Daughters Day: दूसरे की बेटियां ‘माल, आइटम, पीस’ नहीं...

मेरी बेटी मेरा अभिमान. बिल्कुल बेटियां अभिमान होती हैं लेकिन क्या आपने अपने बेटे को सिखाया कि सिर्फ़ उसकी बहन उसका या आपका अभिमान नहीं है बल्कि सड़क पर चलने वाली हर लड़की एक बेटी है. डॉटर्स डे (Daughters Day) का जश्न मनाते हुए सबसे ज़्यादा ज़रूरत है कि हम अपने बेटों की परवरिश ऐसी करें कि वो अपने घर के बाहर की लड़की को माल, आइटम, पीस ना कहें.

Source: News18Hindi Last updated on: September 27, 2020, 7:16 PM IST
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Daughters Day: दूसरे की बेटियां ‘माल, आइटम, पीस’ नहीं...
बिल्कुल बेटियां अभिमान होती हैं लेकिन क्या आपने अपने बेटे को सिखाया कि सिर्फ़ उसकी बहन उसका या आपका अभिमान नहीं है बल्कि सड़क पर चलने वाली हर लड़की एक बेटी है. (AP)
आजकल ‘माल’ शब्द ने कोहराम मचा रखा है. देश की जानीमानी एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण से  ‘माल’ के बारे में एनसीबी पूछताछ कर रही है. सारा अली खान और श्रद्धा कपूर भी इस पूछताछ के घेरे में है.  पता लगाया जा रहा है कि इनके व्हाट्स ग्रुप में जो चैट है उसमें ‘माल’ का मतलब क्या है. इसके पहले की कहानी हर उस शख़्स को पता है जो न्यूज़ देखता है. आजकल मीडिया में सिवाए इस ख़बर के कुछ और नज़र नहीं आता है. ख़ैर मसला शुरू होता है अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध हालात में हुई मौत से. आत्महत्या से शुरू हुआ मामला हत्या और अब बॉलीवुड में ड्रग्स के चलन तक पहुंच गया है. रोज़ाना घंटों के डिस्कशन, प्राइम टाइम पर चीखना चिल्लाना और टीआरपी के दौड़ में बने रहने का खेल. हां अब आते हैं ‘माल’ पर. अभिनेत्रियों से जुड़े व्हाट्स ग्रुप में ‘माल’ के बारे में कहा जा रहा है कि यहां ड्रग्स की बात हो रही है. जिस पर जांच पड़ताल चल रही है. फिलहाल देश का यही सबसे बड़ा मुद्दा है.

‘माल’ शब्द हमेशा से दिमाग़ में खटकता आया है? कॉलेज में एक लड़के ने कहा था कि आज तो ‘माल’ लग रही हो. बात सालों पुरानी है. तब शायद इस शब्द के मायने नहीं मालूम थे या फिर इतनी समझ नहीं थी कि लड़के लड़कियों को ‘माल’ क्यों कहते हैं. इसमें आपत्तिजनक क्या है, आख़िर क्या बुराई है. एक दोस्त की भांजी का नंबर किसी काम के लिए डायल किया तो ट्रू कॉलर में उसका नाम आया ‘माल’. मेरा दिमाग़ घूम गया. उससे पूछा कि तुम्हें पता है ट्रू कॉलर में क्या नाम आ रहा है तुम्हारा. बोली नहीं, मैने उसे कहा ‘माल’ लिखा हुआ आ रहा है तो वो हंसने लगी और मेरा खून खौल गया. 20 साल की लड़की के लिए ये सहज था कि किसी ने उसका नाम ‘माल’ नाम से सेव कर दिया. मुझे समझाना पड़ा कि ये गलत है. इस बात पर हंसा या मुस्कुराया नहीं जा सकता है.

कॉलेज, मार्केट कहीं भी बाजू से गुज़रता हुआ लड़का कहता जाता है कि ओहो क्यो ‘माल’ है. अपने साथ काम करने वाला बंदा एक लड़की की तस्वीर को देखते हुए कहता है कि अरे यार देखो क्या आइटम है.  माल, आइटम, पीस, बम, फुलझड़ी, पटाखा… कभी सोचा है किसी लड़की को ये कहते हुए या ये आम है कि लड़के लड़कियों के लिए ये लफ़्ज़ इस्तेमाल करते हैं. आखि़र लड़की क्या है उनके लिए. क्या दीपिका पादुकोण या कोई और लड़की ये कह सकती है कि हम यहां किसी लड़के की बात कर रहे थे. ‘माल’ से मतलब कोई लड़का है. तो क्या ये मान लिया जाएगा कि वो सही हैं. अगर यही बात कोई लड़का बोले तो शायद सोशल मीडिया पर इंसाफ़ मांग रहा और पूरे बॉलीवुड को नशेड़ी मानने वाले इस बात से इंकार करेंगे. इसी सोशल मीडिया पर ही तो लड़कियों के साथ शाब्दिक बलात्कार किया जाता है. संस्कार, सभ्यता की दुहाई देने वाले ज़रा सी नाइत्तेफा़की पर किसी को भी बाज़ारू बता दें, उसे रेप की धमकी दे दें. उसके खानदान, मां, बहन सबको एक लाइन में खड़ा करके इस तरह की गालियां दे कि कभी ना ऐसी भाषा सुनी हो ना पढ़ी हो.

सोशल मीडिया पर ही देखा कि देश और दुनिया के महान क्रिकेटर सुनील गावस्वर चर्चा में है. पीछे जाकर देखा तो उनकी एक कथित टिप्पणी सामने आई जो आईपीएल के दौरान उन्होंने विराट कोहली के खराब प्रदर्शन को लेकर अनुष्का शर्मा पर की. हालांकि गावस्कर ने साफ किया कि उन्होंने ऐसा कहा ही नहीं है. लेकिन ये पहली दफ़ा नहीं है जब विराट कोहली के ख़राब प्रदर्शन के लिए अनुष्का शर्मा पर टिप्पणी की गई हो. दोनों की शादी से पहले भी जब कभी भी विराट कोहली ने ग्राउंड पर खराब प्रदर्शन किया तो अनुष्का को ट्रोल किया गया. कभी मज़ाक में तो कभी वाहियात फूहड़ और गंदे तरीके से. पति की कामयाबी के पीछे पत्नी को बताया जाए तो उसकी नाकामी का ठीकरा भी उसी के सर पर फोड़ा जाए. दोनों की अलग अलग कोई पहचान क्यों नहीं हो सकती है. दो अलग-अलग मामले हैं, लेकिन सोच एक ही है. जिसे स्वीकारा नहीं जाना चाहिए. ‘माल’ शब्द से शुरू होते हुए अनुष्का शर्मा तक. औरतों के मामले में ये समाज बेहद असंवेदनशील हैं. बोलने से पहले सोचते नहीं हैं कि क्या बोल रहे हैं. क्योंकि हमारे समाज ने ये सब बहुत आसानी से स्वीकार कर लिया है.
आज दुनिया डॉटर्स डे मना रही है, मेरी बेटी मेरा अभिमान. बिल्कुल होती हैं बेटियां अभिमान लेकिन क्या आपने अपने बेटे को सिखाया कि सिर्फ़ उसकी बहन उसका या आपका अभिमान नहीं है बल्कि सड़क पर चलने वाली हर लड़की एक बेटी है. डॉटर्स डे का जश्न मनाते हुए सबसे ज़्यादा ज़रूरत है कि हम अपने बेटों की परवरिश ऐसी करें कि वो अपने घर के बाहर की लड़की को माल, आइटम, पीस ना कहे. बेटियों पर बंदिशें लगाने से ज़्यादा ज़रूरी है कि हम बेटों को हिदायद दें उन्हें लड़कियों की इज़्ज़त करना सिखाएं. कहीं आपके बेटे की वजह से किसी और की बेटी असुरक्षित मेहसूस ना करें, कहीं आपका बेटा किसी और की बेटी की तबाही का सबब ना बने. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: September 27, 2020, 7:16 PM IST
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