ध्रुपद संस्थान में जो हो रहा है, उसके लिए कहीं हम भी तो जिम्मेदार नहीं?

ध्रुपद संस्थान (Dhrupad Sansthan) की छात्रा ने आरोप लगाया है कि ध्रुपद ‘गुरुकुल में विद्यार्थियों की अस्मिता से खिलवाड़ किया जाता है. अखिलेश गुंदेचा (Akhilesh Gundecha) महिला विद्यार्थियों का यौन शोषण करते हैं. उन्हें मजबूर कर, डरा-धमकाकर उनके साथ यौन संबंध बनाते हैं. संगीत सीख रहे लड़कों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 19, 2020, 9:55 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
ध्रुपद संस्थान में जो हो रहा है, उसके लिए कहीं हम भी तो जिम्मेदार नहीं?
गुरुकुल के समर्थकों का दावा है कि संस्थान को बदनाम करने की साजिश है.
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के बाहरी इलाके में स्थापित ध्रुपद संस्थान (Dhrupad Sansthan) पिछले 15-20 दिन से चर्चा में बना हुआ है. वैसे देश और दुनिया में यह संस्थान चर्चित तो पहले से भी रहा है. लेकिन पहले और अब में फर्क है. पहले यह सकारात्मक संगीतिक कारणों चर्चा में रहता था और अभी नकारात्मक व्यक्तिगत कारणों से है. मौज़ूदा कारणों को व्यक्तिगत कहना भी ठीक नहीं होगा. वे व्यक्तिगत तो तब तक थे, जब तक संस्थान के गलियारों की कानाफूसी में समाए हुए थे. लेकिन अब यौन प्रताड़ना (Sexual Harassment) के आरोप की शक्ल में सार्वजनिक मंचों पर सबके सामने हैं. बहस का केंद्र बने हुए हैं और उसके जरिए हमें बता रहे हैं कि ध्रुपद संस्थान में कथित तौर पर जो रहा है, उसके लिए कहीं हम भी तो जिम्मेदार नहीं हैं?

आखिर कैसे? इसके जवाब से पहले ये याद कर लेना जरूरी है कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की नींव कहलाने वाली गायकी विधा ‘ध्रुपद’ को समर्पित संस्थान में हो क्या रहा है? इस बाबत ताजा ख़बर. संस्थान की ओर से 16 सितंबर को ही एक बयान जारी किया गया. इसमें बताया गया कि संस्थान के पखावज गुरु और गुंदेचा भाइयों (Gundecha Brothers) में सबसे छोटे अखिलेश (Akhilesh Gundecha) पर लगे आरोपों की जांच के लिए नई समिति बनी है. इसमें राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय (एनएलआईयू) की व्याख्याता राका आर्य, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व सदस्य गगन सेठी, एकलव्य फाउंडेशन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता अनु गुप्ता सदस्य हैं. इनके अलावा संस्थान के ही दो विद्यार्थी अंकिता अठावले और सीएस बालासुब्रमण्यन भी बतौर सदस्य शामिल हैं. वैसे इसी तरह की समिति पांच-सात दिन पहले भी बनी थी. उसमें सामाजिक कार्यकर्ता सुषमा अयंगर, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की बहू मोना, भारतीय प्रशासनिक सेवा की सेवानिवृत्त अधिकारी अंशू वैश आदि को शामिल किया गया था. लेकिन ध्रुपद विद्यार्थियों ने इस समिति का विरोध कर दिया और वे संस्थान छोड़कर जाने लगे. तब मामला शांत करने के लिए नई समिति गठित की गई, जो अब तीन महीने में जांच पूरी करेगी, ऐसा कहा जा रहा है.

सो अगला स्वाभाविक सवाल ये कि आख़िर माज़रा क्या है, जो बात यहां तक पहुंची? इसका जवाब ‘ध्रुपद फैमिली यूरोप’ नाम के फेसबुक समूह पर मिलता है. जैसा नाम से जाहिर है, यह ध्रुपद विद्यार्थियों का सम्मिलित प्रयास है. इसमें 658 सदस्य हैं. इस पर नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम की एक योग शिक्षक का लिखा पत्र सितंबर की शुरुआत में पोस्ट किया गया. यह पत्र संस्थान के प्रमुख और गुंदेचा भाइयों में सबसे बड़े उमाकांत (Umakant Gundecha) के नाम था. इसमें आरोप लगाया गया था कि ध्रुपद ‘गुरुकुल में विद्यार्थियों की अस्मिता से खिलवाड़ किया जाता है. अखिलेश ख़ास तौर पर महिला विद्यार्थियों का यौन शोषण करते हैं. उन्हें मजबूर कर, डरा-धमकाकर उनके साथ यौन संबंध बनाते हैं. हास-परिहास में उनके निजी अंगों को छूते हैं. पुरुष विद्यार्थियों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है. ऐसे कृत्यों में रमाकांत गुंदेचा (अब स्वर्गीय) भी शामिल रहे हैं.’

इस पत्र में मांग की गई थी कि अखिलेश गुंदेचा को तुरंत संस्थान की गतिविधियों से पूरी तरह बर्ख़ास्त किया जाए क्योंकि वे संस्थान की प्रतिष्ठा पर बट्‌टा लगा रहे हैं. मूल मुद्दा इतना ही है. हालांकि इसके बाद जो हुआ, वह जानना हमारे लिए ज्यादा जरूरी होना चाहिए क्योंकि उसमें ऐसा बहुत-कुछ है, जो किसी भी संवेदनशील मन-मानस को झकझोरता है. दरअसल जैसे ही आरोप सामने आए, भोपाल से लेकर देश-दुनिया तक सामाजिक माध्यमों (फेसबुक, व्हाट्स ऐप आदि पर क्योंकि मीडिया को तो ऐसे मामलों के लिए अभी फुर्सत नहीं है) के जरिए बहस चल पड़ी. इन बहसों में स्वाभाविक तौर पर ‘कुछ लोग’ ऐसे थे, जो खुलकर इस मामले की निंदा कर रहे थे. इस तरह की हरकत से संगीत जैसी पवित्र विधा को दूषित करने वालों का बहिष्कार करने की मांग कर रहे थे. लेकिन इन ‘कुछ’ लोगों के बीच ‘बहुत लोग’ ऐसे थे, जो आरोप लगाने और सवाल करने वालों पर ही प्रश्नचिह्न लगा रहे थे. सबूत मांग रहे थे.
ऊपर जिस फेसबुक समूह का जिक्र है और जिसके माध्यम से यह मामला सामने आया, उस पर ही तमाम टिप्पणियां देखी-पढ़ी जा सकती हैं, जो ऐसे ‘बहुत लोगों’ की मानसिकता का प्रमाण देती हैं. और दिलचस्प ये कि इन ‘बहुत लोगों’ में कई तो नामी-गिरामी हैं. मसलन, एक बड़े और वरिष्ठ पत्रकार ने अंग्रेजी में टिप्पणी की. इसका अनुवाद यूं था, “जो लिखा (आरोप) गया है, वह गुरुकुल को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश जैसा लगता है. मैं मान नहीं सकता कि रमाकांत जी विद्यार्थियों के साथ ऐसा करने की सोच भी सकते हैं……. कृपया, भारत के शीर्ष गायकों को बदनाम करना बंद करें.” बताते चलें कि ये ‘वरिष्ठ पत्रकार’ मध्यप्रदेश से ही ताल्लुक रखते हैं और देश के कई बड़े अखबारों में संपादक रह चुके हैं.

इस संदर्भ में भोपाल के संगीतकारों के एक व्हाट्स ऐप समूह में इस मसले पर आए-गए संदेशों का उल्लेख भी हो सकता है. हालांकि इस उल्लेख में किसी का नाम देना बहुत आवश्यक नहीं होना चाहिए क्योंकि बात लोगों की नहीं, उनकी मानसिकता की हो रही है. तो इस समूह के कुछ सदस्यों ने जोर दिया कि ध्रुपद संस्थान के “मसले पर चर्चा होनी चाहिए. कोई रास्ता निकालना चाहिए.” जवाब में एक वरिष्ठ कलाकार ने लिखा, “…कानून अपना काम करेगा, हम आपसी चर्चा कर कुछ प्रभाव नहीं डाल सकते.” बताते चलें कि ये ‘वरिष्ठ कलाकार’ भारत भवन के न्यास (ट्रस्ट) में बतौर सदस्य शामिल रहे हैं. दरअसल, यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है. हम गलत होते हुए, दुराचार होते हुए देखते हैं. सुनते हैं. जानते हैं. समझते हैं.….. पर करते कुछ नहीं.

इसीलिए समाज की सबसे छोटी इकाई ‘परिवार’ से लेकर बड़ी इकाईयों तक ‘प्रभावशाली यौन कुंठित लोग’ हमारे बच्चों, किशोरों, युवाओं को अपनी यौन कुंठा का शिकार बनाते हैं और हम देखते रहते हैं. बर्दाश्त कर लेते हैं. चुप रह जाते हैं. मान लेते हैं कि, “हम आखिर कर भी क्या सकते हैं.” अपनी चुप्पी के हम तर्क गढ़ लेते हैं. जैसे, ‘समाज में बदनामी हमारी भी तो होगी”, “दुराचार करने वाला प्रभावशाली व्यक्ति हमें नुकसान पहुंचा देगा” आदि. अलबत्ता सच ये है कि हमारी चुप्पी से ‘यौन कुंठित लोगों’ को सिर्फ प्रोत्साहन मिलता है. और हमारे खाते में सिर्फ उत्पीड़न आता है. शारीरिक, मानसिक, आत्मिक. अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था, “दुनिया को बुरे लोग अधिक नुकसान नहीं पहुंचाते. बल्कि वे लोग ज़्यादा नुकसान पहुंचाते हैं, जो तमाम चीजों को होते हुए चुपचाप देखते रहते हैं, करते कुछ नहीं हैं.” इसीलिए अगर हम बदलाव चाहते हैं तो हमें आगे आकर कुछ करना ही होगा. अन्यथा ध्रुपद संस्थान में जो हो रहा है, समाज की विभिन्न इकाईयों में उस संक्रमण के प्रसार के लिए हम भी बराबर से उत्तरदायी माने जाएंगे. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
नीलेश द्विवेदी

नीलेश द्विवेदी स्वतंत्र पत्रकार

दो दशक तक टेलिवजन, प्रिंट और वेब पत्रकारिता करने के बाद स्वतंत्र लेखन. सामाजिक, राजनीतिक और संगीत पर लिखते रहे हैं. कई किताबों का अनुवाद भी कर चुके है.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 19, 2020, 9:55 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर