क्यों ख़त्म नहीं होता दहेज का दानव?

हरियाणा के महेंद्रगढ़ के रिंकू की. जिसकी 22 नंबवर को बरात आनी थी. लड़का बीएसएफ में एएसआई था लेकिन शादी के दिन बारात रिंकू के दरवाज़े नहीं पहुंची. वजह वही पुरानी दहेज. लड़का सोनू शादी में क्रेटा ना मिलने से नाराज़ था और इसीलिए बारात लेकर नहीं पहुंचा.

Source: News18Hindi Last updated on: December 8, 2021, 2:19 PM IST
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क्यों ख़त्म नहीं होता दहेज का दानव?

वो खुश है और पुरसुकून है. उसने जो फ़ैसला लिया, उसके लिए दुनिया उसे सलाम कर रही है. उसने एक लालची इंसान और उसके परिवार को सलाखों के पीछे पहुंचाया. हम बात कर रहे हैं हरियाणा के महेंद्रगढ़ के रिंकू की. जिसकी 22 नंबवर को बरात आनी थी. लड़का बीएसएफ में एएसआई था, लेकिन शादी के दिन बारात रिंकू के दरवाज़े नहीं पहुंची. वजह वही पुरानी दहेज. लड़का सोनू शादी में क्रेटा ना मिलने से नाराज़ था और इसीलिए बारात लेकर नहीं पहुंचा. दुल्हन और परिवार वाले इंतज़ार करते रह गए. बाद में लड़की वालों ने लड़के और उसके परिवार पर दहेज का मामला दर्ज कराया. दुल्हे और उसके माता पिता को गिरफ़्तार कर लिया गया. बाद में उन्हें ज़मानत मिल गई.


ग्रेजुएशन कर कर रही रिंकू को अपनी शादी टूटने का कोई अफ़सोस नहीं है. वो कहती है कि ईश्वर ने उसे दहेज लोभियों के चंगुल में जाने से बचा लिया है. रिंकू के हौसले की तारीफ़ हो रही है. वो नाउम्मीद नहीं हुई, ना उसके परिवार ने हिम्मत हारी. आज हालात ये है कि रिंकू के रिश्ते के लिए अधिकारियों, बिजनेसमैन और अच्छे परिवारों के रिश्ते आ रहे हैं वो भी बिना किसी डिमांड के. रिंकू के पिता कहते है कि उनकी बेटी के भाग्य अच्छे थे. वो कोई बेहतर ल़ड़का डिज़र्व करती है.


वहीं, हरियाणा से ही दूसरी ख़बर है. करनाल में फॉरच्यूनर गाड़ी और 20 लाख रुपए की डिमांड की वजह से फेरे के लिए लड़का नहीं आया. लड़का कृषि विभाग में पदस्थ है और लड़की शिक्षा विभाग में. लड़की के घरवालों का आरोप है कि गाड़ी की डिमांड पूरी ना कर पाने की वजह से लड़के वाले फेरे कराने को तैयार नहीं हुए. लेकिन बात जब पुलिस तक पहुंची तो फिर सुबह जाकर फेरे हुए. हम बात करें लड़की की क्वालिफिकेशन की तो लड़की एलएलबी,एलएलएम और पीएचडी है साथ ही सरकारी नौकरी में है.


यहां मामले दोनों दहेज के हैं. लेकिन, एक में लड़की और उसके परिवार की हिम्मत और हौसले से दहेज लोभियों को सलाख़ों के पीछे पहुंचाया गया और दूसरे में जैसे तैसे मान मनव्वल कर शादी करवाई गई. रिंकू जो ग्रेजुएशन कर रही है, वो इस बात से खुश है कि उसकी ज़िंदगी बच गई है. अब उसके पिता के पास बेहतर रिश्ते आ रहे हैं. हालांकि ये कोई पहला मामला नहीं है जब लड़की ने हिम्मत नहीं हारी हो वो डट के खड़ी रही हो. इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसमें दुल्हन दहेज लोभी दूल्हों की बारात लौटा चुकी हैं और वो मिसाल बनी हैं, उन्हें बेहतर जीवनसाथी मिले हैं.

दहेज को लेकर समाज की सोच बदलने का नाम नहीं ले रही है. बाज़ार सजा हुआ है जहां दूल्हा बिकता है और लोग उसकी बोली लगाते हैं. इसमें जितनी गलती लड़के वालों की है, कहीं ना कही उतनी ही गलती लड़की वालों की होती है. जितना बड़ा ओहदा उतनी बड़ी बोली और ये सब खुलेआम होता है. लोग दिखावा करने के लिए भी दहेज देते और लेते हैं. रिंकू खुशनसीब थी कि उसका जीवन नर्क होने से बच गया.


लेकिन, दूसरे मामले में शादी की नींव ही लोभ में पुलिस के बीच रखी गई है. जबकि लड़की अच्छी खासी पढ़ी लिखी है सरकारी नौकर है. दुल्हन का पिता लाचारी दिखाते हुए कहते हैं कि इतनी पढ़ी लिखी और नौकरीपेशा लड़की को ऐसे छोड़ा जा रहा है कि तब लड़की का पिता क्या करे. इस मामले में लड़की के पिता खुद को मजबूर बता रहे हैं जबकि उन्हें अपनी बेटी पर ग़ुरूर होना चाहिए. उन्हें चाहिए था कि वो दहेजलोभियों को सबक सिखाएं. अपनी बेटी के बेहतर भविष्य के लिए नया रास्ता चुनें.


रिंकू और उसके पिता दूसरे परिवारों के लिए मिसाल हैं, जो बेटी को बोझ नहीं मान रहे हैं. उनके हिम्मत और हौसले ने नए रास्ते खोलें हैं. उनकी बेटी किसी दहेजलोभी के घर जाती उससे बेहतर है कि वो अपने घर में है. समाज में इज़्ज़त के नाम पर बेटियों को बोझ समझा जाता है, उन्हें किसी तरह बियाह दिया जाए और अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त होने की सोच बेटियों को मुश्किल में डाल देती हैं.


बेटियों के माता-पिता को चाहिए कि वो अपनी बेटियों को दहेजलोभियों से बचाएं. पीएचडी पास, सरकारी नौकरी पेशा बेटी का पिता लाचार नहीं हो सकता है. लेकिन, समाज की सोच ने उसे लाचार बना दिया है. दहेज लोभी दूल्हे की बारात अगर नहीं आती है या बापस जाती है तो ये शुभ संकेत है. लड़की पक्ष को चाहिए कि वो ऐसे दहेज दानवों को सबक सिखाए ना कि अपनी इज्ज़त के लिए रोते रहे. लड़की या उसके परिवार की इज्ज़त इस बात से कतई कम नहीं होगी कि दहेज लोभियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है.

समाज को भी चाहिए कि अपनी सोच बदले. जो पीड़ित है उसके साथ संवेदना रखे ना कि उसी पर उंगलियां उठाएं. दरअसल बेज़्ज़ती लड़के वालों की होनी चाहिए. समाज को ये ठान लेना चाहिए कि लड़का कितने भी अच्छे ओहदे और पद पर क्यों ना हो, उसके घर रिश्ता लेकर नहीं जाएंगे. ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए. लेकिन ऐसा करने के बजाए कोई और ज्यादा पैसे लेकर उसके घर पहुंच जाएगा. इसी वजह से दहेजलोभियों के हौसले कम होने का नाम नहीं ले रहें हैं, हमें चाहिए कि ना हम दहेज ले ना दें. जब तब दहेज दिया जाता रहेगा तब तक दहेज मांगा जाता रहेगा.


बेटी की पैदाइश पर उसकी शादी की चिंता, उसके दहेज की चिंता करने से बेहतर है कि हम उसकी पढ़ाई की चिंता करें. बेटी पैदा होते ही माथे पर लकीरें ना आएं. पिता के सिर पर बोझ ना पड़े वो अपनी बेटी की शादी के बजाए उसके बेहतर भविष्य की राह खोले. अच्छा लड़का तलाशने के लिए लड़की वाले भी हाथ में रुपयों की गड्डियां लेकर निकलते हैं जो दहेज को बढ़ावा देता है. ऐसे में ग़रीब परिवार के लिए बेटियां बोझ बन जाती हैं. पिता का कंधा झुक जाता है. दहेज के दानव को मारना है कि शुरुआत बेटियों के पिता को करनी होगी कि वो पैसा देकर दूल्हा नहीं खरीदेंगे.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: December 8, 2021, 2:19 PM IST
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