NGT: बकस्वाहा के जंगलों की कटाई पर लगी रोक, बड़ी लड़ाई के पड़ाव में पहली जीत

एनजीटी के इस फ़ैसले को पर्यावरण प्रेमियों में उत्साह है, लेकिन वो मानते हैं कि अभी लड़ाई लंबी चलने वाली है. एनजीटी ने अपने आदेश में मध्यप्रदेश और केंद्र शासन को नोटिस देते हुए वन विभाग को पेड़ों की कटाई ने होने के आरंभिक आदेश दिया है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 2, 2021, 10:41 AM IST
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NGT: बकस्वाहा के जंगलों की कटाई पर लगी रोक, बड़ी लड़ाई के पड़ाव में पहली जीत


क लंबी लड़ाई का पहला पड़ाव पार कर लिया गया है, वो भी जीत के साथ. छतरपुर के बकस्वाहा जंगलों को कटने से बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमियों ने जो लड़ाई का बिगुल फूंका उसका पहला पड़ाव जीत के साथ पार किया है. एनजीटी (नेश्नल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने फिलहाल जंगलों के काटने पर रोक लगा दी है. एनजीटी के इस फ़ैसले को पर्यावरण प्रेमियों में उत्साह है, लेकिन वो मानते हैं कि अभी लड़ाई लंबी चलने वाली है, क्योंकि एक तरफ़ मध्यप्रदेश सरकार है तो दूसरी तरफ बिड़ला ग्रुप है. एनजीटी ने अपने 27 पेज के आर्डर में मध्यप्रदेश और केंद्र शासन को नोटिस देते हुए वन विभाग को पेड़ों की कटाई ने होने के आरंभिक आदेश दिया है.

एनजीटी का आदेश
एनजीटी भोपाल में बुधवार को बकस्वाहा जंगल को लेकर लगी दोनों पीटीशन की संयुक्त सुनवाई हुई. प्र. संख्‍या 34 व 35/21 की संयुक्त सुनवाई में तीनों पीटीशनर उज्जवल शर्मा-डॉ.पुष्पराग-डॉ.पी जी नाजपांडे की पीटीशन के विरुद्ध एसेल आदित्य बिड़ला हीरा कंपनी को अपना हलफनामा देने के निर्देश पिछली पेशी पर दिये गए थे. बुधवार को दोनों पक्षों की बहस के बाद एनजीटी ने अपना आदेश सुरक्षित कर लिया था, जिसे गुरुवार को अनाउंस किया. एनजीटी ने अपने 27 पेज के आदेश में मध्यप्रदेश और केंद्र शासन को नोटिस के आदेश देते हुए 4 हफ़्तों में अपना जबाब देने को कहा है. अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी.
आदेश में सबसे अहम बात ये थी कि एनजीटी ने मध्यप्रदेश के वन विभाग को पेड़ों की कटाई नहीं होने देने का आदेश दिया है. बक्सवाहा जंगल बचाओ आंदोलन से जुड़े डॉ पुष्पराग कहते हैं कि एनजीटी का ये फैसला पर्यावरण प्रेमियों के लिए बड़ी सफ़लता है. एनजीटी का ये आदेश आने वाले समय में दूसरे मामलों के लिए नज़ीर होगा. वो खुश हैं और कहते हैं कि एनजीटी ने एक बार फिर से साबित किया है कि उनके होते हुए कोई पर्यावरण और जंगलों को मनमाना नुकसान नहीं पहुंचा सकता है.

कंपनी ने सुनवाई के दौरान बताया कि..
बकस्वाहा बचाओ आंदोलन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता व गुना के निवासी पीटीशनर डॉ. पुष्पराग, एडवोकेट ने बताया कि एसेल आदित्य बिरला हीरा कंपनी की तरफ से बुधवार 30 जून को एनजीटी  भोपाल में लगभग 30 पेजों का लंबा एफडेविड पेश किया. अपने विस्तारित एफडेविड में कंपनी ने माना कि वो मध्यप्रदेश शासन को इस प्रोजेक्ट के बदले लगभग 27. 52 करोड़ रुपये दे चुकी है. माइनिंग विभाग कंपनी को अग्रीमेंट से 3 साल के अंदर सारे क्लीयरेंस करा कर देगी ( याने 2022 तक) इसे 2 साल के लिए बढ़ाया भी जा सकता है.
अपने शपथ पत्र मे कंपनी ने दावा किया कि हीरा निकाले जाने बाली साइट के 10 किमी की परिधि में कोई रिजर्व फॉरेस्ट या वाइल्ड लाइफ सेंचुरी नहीं है. फॉरेस्ट की रिपोर्ट में कोई भी विशिष्ट जानवरों की उपस्थिति नहीं बताई गयी है. अभी फॉरेस्ट का क्लीयरेंस नहीं हुआ है, इसलिए प्रकरण प्री मेचुअर है. पर्यावरण जंगल सहित सभी अनुमतियों के बिना कोई पेड़ नहीं काटा जायेगा. कंपनी ने किसी पर्यावरण कानून का उल्लंघन नहीं किया है. ग्राउंड वॉटर का उपयोग सभी आवश्यक अनुमति लेकर ही किया जायेगा. बिना सीजनल  नाले को डाइवर्ट किये माइनिंग संभव नहीं होगी. निकाले गए ग्राउंड वॉटर को हम बारिश के पानी का वॉटर हार्वेस्टिंग करके रिप्लेस करेंगे.


बकस्वाहा के अगले 10-12 वर्षों में 215000 पेड़ काटे जायेंगे, जिनकी जगह 1.8 गुना ज्यादा 380000 पेड़ लगाने की योजना है, जिसके लिए कंपनी 15.8 करोड़ रुपए का खर्च करेगी ( यानी प्रति पेड़ लगभग 415 रूपए). हीरा खनन से क्षेत्र का विकास होगा. कंपनी ने बताया की इस कोर्ट में 2 व सुप्रीम कोर्ट में एक और हाई कोर्ट जबलपुर मे सिमिलर केस पेंडिंग हैं. कंपनी ने कहा कि उन्हें बिना वजह परेशान किया जा रहा है. बहस के दौरान, बकस्वाहा जंगल पक्ष ने अपनी दलील देते हुए अनेक तर्क दिये. दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश माननीय जस्टिस शेओ कुमार सिंह व विशेषज्ञ मेंबर जस्टिस अरुण कुमार वर्मा  ने अपने 27 पेज के ऑर्डर में शासन को नोटिस जारी किए.

क्या है बक्सवाहा प्रोजेक्ट
सरकार ने 20 साल पहले छतरपुर के बक्सवाहा में बंदर प्रोजेक्ट के तहत सर्वे शुरू किया था. दो साल पहले मप्र सरकार ने इस जंगल की नीलामी की थी, जिसे आदित्य बिड़ला ग्रुल के एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड ने खनन के लिए खरीदा. हीरा भंडार वाली 62.64 हेक्टेयर ज़मीन को मध्यप्रदेश सरकार ने इस कंपनी को 50 साल के लिए लीज पर दिया है. लेकिन कंपनी ने 382.131 हेक्टेयर का जंगल मांगा है. कंपनी का तर्क है कि बाकी 205 हेक्टेयर जमीन का उपयोग खदानों से निकले मलबे को डंप करने में किया जाएगा. कंपनी इस प्रोजेक्ट में 2500 करोड़ रुपए का निवेश करने जा रही है.

विरोध हुआ तेज़
बक्सवाहा के जंगलों को काटने से रोकने के लिए देशभर में विरोध के स्वर उठे, सोशल मीडिया पर #SAVEBAXWAHAFOREST ट्रेंड किया. जिसके बाद से देश के नक्शे पर अचानक से बक्सवाहा के जंगल छा गए. पर्यावरण प्रेमी हीरों के लिए जंगल काटे जाने के खिलाफ़ है. बुंदेलखंड के फेफड़े कहे जाने वाले ये जंगल कटने से बुंदेलखंड के प्राकृतिक संतुलन पर बुरा असर पड़ेगा. एनजीटी का ये आदेश फिलहाल बड़ी राहत माना जा रहा है. लेकिन, ये लड़ाई लंबी चलने वाली है मध्यप्रदेश सरकार किसी भी कीमत पर पीछे हटने को राज़ी नहीं दिख रही है. वो बक्सवाहा में विकास की बात कर रही है, तो ढाई लाख के बदले में बड़ा प्लांटेशन किए जाने का दम भर रही है. हालांकि, पर्यावरण प्रेमियों और बक्सवाहा बचाओ आंदोलन से जुड़े लोग भी अपनी कमर कस चुके हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: July 2, 2021, 10:41 AM IST
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