हेमा से लता और फिर ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर: ये संघर्ष, साधना, सादगी के सफर का नाम है!

हेमा से लता का सफर उम्र के पहले पड़ाव से ही शुरू हो जाता है. पिता दीनानाथ मंगेशकर की ‘बलवंत संगीत मंडली’ के नाम से मराठी नाटक कंपनी थी. इसके मंचित नाटकों में अहम महिला किरदार अक्सर ‘मास्टर दीनानाथ’ ख़ुद ही निभाया करते थे. ऐसे ही एक नाटक ‘भावबंधन’ में उन्होंने ‘लतिका’ नाम का किरदार निभाया. इससे वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी बड़ी बेटी ‘हेमा’ का नाम ‘लतिका’ से प्रेरित होकर लता रख दिया

Source: News18Hindi Last updated on: September 28, 2020, 12:30 PM IST
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हेमा से लता और फिर ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर: ये संघर्ष, साधना, सादगी के सफर का नाम है!
भारत रत्न लता मंगेशकर का आज जन्मदिन है, वे आज 92वें के पड़ाव पर पहुंच गई.
लता मंगेशकर की ज़िंदगी का शायद ही कोई पहलू ऐसा होगा, जिसे छुआ न गया हो. जिसके बारे में लिखा या पढ़ा न गया हो. फिर भी आज जब वे जीवन के 92वें पड़ाव पर पहुंची हैं, तो उनके बीते 91 साल के सफर के कुछ अहम पड़ावों पर फिर नजर डाली जा सकती है. क्योंकि यह कोई सामान्य सफर नहीं है. हेमा से लता और फिर ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर, संघर्ष, साधना और सादगी के सफर का नाम है. जिससे कभी भी, कितनी बार भी रू-ब-रू हों, हमें प्रेरणा ही देता है. ये बताता है कि ‘भारत रत्न’ कोई यूं ही नहीं हो जाता.

हेमा से लता का सफर उम्र के पहले पड़ाव से ही शुरू हो जाता है. पिता दीनानाथ मंगेशकर की ‘बलवंत संगीत मंडली’ के नाम से मराठी नाटक कंपनी थी. इसके मंचित नाटकों में अहम महिला किरदार अक्सर ‘मास्टर दीनानाथ’ ख़ुद ही निभाया करते थे. ऐसे ही एक नाटक ‘भावबंधन’ में उन्होंने ‘लतिका’ नाम का किरदार निभाया. इससे वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी बड़ी बेटी ‘हेमा’ का नाम ‘लतिका’ से प्रेरित होकर लता रख दिया
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सफर का अगला पड़ाव 13 साल की उम्र. यहां से संघर्ष शुरू होता है. पिता का 1942 में निधन हो जाता है. सबसे बड़ी होने के नाते तीन छोटी बहनों- मीना, आशा, ऊषा और सबसे छोटे भाई ह्रदयनाथ सहित परिवार की जिम्मेदारी लता के कंधों पर आ जाती है. पढ़ाई-लिखाई हो नहीं पाई थी. बताते हैं, पहले ही दिन लता अपने साथ छोटी बहन आशा को स्कूल ले गईं. वहां शिक्षक ने आशा को कक्षा में बिठाने की इजाज़त नहीं दी. ‘तुनकमिजाज़’ लता ने स्कूल जाना छोड़ दिया. फिर कभी नहीं गईं. लेकिन गीत-संगीत और अभिनय की शिक्षा, मां शेवंती की कोख में आने के वक्त से ही शुरू हो चुकी थी. वह भी ऐसी कि महज पांच साल की उम्र में आंगन में खेलते-खेलते ही पिता के वरिष्ठ शिष्य चंद्रकांत गोखले के गलत गायन को पकड़ लिया. उन्हें टोका और सही गाकर सुना दिया. पिता उस वक़्त घर पर थे नहीं. वे गोखले को कुछ सबक देकर वहीं रियाज़ करने का निर्देश देकर किसी काम से बाहर चले गए थे. यही वजह रही कि जब लता का संघर्ष शुरू हुआ तो उन्हें अभिनय और गायन से ही आगे सफर तय करने का निश्चय किया. पिता के मित्र थे, मास्टर विनायक दामोदर कर्नाटकी. नवयुग चित्रपट कंपनी के मालिक थे. उन्होंने इस हुनर से आजीविका कमाने का रास्ता दिखाया. लता ने कुछ मराठी, हिन्दी फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाएं भी कीं. पर अभिनय उन्हें रास आया नहीं. सो, छोड़ दिया.
इसके बाद पूरी तरह से साधना शुरू हुई. गीत और संगीत को साधने की. आसान नहीं था, अलबत्ता. पहली ही बार किसी फिल्म में गाने का मौका मिला. फिल्मकार सदाशिवराव नेवरेकर ने अपनी फिल्म ‘किति हसाल’ में उनसे गाना गवाया. लेकिन बात बनी नहीं. फिल्म से गाना बाहर कर दिया गया. आगे हालांकि, ‘मंगला गौर’ से गायन की शुरुआत हो गई पर अब भी वो बात नहीं थी. इसी बीच चूंकि काम अधिकतर मुंबई में ही मिलता था, इसलिए पूरा परिवार मध्य प्रदेश के इंदौर से यहीं आकर बस गया. लता की उम्र का सफर अब तक 16 पड़ाव पार कर चुका था. मुंबई में वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के भिंडीबाजार घराने की जगह उस्ताद अमन अली खान के शागिर्दी में अपनी गायकी निखार रही थीं. तभी उन पर फिल्म संगीतकार गुलाम हैदर की नजर पड़ी. उन्होंने लता की प्रतिभा पहचान ली. उन्हें गाने के मौके दिए और दिलवाए भी.

हालांकि यहां भी वाकये दिलचस्प घटे. लता उस वक्त की विख्यात गायिका नूर जहां की नकल किया करती थीं. आवाज तो बला की पतली थी. शायद इसीलिए जब गुलाम हैदर उन्हें लेकर फिल्मकार शशधर मुखर्जी के पास गए तो उन्होंने लता को इन्हीं आधारों पर खारिज कर दिया. उस वक्त मुखर्जी ‘शहीद’ फिल्म बना रहे थे और गुलाम हैदर चाहते थे कि वे इसमें लता को गाने का मौका दें. पर जब वे नहीं माने तो हैदर नाराज़ हो गए. चुनौती दे आए, 'एक वक्त आएगा, जब संगीतकार इस लड़की (लता) के पैरों पर गिरकर इससे अपनी फिल्मों में गाने की गुजारिश करेंगे.' बात सच हुई. संघर्ष और साधना रंग लाई. गुलाम हैदर की ही 1948 में आई फिल्म ‘मजबूर’ में लता का गाया गीत ‘दिल मेरा तोड़ा, ओ मुझे कहीं का न छोड़ा’ हिट हो गया. सफलता का पहला मील का पत्थर. उसके बाद शशधर मुखर्जी भी लता के पास लौटे और उनके जैसे न जाने कितने फिल्मकार-संगीतकार भी. वह सब इतिहास है. ऐतिहासिक है, जो फिल्म संगीत से, लता से सरोकार रखने वाले अधिकांश लोग लोग जानते हैं.

ऐसे संघर्ष और साधना के बाद लता की कामयाबी किसी ‘लता’ तक सीमित नहीं रही. बल्कि शाखाओं-प्रशाखाओं से भरा-पूरा वृक्ष हो चुकी है. कहा जाता है कि उन्होंने करीब 36 भाषाओं में 25,000 से अधिक गीत गाए हैं. वह भी ऐसे कि आज जब वे गाना छोड़ चुकी हैं, तब भी घर-घर में सुनी जाती हैं. तिस पर भी सादगी ऐसी कि जो उनके संपर्क में आ जाए, किस्से कहते नहीं अघाता. ऐसा ही एक किस्सा जाने-माने पार्श्व गायक उदित नारायण ने एक बड़े अख़बार से साझा किया है. वे बताते हैं, 'एक बार मेरे घर के पास ही स्टूडियो में लता जी के गाने की रिकॉर्डिंग थी. मुझे पता चला तो मैंने उनसे गुज़ारिश की कि आप मेरे घर के पास ही हैं. अगर आप हमारे घर आकर हमें आशीर्वाद देंगी तो हम ख़ुद को सौभाग्यशाली समझेंगे. और वे तुरंत राजी भी हो गईं. बिल्कुल सहज भाव से. वे हमारे घर आईं. मेरे माता-पिता भी उस समय मुंबई आए हुए थे. उनसे लता ताई ने करीब चार घंटे तक बातचीत की. चाय पी. पोहा खाया. बिल्कुल घर के सदस्य की तरह. वह मेरे लिए यादगार अनुभव था, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता.'लता जी को जानने वाले लोग बताते हैं कि वे आज भी घर आने वाले परिचितों को अक्सर ख़ुद अपने हाथों से बनाकर चाय-नाश्ता कराया करती हैं. वे जिससे मिलती हैं, उसे अपना बना लेती हैं. जो उनके संपर्क में आता है, उनका मुरीद हो जाता है. यकीनन, अपनी इन्हीं ख़ासियतों की वज़ह से तो वे ‘भारत रत्न’ हैं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
नीलेश द्विवेदी

नीलेश द्विवेदी स्वतंत्र पत्रकार

दो दशक तक टेलिवजन, प्रिंट और वेब पत्रकारिता करने के बाद स्वतंत्र लेखन. सामाजिक, राजनीतिक और संगीत पर लिखते रहे हैं. कई किताबों का अनुवाद भी कर चुके है.

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First published: September 28, 2020, 12:30 PM IST
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