हाथरस केस: पुलिस ने पीड़ित नहीं 'समाज’ की चिता जलाई, और हम जस्टिस फॉर....बस नाम बदलते जाएंगे

ये कोई पहली या आख़िरी वारदात नहीं है. निर्भया, गुड़िया, आसिफ़ा इनके नाम के आगे बस जस्टिस फॉर एक सा रहता है और नाम बदलते रहते हैं. महिला आयोग अनुराग कश्यप या किसी और सेलिब्रिटी पर छेड़छाड़ का आरोप लगाने के मामले में फौरन एफआईआर मांग लेती है लेकिन यहां तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं. आखिर कितने सिलेक्टिव होंगे.

Source: News18Hindi Last updated on: September 30, 2020, 9:49 PM IST
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हाथरस केस: पुलिस ने पीड़ित नहीं 'समाज’ की चिता जलाई, और हम जस्टिस फॉर....बस नाम बदलते जाएंगे
ज़ुल्म, ज़्यादती और हैवानियत से लड़ते हुए हाथरथ की मासूम लड़की 15 दिन तक मौत से जूझती रही लेकिन हार गई. (Source: News18)
वो कह रहे हैं कि आधी रात को 2 बजे उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया. यह भी कह रहे हैं कि परिवार की मर्ज़ी से दिन ढलने के बाद रात के गहरे अंधेरे में उसे मुखाग्नि दी गई. तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं. चिता के नाम पर कुछ लकड़ियों का ढेर और परिवार के नाम पर मुखाग्नि देने के लिए कुछ पुलिसवाले. वहां मौजूद पत्रकार पुलिस अधिकारियों से सवाल करते रहे कि ये क्या जलाया जा रहा है तो जवाब में जैसे मुंह सिल दिए गए हों. दरअसल आधी रात को हाथरस में हैवानियत की शिकार 19 साल की दलित लड़की का शव नहीं जलाया गया, बल्कि प्रशासन ने आग लगा दी अपनी लापरवाही को, आनन-फानन में ख़़त्म कर दिए गए सारे सबूत, हमेशा के लिए मिटा दिया गया उस सच को जो शायद कब्र से भी निकल आता है. लेकिन जो जला दिया गया उसका क्या. मां अपनी बेटी के अंतिम दर्शन के लिए गुहार लगाती रही, वो कहती रही कि मेरी बेटी को मुझे आख़िरी बार हल्दी लगाकर विदा करने दो लेकिन बेरहम प्रशासन तो जैसे ज़ुल्म पर उतारू था. उसने मां की एक नहीं सुनी और संगीनों के साए में जला दिया उस लड़की को जो मरते मरते इशारों में ये बता गई कि उसके साथ 4 लड़कों ने बलात्कार किया है. वो बोल नहीं पाई क्योंकि उसकी ज़ुबान काट दी गई, वो हिल नहीं पाई क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई थी.

ज़ुल्म, ज़्यादती और हैवानियत से लड़ते हुए हाथरथ की मासूम लड़की 15 दिन तक मौत से जूझती रही लेकिन हार गई. घटना 14 सिंतबर की है. परिवार का आरोप है कि जब उनकी बेटी अपने भाई और मां के साथ खेत में घास काटने गई थी तो गांव के ही चार सवर्ण दबंग लड़कों ने उसके साथ बलात्कार किया, उसकी ज़ुबान काट दी, ज़ुल्म और हैवानियत की इंतहां कहिए कि लड़की की रीढ़ हड्डी भी तोड़ दी गई. आठ दिन तक पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने में हीलाहवाली की. लड़की 13 दिन तक अलीगढ़ में वेंटिलेटर पर रही और सोमवार को सफदरजंग में भर्ती कराई गई. जहां उसने ये ज़ालिम दुनिया छोड़ दी. ये ख़बर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैली लेकिन देश का मुख्य मीडिया मौन रहा. सोशल मीडिया पर जस्टिस फॉर..... फिर शुरु हुआ. जो थोड़े बहुत ज़िंदा लोग थे उनका गुस्सा फूट पड़ा. उत्तरप्रदेश सरकार और प्रशासन से सवाल किए जाने लगे. हालांकि एसपी साहब कहते हैं कि लड़की की ज़बान काटने की ख़बर अफ़वाह है ऐसा कुछ नहीं हुआ है. एसपी साहब कहते हैं कि गैंगरेप के बाद अब हत्या का मामला भी दर्ज कर लिया गया है.

मामला तूल पकड़ने पर उठी इंसाफ दिलाने की बात
पीड़ित लड़की की मौत के बाद हाथरस डीएम ट्वीट करते हैं. उन्होंने ट्वीट किया है, ‘चंदपा थाना वाले प्रकरण में पीड़िता के परिजनों को पूर्व में 4,12,500 रुपये की आर्थिक सहायता दी गई थी. आज 5,87,500 रुपये की सहायता और दी जा रही है. इस प्रकार कुल 10 लाख रुपये से आर्थिक सहायता की गई है.’ यानि वे एक तरह से कहना चाहते हैं कि इंसाफ़ कर दिया गया. इस ट्वीट में डीएम साहब की संवेदनहीनता और बेशर्मी साफ़ दिखाई दी. हालांकि दूसरे ट्वीट में उन्होंने अपनी संवेदना प्रकट की. मामला तूल पकड़ता है तो सूबे के मुखिया भी बुधवार को ट्वीट कर बताते हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बात की है और पीड़ित परिवार को हर हाल में इंसाफ़ दिलाया जाएगा. इसके लिए तीन सदस्यीय एसआईटी भी गठित कर दी गई है जो एक हफ़्ते में अपनी रिपोर्ट देगी.
10 लाख रुपए दे दिए, एसआईटी बना दी, चारों आरोपी गिरफ्तार हो गए. बस हो गया इंसाफ़? नहीं ये इंसाफ़ नहीं है, बल्कि ये ज़ुल्म और ज़्यादती पर मैली चादर डालना है. उत्तरप्रदेश की दबंग पुलिस जो बड़े-बड़े माफियाओं, गैंगस्टर को मार गिराती है, उन्हें महाकाल के सामने से उठा लाती है, आखिर वो हाथरस मामले में इतनी लाचर कैसे हो गई. क्या एक मरती हुई लड़की झूठ बोलेगी कि उसके साथ हैवानियत हुई, क्यों उसके मौत के बाद हरकत में आई सत्ता और शासन. अगर मेडिकल रिपोर्ट में कोई शक की गुंजाइश थी तो इतनी जल्दी शव जलाने की जल्दी क्यों की. दरअसल, ये शासन-प्रशासन ने इंसाफ़ तो जलाया है, सबूतों को ख़त्म कर दिया है. अपनी लारपवाही को ख़ाक़ किया है.

अब आरोपी की जाति-धर्म देखकर खौलता है लोगों का खून
ख़ैर ऐसा भी नहीं है कि बलात्कार पीड़ित के साथ लोग खड़े नहीं होते हैं लेकिन उसके लिए ज़रूरी है उसमें कोई एंगल होना. जैसे आरोपी दूसरे धर्म के हों, या फिर उनका ताल्लुक विरोधी पार्टी से हो. मध्यप्रदेश के सतना में बलात्कार के मामले में इंसाफ़ दिलाने के लिए एक पार्टी ने ज़मीन आसमान एक कर दिया है. शायद इसकी वजह आरोपी का मुस्लिम होना और उसका ताल्लुक विरोधी पार्टी से होना हो. दरअसल हम इस क़दर मरे हुए लोग हैं कि अब मवाद निकलने लगा है. मवाद की गंध से पूरी समाज बदबू मार रहा है. इससे बदतर कुछ नहीं है कि अब बलात्कार और हत्या जैसे घिनौने मामले भी धर्म के चश्मे से देखे जा रहे हैं. इसलिए तो लड़कियों, बच्चियों के जिस्म में सरिया डाल दिया जाता है, उनके जिस्म को काट दिया जाता है, उनकी आंते निकाल ली जाती हैं, ज़ुबान काट ली जाती है, सिर कुचल दिया जाता है. क्योंकि अब तो लोगों का ख़ून आरोपी की जाति और धर्म देखकर खौलता है ना. तभी तो बलात्कार जैसे गंदे और घिनौने अपराध करने वाले आरोपियों के समर्थन में रैलियां निकाली जाती हैं. हाथरस वाले मामले में ही हिस्सा-बंटवारा हो गया है. बेशर्म घटिया लोग सिरे से इस हैवानियत को नकार रहे हैं. सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है.ये कोई पहली या आख़िरी वारदात नहीं है. निर्भया, गुड़िया, आसिफ़ा इनके नाम के आगे बस जस्टिस फॉर एक सा रहता है और नाम बदलते रहते हैं. महिला आयोग अनुराग कश्यप या किसी और सेलिब्रिटी पर छेड़छाड़ का आरोप लगाने के मामले में फौरन एफआईआर मांग लेती है लेकिन यहां तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं. आखिर कितने सिलेक्टिव होंगे. गाय और सुअर के लिए मारकाट हो जाएगी, शहर जला दिए जाएंगे, लिंचिंग कर दी जाएगी लेकिन क्या कभी किसी बेटी के लिए आपका ख़ून इस तरह खौला. या फिर जब तक आग हमारे घर तक नहीं आती, तब तक हम तमाशबीन बने रहेंगे. इतना मुर्दा मत बनिए कि सुबह अपनी बहन बेटी से आंख ना मिला पाएं. और बहन बेटियों पर भी ये ज़िम्मेदारी है कि वो हर एक ज़ुल्म के खिलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ उठाएं. सड़क पर आएं, लिखें जितना लिख सकती हैं. अगर हम अपने लिए नहीं खड़े हुए तो जगह कोई भी हो, किसी का हाथ हमारे गिरेबां में भी पहुंच सकता है.

(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: September 30, 2020, 9:49 PM IST
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