Covid-19: साल में दूसरी बार लुटा प्रवासी मजदूरों का आशियाना, अबकी बार सरकार ने भी मुंह फेरा

Covid-19: पिछले साल जब लोग कोरोना के डर से लौट रहे थे तो रास्ते रास्ते लोगों ने लंगर लगा दिए थे. रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन पर सैनेटाइजेशन, स्क्रीनिंग की व्यवस्था थी. इस बार ऐसा कुछ नहीं है. स्थानीय प्रशासन का ध्यान बाहर से आने वाले मज़दूरों की तरफ शायद है ही नहीं.

Source: News18Hindi Last updated on: April 16, 2021, 2:14 PM IST
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Covid-19: साल में दूसरी बार लुटा प्रवासी मजदूरों का आशियाना, अबकी बार सरकार ने भी मुंह फेरा
मुंबई के रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करते लोग. (AP)
ये वो परिंदें हैं जिनका कोई आशियां नहीं होता, जहां का दाना पानी वहीं का बसेरा. यूं ही ज़िंदगी बसर हो जाती है प्रवासी मज़दूरों की. इनके नसीब में एक जगह टिकना नहीं होता है रोज़ी रोटी दर दर भटकने के मजबूर कर देती है. पिछले साल कोरना काल में प्रवासी मज़दूरों की जो तस्वीरें सामने आईं उसने देश दुनिया को हिला कर रख दिया. हज़ारों किलोमीटर की दूरी नंगे पांव तय कर ली. क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या जवान सब एक कतार से अपने देस पहुंचने को ऐसे निकले जैसे फिर कभी परदेश का रुख न किया जाएगा. लेकिन कहते हैं कि भूखे पेट तो भजन भी नहीं होते हैं. पिछले बरस लॉक डाउन खुला और जैसे जैसे कोरोना का खतरा थोड़ा कम लगा, ये परिंदे फिर निकल लिए थे दाने की तलाश में. इसे पेट की मजबूरी ही कहा जा सकता है कि फिर हज़ारों किलोमीटर का सफर तय किया और वापस पहुंच गए महानगरों की तरफ़. महानगर जहां दो वक्त की रोटी तो नसीब हो जाती है लेकिन अब जैसे जैसे कोरोना ने अपने पैर पसारे, ये प्रवासी मजदूर फिर से अपना बोरिया बिस्तर बांध कर पहुंचने लगे अपने गांव कस्बों में. इस डर से कि कहीं पिछले साल जैसी हालत ना हो जाए.

बुंदेलखंड में सालों साल से पड़ने वाले सूखे ने यहां के किसानों का मज़दूर बनाकर रख दिया है. छोटे छोटे किसान प्रकृति की मार नहीं झेल पाए और बड़े शहरों का रुख़ कर बैठे. यहां किसान की जगह मज़दूरों ने ले ली और गांव के गांव खाली हो गए. पिछले साल छतरपुर ज़िले में एक लाख से ज़्यादा मज़दूर वापस लौटे और इससे कहीं ज्यादा तादाद उन लोगों की थी जो यहां से होते हुए उत्तरप्रदेश गए.

बुंदेलखंड की त्रासदी ये है कि यहां कुदरत रूठी रहती है. पानी की किल्लत और बेरोज़गारी ने यहां के लोगों की कमर तोड़ दी है. लाखों की संख्या में मजदूर मुंबई, दिल्ली, जम्मू कश्मीर और उत्तर भारत के दूसरे बड़े शहरों का रुख कर गए. पिछले बरस जैसे तैसे ग़ुज़र बसर हो गई थी लेकिन कोरोना की इस दूसरी लहर ने तो जैसे इन लोगों की तोड़ कर रख दिया है. छतरपुर, हरपालपुर रेलवे स्टेशन पर दिल्ली से आने वाली ट्रेनों ने ठसाठस मज़दूर भरा हुआ लौट रहा है. दिल्ली से आने वाली बसों ने एक बार फिर मज़दूर ही मज़दूर नज़र आ रहे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे एक बार फिर इनका आशियाना किसी तूफान में उड़ गया है. और ये फिर बेसहारा हो गए हैं.

पिछले साल जब लोग कोरोना के डर से लौट रहे थे तो रास्ते रास्ते लोगों ने लंगर लगा दिए थे. रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन पर सैनेटाइजेशन, स्क्रीनिंग की व्यवस्था थी. इस बार ऐसा कुछ नहीं है. स्थानीय प्रशासन का ध्यान बाहर से आने वाले मज़दूरों की तरफ शायद है ही नहीं. अपना घर बार छोड़कर फिर से ये लोग महानगरों की तरफ़ गए थे लेकिन इस बार महानगरों की हालात पहले से बदतर है. तो ये लोग फिर से अपने घरों का रुख कर रहे हैं. इनके चेहरे पर अंजाना ख़ौफ है. कोई चार महीने पहले दिल्ली गया था तो कोई 6 महीने पहले और अब उन्हें फिर लौटना पड़ रहा है. पिछली बार स्थानीय स्तर पर रोज़गार देने की कोशिश की गई. इस बार सूरत ही बदल गई है. एक अंज़ाना ख़ौफ़ इनकी आंखों में साफ़ नज़र आता है.
बस स्टैंड पर रोज़ाना सैकड़ों की तादाद में मज़दूर परिवार लौट रहे हैं. पिछले साल के जैसे भले इस बार भागमभाग ना हो लेकिन दूर शहरों से लौटने वाले लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. सरकार और स्थानीय प्रशासन को भी चाहिए की इनके लौटने पर ज़रूरी खाना पानी और स्क्रीनिंग की व्यवस्था की जाए ताकि ये लोग कोरोना कैरियर ना बनें. दिल्ली, महाराष्ट्र से लौटने वाले प्रवासी मज़दूरों का तांता लगा हुआ है. सभी इस बात से ख़ौफज़दा हैं कि कहीं पिछले साल की तरह इस बार भी रातों रात लॉकडाउन ना लगा दिया जाए.

हालांकि इस बार एतहियात बरतते हुए मध्यप्रदेश सरकार और प्रशासन संपूर्ण लॉकडाउन लगाने की बजाए कोरोना कर्फ्यू लगा रही है जिसमें बसों ट्रेनों से आने वाले लोगों समेत तमाम तरह की छूट दी गई है. इस वजह से पैनिक स्थिति नहीं बन पाई है. मार्केट बंद होने से भीड़भाड़ कम है और लोग बिना वजह बाहर भी नहीं निकल रहे हैं. हम उम्मीद के साथ दुआ भी करते हैं कि ये आपात स्थिति, दहशत के आलम और इस बीमारी से पूरी दुनिया को निजात मिले ताकि लोग फिर खुली हवा में सांस ले पाए और अपनी ज़िंदगी दोबारा बेख़ौफ़ जी पाएं. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: April 16, 2021, 2:23 PM IST
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