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    ‘यूरोपीय भाषा दिवस’ को जानिए, यह हमें हिंदी से जुड़े विवादों का समाधान दे सकता है!

    यूरोपीय भाषा दिवस’ (European Language Day). भाषायी सरोकार रखने वालों से अपेक्षा की जा सकती है कि वे इससे परिचित हों. संभव है, बहुत लोग इस आयोजन (Planning) के बारे में ज्यादा न जानते हों. इसीलिए संक्षेप में यह बताना जरूरी है कि 2001 से हर साल 26 सितंबर को यह आयोजन होता है.

    Source: News18Hindi Last updated on: September 26, 2020, 1:45 PM IST
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    ‘यूरोपीय भाषा दिवस’ को जानिए, यह हमें हिंदी से जुड़े विवादों का समाधान दे सकता है!
    'हिन्दी दिवस' 14 सितंबर को मनाया जाता है, जबकि ‘यूरोपीय भाषा दिवस’ का आयोजन हर साल 26 सितंबर को होता है.
    अभी इसी महीने 14 तारीख को 'हिन्दी दिवस’ मनाया गया था. हर साल मनाया जाता है. लेकिन हर बार हिन्दी के प्रसार के लिए होने वाले सार्थक प्रयासों की जगह भाषायी विवाद ज्यादा सुर्ख़ियां बटोरते हैं. इस बार भी यही हुआ. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का बयान 'हिन्दी दिवस’ के मौके पर पूरे दिन चर्चा में रहा'. उन्होंने कहा था, 'हिन्दी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है. हो भी नहीं सकती.' दक्षिण भारत के किसी राजनेता द्वारा हिन्दी पर की गई ऐसी टिप्पणी कोई नई बात नहीं है. वहाँ दशकों से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने-बताने की हर कोशिश का विरोध होता आया है. पर दुखद ये कि ऐसे विरोध के बावजूद हम आज तक किसी भाषायी समाधान पर नहीं पहुंच पाए हैं. हालांकि पहुंचना चाहें तो यूरोपीय भाषा दिवस (European Day of Languages) हमें इसका रास्ता दिखाता है.'

    ‘यूरोपीय भाषा दिवस’ (European Languages Day). भाषायी सरोकार रखने वालों से अपेक्षा की जा सकती है कि वे इससे परिचित हों. लेकिन संभव है, बहुत लोग इस आयोजन के बारे में ज्यादा न जानते हों. इसीलिए संक्षेप में यह बताना जरूरी हो जाता है कि साल 2001 से हर साल 26 सितंबर को यह आयोजन होता है. इससे जुड़ी एक वेबसाइट है-  https://edl.ecml.at/  , जिस पर आयोजन से जुड़ी तमाम जानकारियां मुहैया कराई गई हैं. पहले पन्ने इसकी शुरुआती परिचय ही बड़ा दिलचस्प है और एक तरह से हमारी आंखें भी खोलता है. इसके मुताबिक, 'पूरे यूरोप के 47 सदस्य देशों में 80 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं. यह आयोजन उन्हें उनकी पढ़ाई, लिखाई के साथ-साथ किसी भी उम्र में अधिक से अधिक भाषाएं सीखने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश है. यूरोपीय परिषद पूरी दृढ़ता से इस बात को मानती है कि भाषायी विविधता अंतर-सांस्कृतिक समझ और संबंध बढ़ाने का सबसे बड़ा जरिया है. हमारे महाद्वीप की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का मूल तत्त्व है. इसीलिए यूरोपीय परिषद पूरे यूरोप में ‘बहुभाषावाद’ को प्रोत्साहित करती है.'

    इस परिचय के साथ वेबसाइट के पहले पन्ने पर ही थोड़ा नीचे खिसकें तो एक खंड मिलता है, ‘मिथ ऑर फैक्ट’ का. यानि ‘भ्रांति और तथ्य’. इसका पहला तथ्य ही बहुत-कुछ कहता है क्योंकि वह इस आम धारणा से जुड़ा है कि, 'मुझे सिर्फ़ मेरी मातृभाषा की जरूरत है, बस.' इस तथ्य की सच्चाई परखने के लिए नीचे दो डिब्बे बने हैं. इनमें से किसी के भी माध्यम से हम एक ही जवाब पर पहुंचते हैं कि ‘यह धारणा (मातृभाषा की ही जरूरत वाली) सिर्फ़ एक भ्रांति है’. इसमें आगे बताया गया है, 'अधिकांश यूरोपीय नागरिक मातृभाषा के अलावा अन्य भाषा सीखने में भी रुचि रखते हैं क्योंकि वे इसे शिक्षा, व्यापार, दूसरी संस्कृति को समझने आदि के लिए जरूरी मानते हैं.' इसी खंड में चौथा तथ्य भी रोचक है कि, 'बच्चों को सिर्फ़ अंग्रेजी आनी चाहिए.' इसे भी महज एक ‘भ्रांति’ ही बताया गया है. इस तर्क के साथ कि अगर 'वे सिर्फ़ अंग्रेजी जानेंगे तो जाहिर तौर पर एकभाषी रह जाएंगे. दूसरी भाषाओं के समृद्ध अनुभवों से वंचित रहेंगे. इससे उनकी शिक्षा और रोजगार पर विपरीत असर पड़ेगा. वे कई अच्छे अवसर खो देंगे.'

    इसमें इसी तरह की अन्य कई दिलचस्प जानकारियां हैं. तथ्य हैं. अलबत्ता, हम ऊपर बताए गए महज इन तीन तथ्यों से ही यहां अपने भाषायी-विवाद का हल देख सकते हैं. इसके लिए पहले तथ्य पर फिर नजर डालें. यूरोप की तरह भारत, भारतीय उपमहाद्वीप भी ‘भाषायी विविधता’ वाला क्षेत्र है. साथ ही सांस्कृतिक रूप से उतना ही समृद्ध भी. बल्कि उससे कुछ अधिक ही. इसीलिए किसी ‘एक भाषा दिवस’ (भले वह हिन्दी ही क्यों न हों) के आयोजन, उसके प्रोत्साहन और प्रसार की पहल यहां कारगर नहीं हो सकती. उम्मीद भी नहीं की जा सकती. बेहतर है, जिस तरह यूरोपीय परिषद ने इस तथ्यात्मक वास्तविकता को स्वीकार किया, हम भी करें. ‘हिन्दी दिवस’ के बजाय ‘भाषा दिवस’ मनाएं. बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करें.
    दूसरी बात. दक्षिण भारतीय राज्यों के लोग विशेष रूप से, इस तथ्य को स्वीकार करें कि ‘मुझे सिर्फ़ मेरी मातृभाषा की जरूरत है’ वाला भाव सिर्फ़ एक भ्रांति है. व्यावहारिक, वास्तविक धरातल पर यह बहुत कारगर धारणा नहीं है. उन्हें उन भाषाओं को भी सहज अपनाना होगा, जो देश का बहुसंख्य वर्ग बोलता है. फिर भले वह हिन्दी ही क्यों न हो.

    तीसरी सबसे महत्त्वपूर्ण बात. अगर हम सिर्फ़ अपनी मातृभाषा से चिपके रहते हैं, तो निश्चित रूप से सांस्कृतिक, पारंपरिक, भाषायी आदान-प्रदान के कई अच्छे अवसरों खो देते हैं. हमारी शिक्षा, हमारे व्यवसाय का दायरा सीमित हो जाता है. हम अपनी समृद्ध विरासत के कई अहम पहलुओं से अनभिज्ञ रह जाते हैं और हमेशा वैसे ही बने रहते हैं. आधे-अधूरे से.

    अंत में भाषा से जुड़े कुछ रोचक तथ्य. 1- दुनिया के 189 स्वतंत्र देशों में रहने वाली लगभग सात अरब आबादी 7,000 भाषाओं में संवाद करती है. 2- यूरोप में ही 225 स्वदेशी भाषाएं बोली जाती हैं. 3- अकेले लंदन में ही 300 तरह की भाषाएं (यूरोपीय-गैरयूरोपीय मिलाकर) बोलने वाले लोग रहते हैं. 4- दुनिया की आधी द्विभाषी या बहुभाषी है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ये सभी लोग अपने ज्ञानक्षेत्र की सभी भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखते हैं. वे असल में मातृभाषा के अलावा अन्य किसी भाषा/भाषाओं के ‘कुछ सौ’ शब्दों का इस्तेमाल करके ही अपना काम चला रहे होते हैं, क्योंकि हिन्दी सहित कई भाषाएं ऐसी हैं, जिनके शब्दकोष में 50,000 से ज्यादा शब्द हैं. 5- स्थानीय आबादी द्वारा बोली जाने वाली दुनिया की 10 सबसे प्रचलित भाषाओं में चीन की मंदारिन पहले नंबर पर है. जबकि अंग्रेजी तीसरे और हिन्दी चौथे पायदान पर है. दिलचस्प बात ये है कि इस सूची में दो अन्य भारतीय भाषाएं- ‘बंगाली’ (6वें क्रम) और पश्चिमी शैली वाली पंजाबी- ‘लंहदा’ (10वें नंबर) भी शामिल हैं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.) 
    ब्लॉगर के बारे में
    नीलेश द्विवेदी

    नीलेश द्विवेदी स्वतंत्र पत्रकार

    दो दशक तक टेलिवजन, प्रिंट और वेब पत्रकारिता करने के बाद स्वतंत्र लेखन. सामाजिक, राजनीतिक और संगीत पर लिखते रहे हैं. कई किताबों का अनुवाद भी कर चुके है.

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    First published: September 26, 2020, 1:42 PM IST
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