होर्डिंग्स, बैनर्स, सेल्फी विथ डॉटर से नहीं बदलने वाली बेटियों की किस्मत

सड़क किनारे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर्स हमारी नजरों के सामने से गुजरते हैं जो हमें बेटी को बचाने, बेटी को पढ़ाने, बेटी है तो कल है का संदेश देते हैं. ये सब तो आपको पता ही है. लेकिन अब मैं जो सवाल उठाने जा रही हूं वो आपको नागवार गुज़र सकते हैं, मेरे सवाल आपको तीखे लग सकते हैं, आपको परेशान कर सकते हैं. लेकिन सवाल जरूरी हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 27, 2022, 10:04 am IST
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होर्डिंग्स, बैनर्स, सेल्फी विथ डॉटर से नहीं बदलने वाली बेटियों की किस्मत
बढ़ते अपराधों के बीच बेटी की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

देश और दुनिया ने गर्व के साथ INTERNATIONAL DAUGHTE’S DAY यानी की विश्व बेटी दिवस मनाया. मीडिया और सोशल मीडिया पर बेटियों पर गर्व करते हुए बड़े-बड़े आर्टिकल लिखे गए. मेरी बेटी मेरा अभिमान के नारे गढ़े गए. बेटियों के लिए पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्र सरकार तमाम तरह की योजनाएं शुरु की. पीएम मोदी ने 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत की. जिसका मकसद बच्चियों की शिक्षा और लिंगानुपात की सुरक्षा सुनिश्चित करना था. ये सारी बातें, ये सारे नारे दीवारों पर रंगे हुए हैं. सड़क किनारे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर्स हमारी नजरों के सामने से गुजरते हैं. आप सोच रहे होंगे कि मैं इतना सब क्यों लिखे जा रही हूं, ये सब तो आपको पता ही है. लेकिन अब मैं जो सवाल उठाने जा रही हूं वो आपको नागवार गुज़र सकते हैं, मेरे सवाल आपको तीखे लग सकते हैं, आपको परेशान कर सकते हैं. लेकिन सवाल जरूरी हैं.


पूरी दुनिया की बात ना करके मैं आज अपने देश की बात करूंगी, जहां कहा जाता है कि बेटियां लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा-काली का रूप होती हैं. नवरात्रि में नौ दिन कन्याएं पूजी जाएंगी. लेकिन क्या हकीकत इतनी ही खूबसूरत है जितनी नज़र आती है? हमारा समाज बेटियों को लेकर कितना संजीदा है, हम उन्हें कितना सुरक्षित माहौल देते हैं? बेटी दिवस पर अपनी बेटियों के साथ गर्व करती हुईं तस्वीरें पोस्ट करते वक्त क्या हमें दूसरे की बेटी नजर नहीं आती है? महिला अपराध में लगातार हम आगे क्यों जा रहे हैं? आखिर बेटियों को लेकर हमारा समाज इतना बेदिल क्यों हो जाता है? हमें हर दूसरे दिन किसी ना किसी बेटी के लिए आवाज़ क्यों उठानी पड़ती है? हम क्यों जस्टिस फॉर…ये, वो लिखते हुए नहीं थकते हैं? जस्टिस फॉर के पीछे सिर्फ नाम बदलते हैं लेकिन शायद लड़कियों की नियति नहीं.


पिछले महीने देश रांची की अंकिता सिंह के लिए जस्टिस की मांग कर रहा था और आज फिर एक अंकिता के लिए जस्टिस मांगा जा रहा है. झारखंड की अंकिता किसी सनक का शिकार हो गई और उत्तराखंड की अंकिता भंडारी भी अपनी जान गंवा बैठी. दोनों की गलती इतनी ही थी कि वो लड़की थीं, वो बेटी थीं जिनके लिए ये समाज, ये दुनिया भयानक ख़्बाव की तरह रहा. झारखंड की अंकिता को बेरहमी से जला दिया गया जिसके आरोप में एक युवक को गिरफ़्तार किया गया है. अपने घर में सोते हुए अंकिता पर पेट्रोल डाल दिया गया वो झुलस गई, अस्पताल में अंकिता जिंदगी की जंग हार गई. अंकिता का मुजरिम कौन है, उसकी सज़ा क्या होगी, ये वक्त बताएगा.


वहीं उत्तराखंड की अंकिता अपने सपनों में रंग भरने के लिए, अपने माता-पिता की आर्थिक मदद करने के लिए घर से बाहर निकली और एक रिसॉर्ट में नौकरी करने लगी. लेकिन बेटियों के लिए सबकुछ इतना आसान तो नहीं है. अंकिता भंडारी को इसलिए कत्ल कर दिया गया क्योंकि उसने मालिक की बात मानकर ग्राहकों को खुश करने से इंकार कर दिया था. अंकिता भंडारी की हत्या का आरोप उत्तराखंड के तीन आरोपियों रिसॉर्ट संचालक पुलकित आर्य, मैनेजर सौरभ भास्कर और असिस्टेंट मैनेजर अंकित गुप्ता को गिरफ्तार किया है. हत्या का मुख्य आरोपी पुलकित हरिद्वार के बीजेपी नेता विनोद आर्य का बेटा है. विनोद आर्य पूर्व में दर्जाधारी राज्यमंत्री रह चुके हैं. इस घटना के बाद बीजेपी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया है.



सवाल हमारे देश के रहनुमाओं से भी है. जब महिला अपराध पर सदन में चर्चा की जाती है तो सांसद, विधायक बातों में मगन होते हैं. जब मीडिया पर अंकिता भंडारी की चर्चा चल रही थी ठीक उसी समय एक मंत्री किचन की तस्वीर ट्वीट कर रही थीं. महिला सम्मान पर चीखने वाली महिला सांसद, महिला आयोग तक गिने-चुने मुद्दों पर बोलती हैं. सत्ताधारी दल के नेता, मंत्री, बाहुबली, आदि महिलाओं, लड़कियों के मामले में सब बंट गए हैं. आज इंसाफ़ जाति-धर्म देखकर मांगा जाता है. बेटियां भी हिस्सों में बंट गई हैं. अगर आरोपी दूसरे धर्म का, जाति का नहीं है तो महिला अपराध शायद अपराध ही नहीं रह जाता है. किसी बेटी के लिए आवाज उठाने से पहले देखा जा रहा है कि उसके साथ किसने अपराध किया है क्योंकि धर्म के आधार पर कोई मामला संगीन होता है या फिर राजनीतिक फायदा उठाने के लायक. मुझे शर्म आती है जब महिला अपराध से जुड़े आरोपियों का धर्म देखकर, उनका राजनीतिक रसूख देखकर, समर्थन में रैलियां तक निकाल दी जाती हैं.


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानि एनसीआरबी ने 2021 में देशभर में हुए अपराधों की जो आंकड़े जारी किए हैं उनके मुताबिक 2021 में आपराधिक घटनाओं में 7.6 प्रतिशत की कमी आई है. लेकिन हत्या, अपहरण, महिलाओं व बच्चों के खिलाफ़ अपराध बढ़े हैं. 2021 में देशभर में दुष्कर्म के कुल 31,677 मामले दर्ज हुए, यानी कि हर रोज़ औसतन 86 से ज़्यादा महिलाएं दुष्कर्म का शिकार हुई. वही महिलाओं के खिलाफ़ अपराध की बात करें तो ये इसमें 15.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. 2021 में देश में महिलाओं के खिलाफ़ अपराध के 4,28,278 मामले दर्ज हुए. हैरानी की बात ये है कि महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराध में सबसे ज़्यादा 31.8 फीसद मामले पति या रिश्तेदार की क्रूरता के थे. और अगर राज्यों की बात करें तो महिलाओं के खिलाफ़ अपराध सबसे ज़्यादा 56,083 मामले यूपी में दर्ज हुए.


ये बातें आपको बेमानी, बेतुकी लग सकतीं हैं लेकिन क्या आंख बंद करने से हमारे समाज की तस्वीर बदल जाएगी? महिलाएं, बेटियां घरों में शोषण हिंसा का शिकार होती हैं. और अगर उन्हें घर से बाहर निकलना है तो फिर उनके लिए ये दुनिया कितनी सुरक्षित है इसके मामले रोजाना सामने आते रहते हैं. कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या, बलात्कार, यौन शोषण, ऑनर किलिंग, घरेलू हिंसा और भी ना जाने कितने घिनौने अपराध झेलती हैं लड़कियां. कितना संघर्ष, कितनी मुश्किलों से जुझती हुईं बेटियां. क्या उनकी नियति यही लिख दी गई है? हम एक तरफ बेटियों को जांच पर जाते हुए देखते हैं, उन्हें फाइटर प्लेन उड़ाते हुए देखकर गौरवान्वित होते हैं तो दूसरी तरफ अंकिता सिंह और अंकिता भंडारी जैसी लड़कियां, जो बेटियां/लड़कियां होने का खामियाजा भुगतती हैं. घरों से सुरक्षित बाहर निकलने के लिए, अपने सपने जीने के लिए, अपना कॅरियर बनाने के लिए बेटियां कहां-कहां, कैसा-कैसा संघर्ष करती हैं. कहीं कोई सनकी मोहब्बत से इंकार पर लड़की को जिंदा जला देता है. कोई शादी के लिए हां नहीं करने पर चाकू घोंप देता है. तेज़ाब डाला देता है तो कहीं नौकरी पर बॉस की बात ना मानने पर जान तक गंवा बैठती है.


पंजाब की चंढीगढ़ यूनिवर्सिटी के एमएमएस कांड ने देश को हिलाकर रख दिया. एक लड़की, हॉस्टल में रहने वाली दर्जनों लड़कियों के नहाते हुए वीडियो बनाती है और उसके साथी लड़की को ब्लैकमेल करते हैं. शायद ये पूरा गिरोह है जिसके तार बहुत गहरे हों क्योंकि ये मुमकिन नहीं कि कोई शौकिया ही इतनी लड़कियों के वीडियो मांगे. आरोपी लड़की शायद खुद ब्लैकमेल हो रही होगी या वो अपनी मर्ज़ी से अपने बॉयफ्रेंड के कहने पर ये कर रही होगी. मामले की जांच चल रही है लेकिन बात फिर वही आ जाती है कि लड़कियों के लिए हमने कैसे दुनिया बनाई है.


बेटा और बेटियों के बीच के अंतर को पाटने के लिए, बेटियों को समाज में बराबर का अधिकार, सम्मान देने के लिए हमें बेटी दिवस मनाना पड़ रहा है. लेकिन क्या एक बेटी दिवस या एक महिला दिवस मनाकर हम हमारे समाज की तस्वीर बदल सकते हैं. हम अपनी बेटियों, बहनों को सम्मान की नज़र से देखें और दूसरे की बेटियों के लिए यही नज़र बदल जाए ये कैसे मुमकिन है. कहते हैं कि बेटियां तो सबकी सांझी होती हैं तो फिर महिला के साथ अपराध लगातार बढ़ क्यों रहे हैं? समाज के तौर पर क्या हम लगातार नाकामयाब हो रहे हैं? हम बेटियों को बेटों के बराबर नज़र से क्यों नहीं देख पा रहे हैं? या फिर बेटों के बराबर सुरक्षित माहौल क्यों नहीं दे पा रहे हैं? अगर देश में अपराध कम हुए हैं तो फिर महिलाओं, बेटियों के हिस्से आने वाले अपराधों में बढोत्तरी कैसे हुई है?


दीवारें रंग देने से, बड़े-बड़े पोस्टर बैनर लगा देने से ना तो महिला सम्मान बढ़ने वाला है और ना ही बेटियों के हिस्से सुरक्षित माहौल आने वाला है. इसके लिए जिम्मेदार शायद हमारी परवरिश है, संस्कार हैं जो हम आने वाले पीढ़ी को देते हैं. हमारे घरों में जब तक बेटियों को महिलाओं को दोयम दर्जे को समझा जाता रहेगा ये होता रहेगा. दंभ से भरा हुआ पुरुष, मर्द लड़कियों का इंकार बर्दाश्त नहीं कर पाता है, लेकिन उसे ये समझना होगा, उसे ये स्वीकारना होगा कि लड़कियां जीती जागती इंसान है कोई कठपुतली नहीं. हाड़-मांस की बनी हई तुम्हारी ही तरह की इंसान, जिनके लिए हमें सुरक्षित समाज, सुरक्षित दुनिया देनी होगी. कड़े कानूनों से अगर अपराध रुकते होते या कम होते तो निर्भया के बाद देश में बहुत कुछ बदल जाना चाहिए था. हमें समाज के तौर पर बदलने की जरूरत है, हमें सोचने की ज़रूरत है. अपनी बेटियों पर गर्व करने के साथ हम ये मानें कि बेटियां वाकई सबकी सांझी होती हैं.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: September 27, 2022, 10:04 am IST