मन की बात में ‘बुदेलखंड की भागीरथी’- पहाड़ काटकर हासिल किया सम्मान

19 साल की बबीता राजपूत खिलखिलाते हुए कहती हैं, 'प्रधानमंत्री ने उनके काम को सराहा, उनकी तारीफ़ की ये हमारे लिए गर्व की बात है. जो लोग कल तक उसके इस काम का विरोध कर रहे थे वही अब आज बधाई देने आ रहे हैं.'

Source: News18Hindi Last updated on: March 2, 2021, 11:57 AM IST
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मन की बात में ‘बुदेलखंड की भागीरथी’- पहाड़ काटकर हासिल किया सम्मान
मन की बात में पीएम ने इनका जिक्र किया था.

उनके हौसले पहाड़ से ज़्यादा सख़्त थे, उनके इरादे चट्टान से ज़्यादा मज़बूत थे, कि पहाड़ ने भी उनके सामने हार मान ली. हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के छोटे से गांव अगरौठा में रहने वाली बबीता राजपूत और दूसरी स्थानीय महिलाओं की. बबीता राजपूत का नाम अचानक एक बार फिर चर्चा में आ गया है. दूर दूर से लोग उन्हें बधाइयां देने पहुंच रहे हैं. उनका जगह जगह सम्मान हो रहा है. आखिर क्यों ? क्योंकि 28 फरवरी 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में बबीता और उनके साथ की महिलाओं की तारीफ़ की है.


जल संरक्षण के लिए काम करने वाली बबीता ने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर 107 फीट की बड़ी नहर बना दी वो भी पहाड़ काट कर. पिछले साल अक्टूबर महीने में अपने ही ब्लॉग में मैंने जल सहेलियों के बारे में लिखा था. आज बबीता और उनके साथियों के चेहरे पर अलग मुस्कान है. वो बात करते हुए अपनी खुशी छुपा नहीं पा रही हैं.


कौन हैं बबीता ?

19 साल की बबीता राजपूत खिलखिलाते हुए कहती हैं, ‘प्रधानमंत्री ने उनके काम को सराहा, उनकी तारीफ़ की ये हमारे लिए गर्व की बात है.’ बबीता का कहना है कि जो लोग कल तक उनके इस काम का विरोध कर रहे थे वही अब आज बधाई देने आ रहे हैं.


बबीता बतातीं हैं, ‘हमारे गांव में पानी की इतनी किल्लत है कि लड़कियां जब पांच, छह साल की होती हैं, तब से वो छोटे-छोटे बर्तन उठाकर पानी भरने में लग जाती हैं. मैंने ख़ुद भी आठ साल की उम्र से पानी भरना शुरू कर दिया था…’ लेकिन आज बहुत हद तक पानी की समस्या में कमी आई है, गांव में जो हैंडपंप में उसका वाटर लेवल भी कम हुआ है. हालांकि आने वाली गर्मी में गांव को जल संकट का सामना करना पड़ेगा क्योंकि पूरा बुंदेलखंड इलाका ही कम बारिश की वजह से पानी के लिए जूझता है.


बबीता और उनके गांव की महिलाओं ने अपनी मेहनत के दम पर पहाड़ को पस्त कर दिया. बबीता बताती है, ‘ये सब कुछ इतना आसान भी नहीं था. हम सब सोचते थे कि अगर पानी आ जाए, तो काम बन जाए, लेकिन जब जल जोड़ो अभियान वाले हमारे घर आए और उन्होंने समझाया कि ये इस तरह हो सकता है, तो लगा कि किया जा सकता है. थोड़ी बहुत दिक़्क़्तें हुईं, लेकिन आख़िर में सब साथ आ गए और काम हो गया.’ कोराना काल में पहाड़ काटने का काम शुरु हुआ जिसका नतीजा सबके सामने है. इसमें महिलाओं के साथ प्रवासी मज़दूरों ने साथ दिया. साथी हाथ बढ़ाना की तर्ज पर काम आसान होता गया. मन की बात में जबसे पीएम नरेंद्र मोदी ने बबीता राजपूत की तारीफ़ की है तब से उनका फोन बंद होने का नाम नहीं ले रहा है.


बीए सेंकेंड इयर में पढ़ने वाली बबीता तीन बहन और एक भाई में सबसे छोटी हैं. पिता मलखान लोधी और मां तीजा लोधी की भी खुशी का ठिकाना नहीं है. उनकी बेटी की तारीफ़ देश के प्रधानमंत्री ने की है. बबीता कहती हैं, ‘अब उनकी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है वो चाहती हैं कि आसपास के इलाकों में काम करें. ताकि पानी की समस्या से इलाके को दो चार ना होना न पड़े.’


परमार्थ समाज सेवी संस्था ने जल जोड़ो अभियान के तहत लोगों को जागरूक करने का काम किया. संस्था के संस्थापक डॉ. संजय सिंह हैं. संजय सिंह कहते हैं कि उनके काम को देश के प्रधानमंत्री ने सराहा ये हमारे लिए गर्व की बात है. संजय जी देश के पॉजीटिव मीडिया का भी शुक्रिया करते हैं जिनकी वजह से मोदी जी तक इलाके की बात पहुंची. ये सबका सामूहिक प्रयास है. ये बुदेलखंड के लिए गर्व की बात है. संजय जी कहते हैं कि मन की बात में जल सहेलियों की तारीफ़ से उनके हौसले बुलंद है. इससे दूसरे लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी.


कैसे शुरू हुआ काम?

औरतों को एकजुट करने का काम किया परमार्थ समाज सेवी संस्था ने किया. ये संस्था जल जन जोड़ो अभियान के तरह परमार्थ संस्था बुंदेलखंड के गांवों में जल स्त्रोतों को ज़िंदा करने का काम कर रही है. इसमें स्थानीय महिलाओं को शामिल किया जाता है. संस्था गांव में 20 या 25 महिलाओं की एक पानी पंचायत बनाती है, जिसमें अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष होते हैं.


पानी पंचायत की सदस्य महिलाएं फिर गांव की बाकी महिलाओं को पानी के लिए जागरूक करती हैं, उन्हें समझाती हैं. फिर बनाई जाती हैं जल सहेलियां. इन्हीं जल सहेलियों ने पहाड़ काटा और पास के तालाब को एक तरह से ज़िंदा किया है. इसके पहले गांव में छोटे छोटे चैक डेम, स्टाप डेम बनाए गए. धीरे धीरे करके गांव का वाटर लेवल बढ़ गया.


ज़िला प्रशासन करेगा मदद

छतरपुर कलेक्टर शीलेंद्र सिंह ने बबीता राजपूत को बधाई दी है. साथ ही उन्होंने कहा कि ये हमारे ज़िले ही नहीं बल्कि पूरे बुंदेलखंड के लिए गौरव की बात है. शीलेंद्र सिंह खुद जल संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम चला रहे हैं. वो कहते हैं कि छतरपुर समेत पूरा बुंदेलखंड जल संकट से जूझ रहा है. अगरौठा गांव की महिलाओं ने जो काम किया वो सराहनीय है. बबीता ज़िले के लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए भी रोल मॉडल हैं.


आने वाले गर्मियों के सीज़न में इलाके को पानी के लिए परेशान ना होना पड़े इसके लिए कलेक्टर खुद ज़िम्मेदारी संभाले हुए हैं. वो कहते हैं कि हम सूखे पड़े जल स्त्रोतों को ज़िंदा करने की कोशिश में हैं. ताकि महिलाओं को पानी के लिए मीलों का सफ़र ना तय करना पड़े. ज़िला प्रशासन जल संरक्षण के लिए खास योजना पर काम कर रहा है साथ ही लोगों को भी जल संरक्षण के लिए जागरूक होना पड़ेगा.


कितना मुश्किल था ये काम?





अगरौठा गांव और आसपास के इलाके का ज़्यादातर हिस्सा पठारी क्षेत्र है. यहां लगभग 100 फ़ीट की गहराई पर पानी मिलता है. परमार्थ समाज सेवी संस्था से जुड़े मानवेंद्र बबीता राजपूत और जल सहेलियों की तारीफ़ मन की बात में होने से बहुत खुश हैं. वो कहते हैं कि ये काम काफी मुश्किल था, बुंदेलखंड पैकेज के तहत इस गांव में 40 एकड़ का एक तालाब बनाया गया था, जो जंगल क्षेत्र से जुड़ा हुआ था. लेकिन इस तालाब में पानी आने का कोई रास्ता नहीं था.


जबकि जंगल क्षेत्र के एक बड़े भू भाग का पानी बछेड़ी नदी से होकर निकल जाता था. अब सवाल ये था कि जंगल का पानी किसी तरह इस तालाब तक आ जाए. लेकिन ये इतना आसान नहीं था. काफ़ी समय तक विचार विमर्श के बाद ये तय किया गया कि फ़िलहाल ऐसा किया जाए कि अभी जितना पानी पहाड़ पर आता है, उसे ही कम से कम तालाब तक लेकर आया जाए और फिर लोगों ने ख़ुद अपने स्तर पर तालाब तक पानी लाने का ज़िम्मा उठाया और ये कर दिखाया.


क़ामयाबी के पीछे कड़ी मेहनत

आज बबीता और उसके साथ की जल सहेलियों की चर्चा पूरे देश और इलाके में हो रही है. लेकिन इसके पहले इन्होंने 6 महीने के पहले जो संघर्ष किया उसका अंदाज़ा किसी को नहीं होगा. क्योंकि दुनिया सिर्फ़ कामयाबी का मेहराब पहने हुए इमारत को देखती है, लेकिन जिस नींव पर इमारत टिकी होती है उसका बोझ कोई नहीं देखता है. बबीता और उनके साथ की महिलाओं ने बहुत संघर्ष किया, हाड़ तोड़ मेहनत की. घरों में झगड़े किए, पतियों के ताने सुने, बच्चों को धूप में अपने साथ रखा. नाज़ुक कही जाने वाली कलाइयों ने गेतियां चलाईं, तसले उठाए और काट दिया पहाड़. लेकिन काम इतना आसान नहीं जितना नज़र आता है, ये एक दिन की मेहनत भी नहीं है. ये लगातार चलते रहने वाली प्रक्रिया है. ये सामाजिक चेतना की मिसाल है. ये चेतना ये चमक एक दिन में नहीं आती है.


जल संकट के जूझ रहे बुंदेलखड के लिए इस तरह की जन जागरूकता चेतना बहुत ज़रूरी है और फिर बात जीवन दायिनी की की हो तो ये पूरी दुनिया के लिए ज़रूरी हो जाता है कि हम पानी को बर्बाद ही ना करें बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए पानी का इंतज़ाम करते हुए जाएं. क्योंकि जल नहीं तो कुछ नहीं हैं. फिलहाल हमारी तरफ़ से भी बबीता राजपूत और उनकी जल सहेलियों को बहुत बहुत मुबारकबाद.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: March 2, 2021, 11:16 AM IST
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