निश्चिंत होकर प्रजनन कर सकती हैं और उनके कलरव में इस समय कोई ख़लल नहीं पड़ेगा.

COVID-19-Noise pollution is not good for urban birds-Lockdown helps to get partners
ध्वनि प्रदूषण परिंदों के आपस के संवाद को प्रभावित करता है. (फाइल फोटो)


यातायात का शोर इस तरह का डालता है प्रभाव

जर्मनी के एक वैज्ञानिक ने इस पर अध्ययन किया था. इस अध्ययन के अनुसार, “हमारे आंकड़े बताते हैं कि शहरी वातावरण में किसी अन्य माध्यम से होनेवाले शोर को छोड़ दें, तो यातायात से होने वाला शोर ही परिंदों की शारीरिक क्रिया को बदलने के लिए काफ़ी होता है और यह इनके विकास को प्रभावित करता है.” इसका अर्थ यह हुआ कि परिंदों की ऐसी प्रजाति जिनको देखकर हमको लगता है कि उन्होंने शहरी शोर से पटरी बिठा लिया है, वास्तव में वे भी यातायात के तीव्र शोर से प्रभावित होते हैं.

इस संदर्भ में शहर के परिंदे उन स्थानों पर जाने से बचते हैं जहां शोर ज्यादा पैदा होता है. वे उन जगहों का रुख करते हैं जहां अपेक्षाकृत शांति होती है. एक विशेषज्ञ का कहना है, “हरियाली जितनी ज़्यादा होगी, शोर से होनेवाले प्रदूषण से उतना ही ज़्यादा बचाव होगा. हालांकि, अगर ज्यादा हरियाली से भरा क्षेत्र नहीं है, तो चिड़ियों की संख्या नहीं बढ़ सकेगी”.


परिंदों के लिए सुकून देनेवाला है समय

COVID-19 के कारण जो लॉकडाउन इस समय है, वह परिंदों के लिए बहुत ही सुकून देनेवाला है. शोर का स्तर ज्यादा होने से चिड़ियों में सोने के तरीके बाधित हो जाते हैं. फिर प्रकाश और ध्वनि प्रदूषण के साथ मिलकर यह चिड़ियों के लिए कई तरह की विषम परिस्थिति पैदा कर देते हैं.

चिड़ियों के बच्चों पर पड़ता है दुष्प्रभाव

सड़कों पर चलने वाला ट्रैफिक ध्वनि प्रदूषण तो बढ़ाता ही है. इसके अलावा धूल से होनेवाला प्रदूषण भी चिड़ियों के छोटे बच्चों पर दुष्प्रभाव डालता है. अचानक पैदा होनेवाली तेज आवाज़ और बहुत ही तीव्र गति से बजने वाला संगीत छोटे चिड़ियों की जान ले लेता है, क्योंकि वे बहुत ही नाजुक होते हैं. बसंतगौरी जैसी चिड़िया जो कि दिन में 2-3 घंटे लगातार जोर-जोर से अपनी महिला जोड़ीदार को बुलाने के लिए पुकारता है, भारी शोर के लगातार संपर्क में रहने के कारण उनमें भी वैसी ही गड़बड़ियां पैदा होती हैं, जैसे मानवों में. जिसे हम पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर कहते हैं. शोरगुल में पलनेवाली चिड़ियों के शरीर के आकार छोटे हो जाते हैं. इसके अलावा उनके पंखों का विकास भी सही तरीके से नहीं हो पाता. इस कारण उनका जीना मुश्किल हो जाता है.

(एन शिव कुमार पक्षी विशेषज्ञ हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं.)
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First published: April 1, 2020, 11:15 PM IST
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