16 और 25 अगस्‍त को हुई देश में सबसे शर्मनाक घटना, दिल पसीज जाएगा भारत की इन त्रासदियों पर..!

16 और 25 अगस्‍त को हुई देश में सबसे शर्मनाक घटना, दिल पसीज जाएगा भारत की इन त्रासदियों पर..!
(Photo- CNN-News18)

तारीख : 16 अगस्त 2016

स्थान : दिल्‍ली

तारीख़ : 25 अगस्त 2016

स्थान : ओड़िशा के कालाहांडी जिले का सरकारी अस्पताल

इन तारीखों को जरा ध्‍यान से याद कीजिए। अगस्‍त का महीना हर साल आया और यूं ही चले गया। हालांकि ऐसा नहीं है कि 2016 के इस साल में 16 और 25 अगस्‍त का महीना और ये तारीखें कभी भूलने लायक नहीं है, या इतिहास में दर्ज हो गईं, नहीं हमारी स्‍मृति इतनी अच्‍छी नहीं है कि हम इसे लगातार याद करें, लेकिन एक बार इस देश के समाज की याददाश्‍त को आखिरी बार ही सही याद कर लिया जाए, लेकिन हम शुरुआत 16 अगस्‍त से नहीं करेंगे बल्‍कि 25 अगस्‍त से करेंगे। आइए जानते हैं इस तारीख की इस सबसे शर्मनाक कहानी को, जिसने इस देश को पूरी दुनिया के आगे शर्मसार कर दिया।

तारीख़ : 25 अगस्त 2016

स्थान : ओड़िशा के कालाहांडी जिले का सरकारी अस्पताल

अमंग देवी टीबी के इलाज के दौरान जीवन से अपनी जंग हार जाती है,  चूंकि वे एक आदिवासी, नाम, ’ दाना मांझी ' की पत्नी हैं।  एक गुमनाम मौत उन्हें गले लगाती है। लेकिन हमारी सभ्यता की खोखली तरक्की, राज्य सरकारों की कागज़ी योजनाओं,पढ़े-लिखे सफेदपोशों से भरे समाज की पोल खोलती इस देश में मानवता के पतन की कहानी कहती एक तस्वीर ने उस गुमनाम मौत को अखबारों और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियाँ बना दिया। जो जज्बात एक इंसान की मौत नहीं जगा पाई, वो जज्बात एक तस्वीर जगा गई। पूरे देश में हर अखबार में हर चैनल में सोशल मीडिया की हर दूसरी पोस्ट में अमंग देवी को अपनी मौत के बाद जगह मिली, लेकिन उनके मृत शरीर को एम्बुलेंस में जगह नहीं मिल पाई।

पैसे न होने के कारण तमाम मिन्नतों के बावजूद जब अस्पताल प्रबंधन ने शव वाहिका उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई, तो लाचार दाना मांझी ने अपनी पत्नी के मृत शरीर को कन्धे पर लाद कर अपनी 12 वर्ष की रोती हुई बेटी के साथ वहां से 60 कि. मी. दूर अपने गांव मेलघारा तक पैदल ही चलना शुरू कर दिया और करीब 10 कि.मी. तक चलने के बाद कुछ स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से और खबर मीडिया में आ जाने के बाद उन्हें एक एम्बुलेंस नसीब हुई।

पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर जिला कलेक्टर का कहना था कि मांझी ने वाहन का इंतजार ही नहीं किया। वहीं ' द टेलीग्राफ ' का कहना है कि एक नई एम्बुलेंस अस्पताल में ही खड़ी होने के बावजूद सिर्फ इसलिए नहीं दी गई क्योंकि किसी ' वीआईपी ' के द्वारा उसका उद्घाटन नहीं हुआ था।

इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि ऐसी ही स्थितियों के लिए नवीन पटनायक की सरकार द्वारा फरवरी माह में 'महापरायण ' योजना की शुरुआत की गई थी। इस योजना के तहत शव को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त में परिवहन सुविधा दी जाती है। बावजूद इसके एक गरीब पति ' पैसे के अभाव में ' अपनी पत्नी के शव को 60 कि. मी. तक पैदल ले जाने के लिए मजबूर है।

Patnayak

अगर परिस्थिति का विश्लेषण किया जाए तो निष्कर्ष यह निकलेगा कि बात दाना मांझी के पास धन के अभाव की नहीं है, बल्कि बात उस अस्पताल प्रबंधन के पास मानवीय संवेदनाओं एवं मूल्यों के अभाव की है। बात एक गरीब आदिवासी की नहीं है, बात उस तथाकथित सभ्य समाज की है, जिसमें एक बेजान एम्बुलेंस को किसी वीआईपी के इंतजार में खड़ा रखना अधिक महत्वपूर्ण लगता है, बनिस्बत किसी जरूरतमंद के उपयोग में लाने के। बात उस संस्कृति के ह्रास की है, जिस संस्कृति ने भक्त के प्रबल प्रेम के वश में प्रभु को नियम बदलते देखा है, लेकिन उस देश में सरकारी अफसर किसी मनुष्य के कष्ट में भी नियम नहीं बदल पाते। यह कैसा विकास है, जिसके बोझ तले इंसानियत मर रही है?  जो सरकारें अपने आप को गरीबी हटाने और गरीबों के हक के लिए काम करने का दावा करती हैं, उन्हीं के शासन में उनके अफसरों द्वारा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है।

किसी की आंख का आंसू

मेरी आंखों में आ छलके;

किसी की सांस थमते देख

मेरा दिल चले थम के;

किसी के जख्म की टीसों पे ;

मेरी रूह तड़प जाए;

किसी के पैर के छालों से

मेरी आह निकल जाए;

प्रभु ऐसे ही भावो से मेरे इस दिल को तुम भर दो;

मैं कतरा हूं मुझे  इंसानियत का दरिया तुम कर दो.

किसी का खून बहता देख

मेरा खून जम जाए;

किसी की चीख पर मेरे

कदम उस ओर बढ़ जाए;

किसी को देख कर भूखा

निवाला न निगल पाऊं;

किसी मजबूर के हाथों की

मैं लाठी ही बन जाऊं;

प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे इस दिल को तुम भर दो;

मैं कतरा हूं मुझे इंसानियत का दरिया तुम कर दो  (डॉ.शिखा कौशिक)

बात हमारे देश के एक पिछड़े राज्य ओड़िशा के एक आदिवासी जिले की अथवा सरकार या उसके कर्मचारियों की नहीं है, बात तो पूरे देश की है हमारे समाज की है हम सभी की है ।

आइए अब बात करते हैं देश का दिल और राजधानी दिल्‍ली की

घटना :  16 अगस्त 2016  : भारत की राजधानी दिल्ली 

एक व्यस्त बाजार, दिन के समय एक युवक सड़क से पैदल जा रहा था और वह अपनी सही लेन में था। पीछे से आने वाले एक लोडिंग ऑटो की टक्कर से वह युवक गिर जाता है,  ऑटो वाला रुकता है ऑटो से बाहर निकल कर अपने ऑटो को टूट-फूट के लिए चेक करके, बिना एक बार भी उसकी टक्कर से घायल व्यक्ति को देखे निकल जाता है। सीसीटीवी फुटेज अत्यंत निराशाजनक है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक पल रुक घायल की मदद करने के बजाय उसे देखकर सीधे आगे निकलते जाते हैं।

Delhi

कहां जा रहे हैं सब? कहां जाना है? किस दौड़ में हिस्सा ले रहे हैं ? क्या जीतना चाहते हैं सब? क्यों एक पल ठहरते नहीं हैं? क्यों जरा रुक कर एक दूसरे की तरफ प्यार से देखने का समय नहीं है, क्यों एक दूसरे की परवाह नहीं कर पाते? क्यों एक दूसरे के दुख दर्द के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते? क्यों दूर से देख कर दर्द महसूस नहीं कर पाते? क्यों हम इतने कठोर हो गए हैं कि हमें केवल अपनी चोट ही तकलीफ देती है? क्या हम सभी भावनाशून्य मशीनों में तो तब्दील नहीं हो रहे?

विकास और तरक्की की अंधी दौड़ में हम समय से आगे निकलने की चाह में मानव भी नहीं रह पाए। बुद्धि का इतना विकास हो गया कि भावनाएं पीछे रह गईं। भावनाएं ही तो मानव को पशु से भिन्न करती हैं, जिस विकास और तरक्की की दौड़ में मानवता पीछे छूट जाए, भावनाएं मृतप्राय हो जाएं, मानव पशु समान भावना शून्य हो जाए उस विकास पर हम सभी को आत्ममंथन करने का समय आ गया है।

(फोटो : Getty Images)

(लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं , एवं आईबीएन खबर डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी आईबीएन खबर डॉट कॉम स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  blogibnkhabar@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)

facebook Twitter skype whatsapp

LIVE Now

    Loading...

    News18 चुनाव टूलबार

    • 30
    • 24
    • 60
    • 60
    चुनाव टूलबार