क्यों हमें 'कुमारी' अबुबाकेर और इस्लामिक कीर्तन परंपरा के बारे में जानना चाहिए?

अभी कुछ रोज पहले तक कर्नाटक (दक्षिण भारतीय) संगीत के एक बड़े गायक हुआ करते थे. नाम था, 'कुमारी' अबुबाकेर....

Source: News18Hindi Last updated on: October 10, 2020, 10:59 PM IST
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क्यों हमें 'कुमारी' अबुबाकेर और इस्लामिक कीर्तन परंपरा के बारे में जानना चाहिए?
संगीतकारों, गायकों, लेखकों आदि की उसी पीढ़ी से ताल्लुक रखने वाला अबुबाकेर की तरह ही एक नाम हुआ करता था.
अभी कुछ रोज पहले तक कर्नाटक (दक्षिण भारतीय) संगीत के एक बड़े गायक हुआ करते थे. नाम था, 'कुमारी' अबुबाकेर. जैसा नाम दिलचस्प, वैसा ही काम भी. वे 'तमिल इस्लामिक कीर्तन' परंपरा के आख़िरी स्तंभ थे. 'कुमारी' अबुबाकेर के निधन के साथ वह स्तंभ इसी महीने की सात तारीख़ को ढह गया. दुख की ही बात है कि भारतीय सांगीतिक संस्कृति के ऐसे बिरले नाम और परंपरा के धारक तथा साधक को न जीवनकाल में उनके हिस्से का सम्मान मिला, न निधन के बाद. आलम ये कि दक्खन के दो प्रमुख अख़बारों की वेबसाइट पर उनके निधन की छोटी सी सूचना तक नहीं मिली. गूगल पर खोजने जाएं तो वहां भी कुछ ख़ास हाथ नहीं आता. यहां तक कि उनके निधन पर कर्नाटक संगीत के दो-चार गिने-चुने नामों ने ही अफ़सोस जताया और बस. जबकि वे इससे कहीं ज्यादा के हकदार थे. बहरहाल इसीलिए, निधन के इतने दिन बाद सही, ऐसी दुर्लभ शख़्सियत और परंपरा के नाम 'शब्दांजलि' तो बनती है.

'कुमारी' अबुबाकेर के बारे में जो थोड़ी जानकारी उपलब्ध हो सकी है, उसे जानने-समझने का का सिलसिला 'अंत' से शुरू करते हैं. सात अक्टूबर 2020 से, जब चेन्नई में अबुबाकेर ने अंतिम सांस ली. उस वक्त तक वे 83 साल के हो चुके थे. इतिहासकार, फिल्मकार और लेखक कोंबई एस अनवर कहते हैं, 'अबुबाकेर उस पीढ़ी से ताल्लुक रखते थे, जो संगीत में मज़हब नहीं देखती थी. मुझे नहीं लगता कि उनकी परंपरा को ज़िंदा रखने वाला एक भी व्यक्ति कहीं हो सकता है.' दक्षिण भारतीय संगीतकार टीएम कृष्णा देश के बेहद जागरुक और सक्रिय संगीतकारों में गिने जाते हैं. ऐसे, जो संगीत और सांगीतिक परंपराओं से गहरा सरोकार रखते हैं. उसके संरक्षण और संवर्धन की फिक्र करते हैं. उन्हें भी अफ़सोस है, 'अबुबाकेर के बाद तमिल इस्लामिक कीर्तन गायन की विशिष्ट परंपरा को आगे बढ़ाने वाला मुझे कोई नज़र नहीं आता.'

अब इन्हीं दो जानकारों के हवाले से, इनसे मिली जानकारियों की मदद से तमिल इस्लामिक कीर्तन परंपरा को थोड़ा-बहुत समझने की कोशिश करते हैं. इसके लिए अनवर की ही बात पर फिर ग़ौर करें, 'एक पीढ़ी, जो संगीत में मज़हब नहीं देखती थी. धर्म के आधार पर संगीत को बांटती नहीं थी.'

संगीतकारों, गायकों, लेखकों आदि की उसी पीढ़ी से ताल्लुक रखने वाला अबुबाकेर की तरह ही एक नाम हुआ करता था, कासिम पुलावार वली (Sayyid Kaseem Pulavar Wali). ये इस्लाम धर्म के संस्थापक मुहम्मद साहब के वंशजों में से एक थे. साथ ही तमिल इस्लामिक साहित्य के बड़े रचनाकार भी. इन्होंने मुहम्मद साहब की प्रशंसा में भारतीय 'भक्ति शैली' में कई पदों की रचना की थी. उन पदों का गायन वैसे ही होता था, जैसे हिंदु धर्मावलंबी भगवान का भजन-कीर्तन करते हैं. इसीलिए आम बोलचाल में मुहम्मद साहब व अन्य इस्लामिक धर्मगुरुओं की प्रशंसा वाला भक्तिपद गायन 'इस्लामिक कीर्तन' कहलाने लगा.
इस 'इस्लामिक कीर्तन' से जुड़ा एक रोचक किस्सा है, 1980 के दशक का. कासिम पुलावार वली की तरह ही काव्य रचनाएं करने वाले एक और तमिल इस्लामिक साहित्यकार हुआ करते थे. उनका नाम था उमारु पुलावार (Umaru Pulavar). उन्होंने 17वीं सदी में 'सीरा पुराणम' (Seera Puranam) नाम से एक काव्यग्रंथ लिखा था.
इसमें मोहम्मद साहब के इतिहास से जुड़े भक्तिपद हैं. तो, अबुबाकेर और कांग्रेस के नेता तथा तमिल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का. मु. शेरिफ ने तय किया कि वे मुहम्मद साहब के जन्मदिवस के मौके पर अगले 10 दिन विभिन्न स्थानों की यात्रा करेंगे. उन जगहों पर जाएंगे, जहां लोग मुहम्मद साहब के जीवन से जुड़े संगीतमय भक्तिपद सुनना चाहते हैं. इसका आग्रह करते हैं. उन स्थानों पर अबुबाकेर 'इस्लामिक कीर्तन' गाएंगे और शेरिफ उन भक्तिपदों से जुड़े किस्से लोगों को सुनाएंगे. यह आयोजन, 'कधकलाबिशेगम' यानि कथा-कला का संगम कहा गया. सो, सिलसिला शुरू हुआ और जब 10वें दिन थमा तो आसमान से बारिश की शक्ल में ऊपरवाले का आशीर्वाद मिला. ऐसा अनवर बताते हैं.

यहां एक बात और है, गौर करने की. अबुबाकेर और उनके जैसे 'इस्लामिक कीर्तन' गायकों के गायन में भक्ति भले इस्लामिक धर्मगुरुओं की थी, पर संगीत अरबी शैली का नहीं होता था. बजाय वे निपट दक्षिण भारतीय रागों पर आधारित गायन किया करते थे. जैसे- रेवती, काफ़ी, बागेश्री, चारुकेशी आदि. इनमें काफी, बागेश्री, चारुकेशी जैसे राग तो हिंदुस्तानी (उत्तर भारतीय) संगीत में भी प्रचलित हैं. यही कारण था कि सुनने वालों को अबुबाकेर के गीत और साहित्य को समझने में भले कुछ दिक्कत हो, मगर उनके संगीत से जुड़ने में लोगों को देर नहीं लगती थी. ये संगीत अबुबाकेर ने कर्नाटक संगीत के बड़े नामी संगीतकारों से सीखा था. शुरुआती 10 साल तक उन्होंने बालई मणि असन (Balai Mani Asan) से संगीत सीखा और इसके बाद भी जिन गुरुओं सान्निध्य में वे रहे, वे अधिकांश या कहें कि लगभग सभी हिंदु ही थे.

अब बात उनके अलहदा से लगते नाम की.
अबुबाकेर का जन्म तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के कंजमपुरम गांव में हुआ था. यह गांव केरल की सीमा से लगता है और उस समय त्रावणकोर रियासत का हिस्सा होता था. चूंकि अबुबाकेर कन्याकुमारी जिले से ताल्लुक रखते थे, इसलिए बहुत संभावना यही है कि उन्होंने अपने नाम के साथ इसी कारण 'कुमारी' लगाया हो. इससे उनका धर्मनिरपेक्ष व्यक्तित्त्व भी स्थापित होता है क्योंकि हिंदु परंपरा में 'कुमारी' मां भगवती का एक नाम कहा जाता है.
और कन्याकुमारी उन्हीं से जुड़ा एक स्थल भी तो है. अलबत्ता एक और शब्द है जो 'कुमारी' जैसा ही ध्वनित होता है. यह है, 'क़ारी'. ये अरबी-फारसी भाषा में उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता है, जो क़ुरान की आयतें गाया करते हैं. तिस पर ये भी दोनों में दिलचस्प समानता है कि जैसे 'इस्लामिक कीर्तन' करने वाले कोई 'कुमारी' अब शायद ही मिलें, उसी तरह क़ुरान की आयतें गाने वाले 'क़ारी' भी अब यदा-कदा ही मिलते हैं. संगीत पर दिन-ब-दिन मज़हबी कट्‌टरता जो हावी होती जा रही है.
ब्लॉगर के बारे में
नीलेश द्विवेदी

नीलेश द्विवेदी स्वतंत्र पत्रकार

दो दशक तक टेलिवजन, प्रिंट और वेब पत्रकारिता करने के बाद स्वतंत्र लेखन. सामाजिक, राजनीतिक और संगीत पर लिखते रहे हैं. कई किताबों का अनुवाद भी कर चुके है.

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First published: October 10, 2020, 10:59 PM IST
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