महिला ने छोटे कपड़े पहने हों तो क्या मर्द को यौन शोषण का अधिकार मिल जाता है?

महिलाओं के साथ साथ हर उस इंसान को इस फैसले पर आपत्ति जतानी चाहिए जो संवेदनशील है. महिलाओं के लिए हम सुरक्षित माहौल की बात ना करें, हम पुरुषों को, लड़कों को ना समझाएं बल्कि सारा दारोमदार महिलाओं पर डाल दें. लेकिन महिलाएं और लड़कियां करें क्या? कहां जाएं? किससे अपनी फरियाद करें?

Source: News18Hindi Last updated on: August 18, 2022, 10:31 am IST
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महिला ने छोटे कपड़े पहने हों तो क्या मर्द को यौन शोषण का अधिकार मिल जाता है?
यौन उत्‍पीड़न पर केरल अदालत का फैसला

महिला ने उत्तेजक कपड़े पहने थे इसलिए यौन शोषण के आरोपी को जमानत दी जाती है. केरल के लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता सिविक चंद्रन को कोझिकोड के कोर्ट ने यौन शोषण के एक मामले में यही कहते हुए जमानत दी है. फ़ैसला 12 अगस्त को सुनाया गया जिसमें कोर्ट ने कहा कि जिस महिला ने आरोप लगाया था उसने उत्तेजक कपड़े पहने थे. कोर्ट सिर्फ यहीं नहीं रुकता है बल्कि कोर्ट ने कहा कि 74 साल का आदमी किसी महिला के साथ शारीरिक रूप से जबरदस्ती नहीं कर सकता, उसे जबरदस्ती गोद में नहीं बैठा सकता और न ही उसके स्तनों को दबा सकता है. कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 354 में साफ़-साफ़ लिखा है कि आरोपी का इरादा महिला की गरिमा भंग करने का होना चाहिए. और धारा 354 A में शारीरिक संपर्क या सेक्सुअल फेवर्स जैसी चीज़ें होनी चाहिए.


ये खबर सोशल मीडिया पर आग की तरह वायरल हुई है. मेरी नजर से जब से ये फैसला गुजरा है समझ नहीं आ रहा है कि किस तरह प्रतिक्रिया दी जाए. लेकिन महिला होने के नाते मेरा ये अधिकार है कि मैं ऐसे किसी फैसले पर अपनी असहमति और आपत्ति दर्ज कराऊं.


अब सवाल ये है कि कपड़ों के आधार पर कैसे तय होने लगा कि कौन से कपड़े पहनने पर किसी महिला के साथ जबरदस्ती करने का अधिकार मिल जाता है? ये सहूलियत यौन शोषण के आरोपी को कब से मिलने लगी कि कोई महिला कैसे कपड़े पहने से इस आधार पर आरोप गंभीर या हल्के माना जाएगा? मैं हैरान हूं कि जज साहब ने आखिर किस सोच के आधार पर आरोपी का जमानत दी. क्या ये वही सोच नहीं है जो बलात्कार पीड़ित, यौन शोषण की शिकार महिला, लड़कियों को ही कटघरे में खड़ा करती है? कोर्ट के इस फ़ैसले ने एक नई बहस शुरु कर दी है या फिर मर्दवादी सोच को नए सिरे से औरतों को कटघरे में खड़े करने की ऊर्जा दे दी है.


सोशल मीडिया पर इस फ़ैसले को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया देखी जा रही है. क्योंकि ऐसे फैसले ही आगे जाकर नज़ीर बनते हैं. ना जाने कितने यौन शोषण के आरोपी ये तर्क देंगे. हालांकि ये कोई नई बात नहीं है कि जब कोई महिला यौन शोषण का शिकार बने और वो हिम्मत करके अपने साथ ज़्यादती करने वाले के खिलाफ़ खड़ी हो तो सवाल उस पर ही उठा दिए जाएं.


यौन शोषण और महिलाओं के कपड़ों को लेकर कटघरे में खड़ा करना ये कोई नया मुद्दा नहीं है. मर्दवादी समाज हमेशा से महिलाओं, लड़कियों के बारे में यही कहता आया है. पर्दे के पैरोकार हर बलात्कार के बाद यही कहते मिल जाते हैं कि लड़की ने पर्दा किया होता तो ये ना होता. सवाल यही है कि क्या पर्दा, हिजाब, घूंघट में रहने वाली महिलाएं, लड़कियां हवस का शिकार नहीं बनती हैं. जिस समाज में 6 महीने की बच्ची यौन शोषण से ना बची हो उसके लिए क्या कहा जाए? हम चीखते चिल्लाते हैं और कहते हैं कि लड़कियों के कपड़ों से बलात्कार का कोई लेना देना नहीं है. यौन शोषण करने वाला ये नहीं देखता है कि उसके सामने बच्ची है या फिर कोई अधेड़ महिला. उसने कैसे कपड़े पहने हैं.


कोर्ट का ये फैसला हैरान करने के साथ साथ बेहद आपत्तिजनक है. महिलाओं के लिए मुश्किल खड़ा करने वाला है. क्योंकि कोई भी महिला अगर किसी पर यौन शोषण का आरोप लगाती है तो उसे पहले साबित करना होगा कि उसने कैसे कपड़े पहने थे. क्या सलवार सूट और साड़ी पहनने वाली महिलाएं बलात्कार, शोषण का शिकार नहीं होती हैं?


निर्भया गैंगरेप केस ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. देश बलात्कारियों के खिलाफ खड़ा हुआ था लेकिन उस वक्त भी सवाल लड़की पर खड़े किए गए थे. उसका चरित्र हनन किया गया. ये कहा गया कि रात को उसे अपने दोस्त के साथ नहीं निकलना चाहिए था. ये कोई नए तर्क नहीं हैं, ये बहुत पुरानी सोच और उसके बेहुदा तर्क हैं जो आरोपियों को सरंक्षण देने के बराबर हैं. क्या यौन शोषण बलात्कार को किसी भी सूरत में जस्टीफाई किया जा सकता है? क्या किसी आरोपी कि इस आधार पर ज़मानत दे देना सही है कि महिला ने शॉट्स पहने थे? इसका क्या मतलब निकाला जाए कि कोई महिला अगर छोटे कपड़े पहनती है तो उसके साथ छेड़छाड़ को गलत नहीं माना जाएगा क्योंकि उससे पुरुष यौन रूप से उत्तेजित हो गया? ये फैसला सर पीटने के बराबर है हम शायद आगे बढ़ने के बजाए औरतों के मामले में और पीछे जा रहे हैं.


अगर कोर्ट के दूसरे तर्क की बात करें तो ये माना जाएगा कि कोई बुज़ुर्ग किसी का यौन शोषण नहीं कर सकता है, जबकि अनगिनत मामले में बुज़ुर्ग यौन शोषण के दोषी निकले हैं. 74 साल का मर्द महिला के कम कपड़े देख उत्तेजित हो सकता है लेकिन वो ना महिला के साथ बदसलूकी कर सकता है ना उसके स्तन दबा सकता है. क्या कमाल लॉजिक है. पुरुषों को लेकर कहा जाता है कि मर्द कभी बूढ़ा नहीं होता है तो फिर ये मर्द कैसे बूढ़ा मान लिया गया? कोर्ट ने जिस तर्क के आधार पर आरोपी सिविक चंद्रन को जमानत दी है वो बेहद आपत्तिजनक हैं और गले से उतरने वाले नहीं हैं. सिविक चंद्रन यौन शोषण के दोषी हैं या नहीं ये तो पूरी सुनवाई के बाद साबित होगा लेकिन उन्हें जिस आधार पर जमानत मिली है वो बहुत से सवाल खड़े कर रहे हैं.


कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ़ जमकर लिखा जा रहा है और सवाल उठाए जा रहे हैं. महिलाएं मुखर होकर कोर्ट के इस फैसले पर आपत्ति जता रहीं हैं. महिलाओं के साथ साथ हर उस इंसान को इस फैसले पर आपत्ति जतानी चाहिए जो संवेदनशील है. महिलाओं के लिए हम सुरक्षित माहौल की बात ना करें, हम पुरुषों को, लड़कों को ना समझाएं बल्कि सारा दारोमदार महिलाओं पर डाल दें. लेकिन महिलाएं और लड़कियां करें क्या? कहां जाएं? किससे अपनी फरियाद करें?


महिलाएं घरों में सुरक्षित नहीं हैं, आंकड़े कहते हैं कि यौन शोषण के मामले में आरोपी कोई करीबी रिश्तेदार या जान पहचान का होता है. महिलाओं के कपड़े उनके शोषण की वजह बन सकते हैं. लेकिन हैरानी इस बात पर हैं कि कि जब कोई बच्ची यौन शोषण की शिकार होती है तो आरोपी कैसे उत्तेजित होता है? मामला वही आ जाता है कि सारी समझाइशें, सारी नसीहतें लड़कियों के लिए हैं. लड़कियों के लिए डू और डोंट्स की बहुत लंबी लिस्ट है. इसमें कोर्ट ने एक पैरा और जोड़ दिया है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: August 18, 2022, 10:31 am IST