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Blog: मोदी सरकार ने किसानों को दिया अच्छा दाम और सम्मान, कृषि सुधार कानून की आशंकाओं का ये है जवाब

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने एजेंडे में किसान को सबसे ऊपर रखा था. अपने दूसरे कार्यकाल की पहली ही कैबिनेट बैठक में किसानों से किए गए वादे को पूरा कर दिया. किसानों के लिए पहले की सरकारें योजनाओं के जरिए जो पैसे भेजती थीं उसे अधिकारी और नेता मिलकर सफाचट कर जाते थे. इसलिए मोदी सरकार ने किसानों को डायरेक्ट पैसा भेजने का फैसला किया.

Source: News18Hindi Last updated on: November 28, 2020, 2:17 PM IST
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Blog: मोदी सरकार ने किसानों को दिया अच्छा दाम और सम्मान, कृषि सुधार कानून की आशंकाओं का ये है जवाब
मोदी सरकार ने रबी सीजन 2020-21 के लिए रेट बढ़ाकर एमएसपी घोषित किया है. (सांकेतिक तस्वीर)
राजीव जेटली, प्रवक्ता, बीजेपी

नई दिल्ली. कृषि सुधार के तीनों विधेयकों ने अब कानून का रूप ले लिया है. कांग्रेस और कुछ किसान संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि नए  कृषि कानूनों की वजह से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी खत्म हो जाएगी, मंडियां बंद कर दी जाएंगी और किसान गुलाम बन जाएंगे. इन तीन आशंकाओं के तीन जवाब भी देने जरूरी हैं, ताकि पता चले कि निजी हितों को साधने के लिए कैसे किसानों को बरगलाने की कोशिश की जा रही है. यह तय मानिए कि आप अगर परिवर्तन से भागते हैं तो कभी भी विकास नहीं कर पाएंगे. बने बनाए रास्तों से अलग कुछ करने वाले ही सफलता की सीढ़ियां चूमते हैं. जिन लोगों की मंशा है कि किसान हमेशा रोता रहे उन्हें कृषि सुधार कांटे की तरह चुभ रहा है.

राजीव जेटली, प्रवक्ता, बीजेपी


मोदी सरकार ने रबी सीजन 2020-21 के लिए रेट बढ़ाकर एमएसपी घोषित कर दिया है. कृषि लागत और मूल्य आयोग के मुताबिक रबी की मुख्य फसल गेहूं को पैदा करने में किसान की लागत प्रति क्विंटल 960 रुपये आती है. मोदी सरकार ने लागत के मुकाबले सबसे अधिक 106 फीसदी की वृद्धि करके गेहूं को 1975 रुपये प्रति क्विंटल के रेट पर खरीदने का एलान किया है. कोविड-19 महामारी के बावजूद इस साल सरकार ने रिकॉर्ड 390 लाख टन गेहूं की खरीद की जो पिछले वर्ष से लगभग 15 प्रतिशत ज्यादा है. इसके लिए किसानों को 75 हजार करोड़ रुपये दिए गए हैं. विपक्ष से सवाल ये है कि अगर एमएसपी को खत्म करना होता तो क्या सरकार इसके नए रेट घोषित करती?
कुछ किसान संगठन और आढ़ती बता रहे हैं कि मंडियां खत्म हो जाएंगी. उन्हें सरकार बंद कर देगी. अगर ऐसा होता तो क्या हरियाणा में बीजेपी की सरकार 4000 करोड़ रुपये की लागत से तीन बड़ी मंडियों की स्थापना कर रही होती.

विपक्ष एक और दावा कर रहा है कि कांट्रैक्ट फार्मिंग की वजह से किसान गुलाम बन जाएगा. इसका बड़ा जवाब जानेमाने कृषि वैज्ञानिक प्रो. रामचेत चौधरी हैं, जो विश्व खाद्य संगठन (FAO) में चीफ टेक्निकल एडवाइजर रह चुके हैं. उनके साथ गोरखपुर, संतकबीर नगर, महराजगंज, बस्ती, आजमगढ़, मिर्जापुर और गोंडा आदि के करीब 5200 किसान कांट्रैक्ट फार्मिंग कर रहे हैं. इन किसानों को एमएसपी से 20 फीसदी अधिक दाम मिलता है.

उम्मीद है कि इन तीनों उदाहरणों से विपक्ष को उनकी तीनों आशंकाओं का जवाब मिल गया होगा. अगर वे अब भी समझने को राजी नहीं हैं तो यह माना जाना चाहिए कि वो विशुद्ध राजनीति कर रहे हैं. वो किसानों की आड़ में अपने राजनैतिक हितों को पूरा करना चाहते हैं.बजट से जाहिर होता है कौन कितना बड़ा किसान हितैषी
किसके दिल में किसानों को आगे बढ़ाने की इच्छा है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस क्षेत्र को दिया जाने वाला पैसा है. वर्ष 2009-10 यानी कांग्रेस के शासन में कृषि मंत्रालय का बजट सिर्फ 12 हजार करोड़ रुपये का होता था. मोदी सरकार ने इसे बढ़ाकर 1 लाख 34 हजार करोड़ रुपये कर दिया है. कभी फुरसत मिले और तथ्यों पर बात करनी हो तो कांग्रेस के शासनकाल का आम बजट पढ़िएगा. उनमें कृषि को कहीं तवज्जो नहीं दी गई है. जबकि मोदी सरकार के आम बजट में किसानों का मुद्दा ही छाया रहता है.

यही वजह है कि कोविड महामारी के बावजूद कृषि क्षेत्र की विकास दर 3.4 प्रतिशत है. यहां यह बात चौंकाने वाली है कि खेत, खलिहान और किसान के लिए सबसे ज्यादा बजट देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा पर वो लोग सवाल उठा रहे हैं जिनके एजेंडे में खेती थी ही नहीं.

साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने एजेंडे में किसान को सबसे ऊपर रखा था. अपने दूसरे कार्यकाल की पहली ही कैबिनेट बैठक में किसानों से किए गए वादे को पूरा कर दिया. आजादी के बाद पहली बार किसी सरकार ने सीधे किसानों के बैंक अकाउंट में पैसा देने के विजन को पूरा किया. पीएम किसान सम्मान निधि का मुझे आजतक कोई आलोचक नहीं मिला. क्योंकि कांग्रेस के वक्त दिल्ली से भेजे गए 100 रुपये में से सिर्फ 15 रुपये ही लाभार्थी को मिलते थे. अब 100 का पूरा 100 मिल रहा है.

किसानों के लिए पहले की सरकारें योजनाओं के जरिए जो पैसे भेजती थीं उसे अधिकारी और नेता मिलकर सफाचट कर जाते थे. इसलिए मोदी सरकार ने किसानों को डायरेक्ट पैसा भेजने का फैसला किया. देश के सभी 14.5 करोड़ किसान परिवारों के लिए यह योजना शुरू की गई. इसके तहत हर साल 6-6 हजार रुपये सीधे किसानों के बैंक अकाउंट में जाते हैं. एक भी पैसा कहीं डूब नहीं सकता. पिछले 21 महीने में देश के 11 करोड़ से अधिक किसानों को लगभग 94 हजार करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं. इतिहास में पहली बार किसी सरकार ने डायरेक्ट किसानों को पैसा दिया. इतने पैसे में तो कांग्रेस कम से कम सात-आठ साल तक अपना कृषि बजट बनाती.

मोदी सरकार की किसान हितैषी नीतियों का ही परिणाम है कि 18.50 करोड़ टन दुग्ध उत्पादन के साथ हम विश्व में प्रथम स्थान पर हैं. बागवानी-फल, सब्जियों का उत्पादन 32 करोड़ टन वार्षिक हो गया है. 2018-19 में 332 लाख टन चीनी उत्पादन कर हम विश्व में प्रथम स्थान पर रहे हैं.

आम किसानों को भलीभांति पता है कि उनका हित किसकी सरकार में सुरक्षित है. बीजेपी ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक किसानों को उनकी लागत से डेढ़ गुना मूल्य देने का वादा पूरा किया. कांग्रेस के वक्त यह रिपोर्ट धूल फांक रही थी. पहले किसानों के नाम पर जितने भी आयोग बनते थे उनकी रिपोर्ट तक किसी को पता नहीं चलती थी लेकिन अब किसानों की इनकम डबल करने वाली कमेटी ने अपनी सभी सिफारिशों को सार्वजनिक कर रखा है. कोई भी इसे इंटरनेट पर पढ़ सकता है. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सरकार में पारदर्शिता है.

किसानों को पद्म पुरस्कार नहीं देती थी कांग्रेस, हमने दिया
हमारे एक साथी पत्रकार यूपीए शासनकाल से ही किसानों को पद्मश्री दिलाने की मुहिम चला रहे थे. क्योंकि, आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी किसी सरकार ने अन्नदाताओं को पद्म पुरस्कार लायक नहीं समझा था. नरेंद्र मोदी सरकार ने न सिर्फ उनकी आय दोगुनी करने का संकल्प लिया बल्कि उन्हें मान-सम्मान भी दिलाया. पहली बार किसान पद्मश्री लेने राष्ट्रपति भवन पहुंचा. वो भी विशुद्ध किसान. मोदी सरकार ने खेती-किसानी करने वाले 11 लोगों को देश का चौथा बड़ा नागरिक सम्मान दिया. नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने सोचा कि देश का पेट भरने वाले किसानों को क्यों न पद्मश्री दिया जाए.

ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि साल 2014 में सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के मुद्दों को सबसे ऊपर रखा. अब देश में जो भी योजनाएं बन रही हैं वो छोटे-बड़े सभी 14.5 करोड़ किसान परिवारों के लिए बन रही हैं.

किसानों की आय दोगुनी करने के लिए मोदी सरकार ने इनकम डबलिंग कमेटी बनाई. इसकी सिफारिशों के आधार पर किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार ने लक्ष्य तय किया है. जिनमें चार मुख्य बातों पर जोर है. पहला कैसे प्रोडक्टिविटी बढ़ाई जाए. दूसरा उत्पादन लागत कम कैसे हो. तीसरा मार्केट की उपलब्‍धता बढ़े और चौथा उचित मूल्य मिले. इन सभी पहलुओं पर सरकार तेजी से काम कर रही है.

स्वायल हेल्थ कार्ड और नीम कोटेड यूरिया के जरिए सरकार उत्पादन लागत कम कर रही है. देश के लगभग सभी किसान परिवारों को यह कार्ड मिल चुका है. जहां-जहां पर स्वायल हेल्थ कार्ड के हिसाब से खाद का इस्तेमाल हुआ है. नीम कोटेड यूरिया का इस्तेमाल हुआ है वहां-वहां पर प्रोडक्टिविटी बढ़ी है और उत्पादन लागत में कमी आई है.

नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल (NPC) और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ एग्रीकल्चर एक्सटेंशन मैनेजमेंट (MANAGE), हैदराबाद की स्टडी के मुताबिक मोदी सरकार की स्वायल हेल्थ कार्ड योजना से 8-10 प्रतिशत की सीमा तक रासायनिक खाद के इस्तेमाल में कमी आई है. जबकि उपज (प्रोडक्टिविटी) में 5-6 फीसदी की वृद्धि हुई है. बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 फरवरी, 2015 को राजस्‍थान के सूरतगढ़ में स्वायल हेल्थ कार्ड स्कीम लॉन्‍च की थी.

मार्केटिंग में सुधार का कार्यक्रम भी जारी है. इसके लिए हम बाजार विकसित कर रहे हैं. जब किसान को नजदीक में बाजार मिलेगा तभी उसे फायदा मिलेगा. सरकार ने अब तक देश की 1000 मंडियों को ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना) के तहत जोड़ दिया है. ई-नाम एक इलेक्ट्रॉनिक कृषि पोर्टल है. जो पूरे भारत में मौजूद कृषि उत्पाद विपणन समितियों को एक नेटवर्क में जोड़ने का काम करता है. इसका मकसद सभी कृषि उत्पादों को एक बाजार उपलब्ध करवाना है.

कृषि उत्पादों के रख-रखाव के लिए भी सरकार काम कर रही है. क्योंकि सरकार को पता है कि भंडारण के अभाव में किसानों की फसल बर्बाद हो जाती है. इसके लिए एक लाख करोड़ रुपये का एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड दिया गया है.

खेती-किसानी को लेकर सरकार की संजीदगी इसी से दिखती है कि पूरी दुनिया बंजर भूमि की समस्या से परेशान है, और इससे निपटने के लिए भारत वर्ल्ड लीडर बनने का काम कर रहा है. भारत सरकार ने अपने यहां अगले 10 साल में 50 लाख हेक्टेयर बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का लक्ष्य रखा है. इससे 75 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा. धरती को बचाने और लोगों की सेहत ठीक रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार आर्गेनिंक खेती की पैरोकारी कर रहे हैं. इससे किसानों की आय बढ़ेगी क्योंकि आर्गेनिक उत्पादों मांग तेजी से बढ़ रही है.

किसानों को कर्ज से उबारकर उनकी आय दोगुनी करने के लिए मोदी सरकार ने बांस की खेती की शुरुआत की है. कांग्रेस के शासन में बांस काटने पर फॉरेस्ट एक्ट लगता था. किसान को जेल हो जाती थी, फॉरेस्ट अधिकारी और पुलिस किसान को परेशान करते थे. लेकिन अब उसे बांस की खेती और उससे संबंधित उत्पादों का बिजनेस करने का मौका मिल रहा है. यही नहीं अब सरकार ने न सिर्फ नियम बदला है बल्कि इसकी व्यापक पैमाने पर खेती के लिए राष्ट्रीय बैंबू मिशन भी बनाया है. जिसके तहत किसान को बांस की खेती करने पर प्रति पौधा 120 रुपये की सरकारी सहायता भी मिलेगी.

किसानों की एक बड़ी समस्या है उत्पाद का उचित दाम न मिलने के जोखिम की. आलू, प्याज और टमाटर उगाने वाले किसानों का ये दर्द किसी से छिपा नहीं है. इस परेशानी से निजात दिलाने के लिए मोदी सरकार ने कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट बनाया है. इससे किसान को जीरो जोखिम होगा. निजी क्षेत्र और किसानों को साथ लाकर खेती को लाभकारी बनाने की कोशिश है. फसल उगाने से पहले ही रेट तय हो जाएगा. निजी क्षेत्र से जिस रेट पर कांट्रैक्ट होगा, किसान को उतना पैसा मिलने की गारंटी होगी.

कितनी उपज हुई यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि किसान को लाभ कितना मिला. इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार कृषि और किसान दोनों के विकास के लिए काम रही है.

भरोसा न करने की कोई वजह नहीं
भारत में करीब 30 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन होता है. इसमें से करीब आधा किसान की खपत है. शेष में से करीब 9 करोड़ टन सरकार खरीद लेती है. ऐसे में अब जो 6 करोड़ टन बचता है. उसका दाम खुले बाजार में तय होने देना चाहिए. बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और भाई-भाई में बंटवारे की वजह से सिकुड़ते खेत बता रहे हैं कि खाद्यान्न की मांग कम नहीं होगी. मांग कम नहीं होगी तो दाम कम नहीं होगा. सरकार पर सरकारी खरीद से बचने का अंदेशा जताने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस साल कोविड महामारी के बावजूद सरकार ने पिछले साल के मुकाबले ज्यादा गेहूं खरीदा है.

सरकार ने 2019-20 में लगभग 3.90 करोड़ टन गेहूं और 7.60 करोड़ टन धान खरीदा है. भंडारण क्षमता बढ़ाने का काम चल रहा है. इसके लिए फंड जारी हो चुका है. जब क्षमता बढ़ जाएगी, सरकार के पास रखने की जगह ज्यादा जगह होगी तो एमएसपी पर गेहूं एवं धान की खरीद भी बढ़ जाएगी.

कुछ लोग किसानों को सिर्फ उन्हीं फसलों तक क्यों सीमित रखना चाहते हैं जो एमएसपी के दायरे में आती हैं. उनसे आगे बढ़कर अब हमें किसानों का रुझान व्यावसायिक खेती की ओर भी करने की जरूरत है. ताकि दूसरी फसलों को उगाकर एमएसपी से कहीं ज्यादा कमा सकें. हेल्थ से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए दुनिया भर में मोटे अनाजों की मांग बढ़ रही है. हमें मांग के मुताबिक फसल पैदा करने की ओर भी ध्यान देना होगा.

बहरहाल, मोदी सरकार द्वारा किसानों के लिए किए ताबड़तोड़ काम को देखते हुए ऐसी कोई वजह नहीं बचती कि हम एमएसपी और मंडी व्यवस्था को लेकर सरकार के दावे और वादे पर भरोसा न करें. (लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: November 28, 2020, 11:58 AM IST
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