खजुराहो; लाइट एंड साउंड की जगह सन्नाटा, पर यह तो हर शहर की कहानी लगती है...

विश्व में अपनी अलग पहचान रखने वाले खजुराहो के लोग कोरोनाकाल में दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो रहे हैं. जो एक्ट ऑफ गॉड है वो इनकी ज़िंदगी पर भारी पड़ रहा है. विदेशी सैलानियों का आना यहां जनवरी-फरवरी से ही कम हो गया था और मार्च से जो टोटल लॉक डाउन हुआ उससे तो यहां के लोगों की ज़िंदगी और खुशियां ही लॉक हो गईं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 23, 2020, 12:50 PM IST
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खजुराहो; लाइट एंड साउंड की जगह सन्नाटा, पर यह तो हर शहर की कहानी लगती है...
दुनिया के नक्शे पर भले खजुराहो चमकता हुआ सितारा हो लेकिन यहां के बाशिंदे अंधेरे की तरफ़ चले जा रहे हैं.
उदास चेहरे और नाउम्मीद नज़रें, परेशानी इतनी की बस आंख से आंसू ही नहीं निकले लेकिन दिल ज़ार ज़ार रो रहा हो जैसे. हर शख़्स परेशान नज़र आया और हर कोई ये दुआ कर रहा कि ऊपर वाला ये मुश्किल भरा वक़्त ग़ुज़ार दे. हम उस शहर के लोगों की बात कर रहे हैं जहां के दिन खुशनुमा थे और  शाम लाइड एंड साउंड से सराबोर हुआ करते थे. एक ऐसा शहर जिसकी कला और मंदिरों ने पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई. दुनियाभर के सैलानी यहां के मशहूर मंदिर देखने के लिए हज़ारों की तादाद में आते थे लेकिन अब सन्नाटा पसरा है. मैं बात कर रही हूं विश्व धरोहर पर्यटन नगरी खजुराहो की. जो किसी भी पहचान का मोहताज नहीं रहा है. लेकिन अब वहां के लोग भुखमरी की कगार पर हैं. निराशा, नाउम्मीद और आगे अंधकारमय भविष्य.

दिल्ली में नौकरी करने के दौरान जब भी साथी पूछते आप कहां की हो तो बताती कि छतरपुर. उन्हें लगता कि मैं दिल्ली के छतरपुर इलाके की बात कर रही हूं. तब मैं कहती नहीं, मध्यप्रदेश का छतरपुर ज़िला, जहां खजुराहो आता है. हमारे इलाके की पहचान ही खजुराहो है. बात सिर्फ़ ज़िले या प्रदेश की नहीं, बल्कि दुनिया के किसी भी कोने में आप खजुराहो का नाम लेते हैं तो लोग फटाक से पहचान जाते हैं. यहां के मंदिर, यहां की मूर्तियां और कलाकृति अनोखी हैं. विश्व में अपनी अलग पहचान रखने वाले शहर के लोग आज दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो रहे हैं. जो एक्ट ऑफ गॉड है वो इनकी ज़िंदगी पर भारी पड़ रहा है. विदेशी सैलानियों का आना यहां जनवरी-फरवरी से ही कम हो गया था और मार्च से जो टोटल लॉक डाउन हुआ उससे तो यहां के लोगों की ज़िंदगी और खुशियां ही लॉक हो गईं.

दुनिया के नक्शे पर भले खजुराहो चमकता हुआ सितारा हो लेकिन यहां के बाशिंदे अंधेरे की तरफ़ चले जा रहे हैं. खजुराहो की सड़कों पर सन्नाटा है, ज्यादातर दुकानों पर ताले लटके हैं.


अलग अलग चरणों में खुलने वाला लॉक डाउन यहां की ज़िंदगी में मुस्कुराहट नहीं ला पाया है क्योंकि यहां की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पर्यटन से जुड़ी हुई है. जो सड़कें टूरिस्ट गाड़ियों से भरी रहती थी वहां दो चार लोग खड़े नज़र आए. कार रोक कर हमने उनसे बात की. सड़क किनारे बात कर रहे लोग पर्यटक सहायक निकले यानि की टूरिस्ट गाइड. इनमें से परशुराम तिवारी बताते हैं कि उनके पास अब खाने तक के पैसे नहीं बचे हैं, बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ते थे लेकिन अब फीस भरने की हालत में भी नहीं हैं.
फाइव स्टार हों या बिना स्टार के होटल, सभी पर ताले लटके हुए हैं, उनके पास बिजली का बिल भरने के पैसे नहीं है. यहां काम करने वाले ज़्यादातर स्टाफ को निकाल दिया गया है. उनकी अपनी मजबूरी है. वहीं दूसरे गाइड कहते हैं कि बस हम रो नहीं पा रहे हैं लेकिन हालात इतनी ख़स्ता है कि दिमाग़ काम करना बंद कर देता है. लॉकडाउन खुलने के बाद ऐसे ही रोज़ाना सड़कों पर खड़े रहते हैं शायद कोई ग्रुप आ जाए और एक दिन की रोटी का इंतज़ाम हो जाए. जर्मन भाषा के गाइड घनश्याम तिवारी कहते हैं कि अब नहीं पता ज़िंदगी कब पटरी पर आएगी. अब कोरोना वैक्सीन का इंतज़ार है लेकिन तब तक ज़िंदगी कहां ले जाएगी कहा नहीं जा सकता है.

जैसे-जैसे हम खजुराहो मंदिर परिसर के पास पहुंच रहे थे थोड़ी चहल पहल दिखी. लेकिन जब वहां लोगों से बात की तो ज़्यादातर गाइड, हॉकर्स, दुकानदार थे. जो रोज़ाना यहां ऐसे ही बैठे रहते हैं.


स्पेनिश भाषा के गाइड कमलेश बताते हैं कि विदेशी भाषाओं के गाइड के लिए स्ट्रगल बहुत ज़्यादा है. वजह, यहां अभी लोकल विमान सेवाएं ही शुरु नहीं हुईं है तो अंतरराष्ट्रीय टूरिस्ट आने के बारे में सोचना भी बेकार है. कोराना वायरस अब हमारी ज़िंदगी पर भारी पड़ रहा है. जमापूंजी खत्म हो गई, साहूकारों के कर्ज में डूब रहे हैं. लोगों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं. आर्ट एंड क्राफ्ट की दुकान चलाने वाले मंदिर के लिए नारियल, लाइ और अगरबत्ती बेच रहे हैं. कुछ दिन पहले यहां एक मैक्सिकन कपल आया था तो मीडिया में खूब खबर चली कि खजुराहो के लोगों के चेहरे खिले, लेकिन ये लोग कहते हैं कि वो दिल्ली में रहने वाले विदेशी थे. और एक विदेशी जोड़े के आने से क्या पूरे शहर का पेट भर जाएगा. यहां का रिक्शा चलाने वाला, गाइड, होटल, टैक्सी, या दुकानदार सभी सैलानियों के भरोसे हैं.पर्यटन मंत्री प्रह्लाद पटेल से भी खजुराहो के लोग खासे नाराज़ हैं. कहते हैं कि पर्यटन मंत्री हमारे पास के ही इलाके के हैं लेकिन यहां एक बार भी नहीं आए. खजुराहो भले यूनेस्को में अपना नाम बनाए हुए हो लेकिन राज्य और केंद्र सरकार ने इस धरोहर को हाशिए पर रखा हुआ है. यहां तक पहुंचने के सारे रास्ते खराब है. अब तक यहां सिर्फ़ एक ट्रेन थी, जो अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट था वो भी यहां से चला गया. लोगों से बात करते हुए हमारी मुकालात निरंजन सेन से हुई जो अपने पिताजी की दुकान चला रहे थे. निरंजन गो एयरलाइंस में एयरपोर्ट मैनेजर हैं. कंपनी ने मार्च से छुट्टी पर भेज दिया है, वो भी बिना किसी सैलरी के. हां इतनी गनीमत है कि नौकरी से नहीं निकाला है. निरंजन कहते हैं कि छोटे-छोटे एयरपोर्ट से डॉमेस्टिक फ्लाइट्स शुरु हो गईं हैं तो खजुराहों में लोकल फ्लाइट्स शुरु क्यों नहीं की जा रही हैं. कम से कम कुछ लोगों का आना तो शुरु होगा.

हाथ में कुछ किताबे लिए हुए दो लोग नज़र आए. उन्होंनें बताया कि वो पिछले चालीस साल से खजुराहो साहित्य बेचते हैं. इसी से रोज़ी रोटी चल रही थी लेकिन अब भुखमरी की नौबत है. ये कहते हैं कि सरकार हम जैसे लोगों के लिए दो या तीन हज़ार मासिक मदद दे दे जब तक पर्यटकों का आना शुरु नहीं होता है. फिर हमें सरकारी मदद की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी. कोराना ने सबकी ज़िंदगियों को रोक दिया है लेकिन यहां के हालत बेहद खराब है.

ये बात सिर्फ़ एक शहर की नहीं जहां के लोग पर्यटन के भरोसे हैं. हर वो शहर, हर वो टूरिस्ट प्लेस और वहां से जुड़े लोग इस कदर परेशान हैं कि उन्हें अब कुछ समझ नहीं आ रहा है.


जगह, नाम और चेहरे बदल सकते हैं लेकिन पर्यटन उद्योग से जुड़े हर शख्स की हालात बेहद खराब है. कोरोना काल से जुझते हुए लोगों के लिए सरकार भले ही आर्थिक मदद का ऐलान किया लेकिन पर्यटन उद्योग के लिए कोई मदद नहीं की. हज़ारों की तादाद में नौकरियां गई. होटल में काम करने वाले, टैक्सी चलाने वाले, रेस्टोरेंट में काम करने वाले और भी अनगिनत लोग अपनी नौकरियों से हाथ धो बैठे है. सरकारें कहती हैं कि हम हर परिवार को अनाज दे रहे हैं लेकिन इनके पास ना ही बीपीएल कार्ड है ना ही कोई सरकारी कार्ड जिससे ये सरकारी योजनाओं का भी फायदा उठा पाएं यानि कि मध्यम वर्ग जो पर्यटन उद्योग से जुड़ा है वो खून के आंसू रो रहा है. सरकारों से अपील कर रहे हैं प्लीज़ हमारी सुनिए कहीं ऐसा ना हो कि बहुत देर हो जाए और हम तबाह हो जाएं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: September 23, 2020, 12:50 PM IST
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