पेड़ जरूरी या हीरा; बक्सवाहा में यह लड़ाई लंबी चलने वाली है

मध्य प्रदेश के छतरपुर इलाके में बक्सवाहा जंगल के नीचे दबे करीब 50000 करोड़ के हीरा उत्खनन के लिए ढाई लाख से ज्यादा पेड़ों को काटे जाने के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन. वन अधिकार कार्यकर्ता इस क्षेत्र में रहने वाले वन्यप्राणियों और आम लोगों के हित को देखते हुए पेड़ काटे जाने का कर रहे हैं विरोध. सोशल मीडिया पर भी #Save_Buxwaha_forest कर रहा ट्रेंड.

Source: News18Hindi Last updated on: May 21, 2021, 4:22 PM IST
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पेड़ जरूरी या हीरा; बक्सवाहा में यह लड़ाई लंबी चलने वाली है
हीरा खनन के नाम पर बक्सवाहा के जंगल उजाड़ने के खिलाफ पर्यावरण अधिकार कार्यकर्ताओं ने शुरू किया आंदोलन.
देश के मानचित्र पर अचानक से बक्सवाहा के जंगल चर्चा में गए. टि्वटर पर ट्रेंड करने लगा #savebaxwahaforest. आखिर ऐसा क्या हुआ कि मध्यप्रदेश का बक्सवाहा एकदम चर्चा में आ गया. इससे पहले कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं कहीं कोई हलचल नहीं थी. बक्सवाहा की ज़मीन के नीचे छिपा है बेशकीमती ख़ज़ाना. जी जिसे हासिल करने के लिए राज्य सरकार ने एक निजी कंपनी को बक्सवाहा के जंगल 50 साल के लिए लीज पर दे दिए हैं.

लेकिन क्या इतना आसान है ये ख़ज़ाना हासिल करना नहीं इसके लिए काटे जाएंगे ढाई लाख से ज़्यादा पेड़. जी हां ढाई लाख से ज़्यादा पेड़ो को काटने की तैयारी की जा रही है क्योंकि इस ज़मीन के नीचे छुपे हैं पन्ना से 15 गुना ज्यादा हीरे. और इन्हीं हीरो को हासिल करने के लिए 382.131 हेक्टेयर के जंगल का कत्ल किया जाएगा. जिसके लिए सरकार ने हामी भर दी है. लेकिन अब बुंदेलखंड के लोग अपने जंगलों को काटने दे को राज़ी नहीं है. स्थानीय लोगों ने सरकार के खिलाफ़ मुहिम छेड़ दी है.

क्या है बक्सवाहा प्रोजेक्ट
सरकार ने 20 साल पहले छतरपुर के बक्सवाहा में बंदर प्रोजेक्ट के तहत सर्वे शुरू किया था. दो साल पहले मप्र सरकार ने इस जंगल की नीलामी की थी, जिसे आदित्य बिड़ला ग्रुल के एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड ने खनन के लिए खरीदा. हीरा भंडार वाली 62.64 हेक्टेयर ज़मीन को मध्यप्रदेश सरकार ने इस कंपनी को 50 साल के लिए लीज पर दिया है. लेकिन कंपनी ने 382.131 हेक्टेयर का जंगल मांगा है. कंपनी का तर्क है कि बाकी 205 हेक्टेयर जमीन का उपयोग खदानों से निकले मलबे को डंप करने में किया जाएगा. कंपनी इस प्रोजेक्ट में 2500 करोड़ रुपए का निवेश करने जा रही है.
जमीन से हीरा निकालने के लिए ढाई लाख से ज़्यादा पेड़ों को काटा जाएगा. इसके लिए वन विभाग ने गिनती भी कर ली है. जंगल में बेशकीमती सागौन, जामुन, हेड़ा, पीपल. तेंदु, महुआ समेत कई पेड़ हैं. बिड़ला से पहले ऑस्ट्रेलियाई कंपनी रियोटिंटो ने बक्सवाहा का जंगल लीज़ पर लिया था, लेकिन मई 2017 में संशोधित प्रस्ताव पर पर्यावरण मंत्रालय के अंतिम फैसले से पहले ही रियोटिटों ने यहां काम करने से इंकार कर दिया था. कंपनी ने उस दौर में बिना अनुमति 800 से ज्यादा पेड़ काट डाले थे. अनुमान के मुताबिक बक्सवाहा के जंगलों की जमीन के नीचे 50 हज़ार करोड़ रुपए के हीरे हैं.


#SAVE_BAXWAHA_FOREST
अब सवाल ये उठता है कि इस देश में पेड़ ज़रूरी या हीरा. इस महाविनाश को रोकने के लिए सोशल मीडिया पर #Save_Buxwaha_forest #बक्सवाहा_बचाओ_अभियान जैसे हैशटैग का उपयोग कर सरकर के इस फैसले का विरोध कर रहा है. वहीं 5 जून पर्यावरण दिवस के अवसर पर देशभर से पर्यावरणविद इस प्रोजेक्ट का विरोध करने के लिए छतरपुर स्थित बक्सवाहा के जंगलों की ओर कूच करेंगे. सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी स्तर तक सरकार के इस फैसले का विरोध हो रहा है. स्थानीय युवाओं की तरफ़ से शुरु की गई इस मुहिम ने रंग लाना शुरू कर दिया है. बात करें टि्वटर की तो #Save_Buxwaha_forest ट्रेंड हुआ और लोगों की नज़रों में भी आया. लोग किसी भी कीमत ये जंगल कटने नहीं देना चाहते हैं. इनका कहना है कि हम अपने इलाकों तबाह नहीं होने देंगे.RTI एक्टिविस्ट अजय दुबे कहते हैं कि “बुंदेलखंड में बक्सवाहा के जंगलों की जैव विविधता को नष्ट करने की जल्दबाजी आत्मघाती कदम है और इसे तत्काल रोकना चाहिए .मध्यप्रदेश की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने हीरों के लालच में बिड़ला समूह को न केवल लाखों पेड़ और वन्य प्राणियों की बर्बादी का रास्ता खोला बल्कि आम जनता के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई लाइन काटने निंदनीय कार्य किया. बुंदेलखंड में सूखा जैसी प्राकृतिक संकट से निपटने की बजाये प्रकृति की अमूल्य धरोहर को नष्ट करने से बचाने का मौका शिवराज सरकार के पास है. हम जानते हैं कि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट में लाखों पेड़ों के नष्ट होने के साथ पन्ना टाइगर रिजर्व का 40 फीसदी हिस्सा डूब जाएगा, जो भविष्य की पीढ़ियों के साथ विश्वासघात होगा’’.

पेड़ कटने से नष्ट हो जाएगी जैव विविधता
लगातार इस मुद्दे को कवर कर रहे बक्सवाहा के पत्रकार राजू दुबे ने बताया कि जंगल में बेशकीमती पेड़ हैं, जानवर हैं यह क्षेत्र सघन वन से घिरा हुआ है. साथ ही यह क्षेत्र जैव विविधता से भी परिपूर्ण है. मई 2017 में पेश की गई जियोलॉजी एंड माइनिंग मप्र और रियोटिंटो कंपनी की रिपोर्ट में इस क्षेत्र में तेंदुआ, भालू, बारहसिंगा, हिरण, मोर सहित कई वन्य प्राणियों के यहां मौजूद होने की बात कही गई थी. इतना ही नहीं इस क्षेत्र में लुप्त हो रहे गिद्ध भी हैं. राजू बताते हैं कि उन्होंने जब ग्राउंड रिपोर्ट की तो वहां जानवर दिखे और उनके निशान भी, लेकिन दिसंबर में प्रस्तुत की गई नई रिपोर्ट में डीएफओ और सीएफ छतरपुर ने यहां पर एक भी वन्य प्राणी के नहीं होने का दावा किया है. हीरे निकालने से इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में पेड़ काटे जा रहे हैं. वहीं यहां मौजूद वन्य प्राणियों के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो जाएगा.

जंगल बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख
देशभर में ये मुद्दा गर्माने लगा है. दिल्ली की समाजसेविका नेहा सिंह ने 9 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. याचिका में कहा गया है कि हीरों के लिए हम अपने जीनवदायी लाखों पेड़ों की बलि नहीं दे सकते हैं. लाखों पेड़ों के कटने से पर्यावरण को अपूर्णीय क्षति होगी, हम एक भी पेड़ नहीं कटने देंगे. नेहा सिंह ने हीरा खनन के लिए आदित्य बिड़ला ग्रुप की दी गई लीज़ निरस्त करने की मांग की है. याचिका में कहा गया है कि हीरा खनन हो, लेकिन उनके लिए हमारे जीवन के लिए ज़रूरी पेड़ ना काटे जाएं. पेड़ काटने से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई संभव नहीं है.

याचिका में ये भी कहा गया है कि जिस क्षेत्र में खनन की अनुमति दी गई है वो न्यूनजल क्षेत्र है, यहां पानी की कमी है. कंपनी के काम के लिए बड़ी मात्रा में इस इलाके से पानी का दोहन किया जाएगा, जिसके नतीजतन आसपास का जल स्तर प्रभावित होगा. लोगों को पानी की दिक्कत होगी, साथ ही वन्य प्राणी भी प्यासे मर जाएंगे. लिहाजा इस अनुबंध को निरस्त किया जाए.

कोरोना काल में भारी पड़ी ऑक्सीजन की किल्लत. इस बीच मध्यप्रदेश के सीहोर में एक नज़ीर पेश की गई. यहां सागौन का पेड़ काटने पर 1 करोड़ 21 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया. ये जंगल और पेड़ों के लिए लोगों की आंखें खोलने वाला फैसला था. जो वन विभाग बक्सवाहा में खुद पेड़ों को काटने के लिए गिनती कर रहा है, वही किसान के पेड़ काटने पर कहता है कि कोरोनाकाल में ऑक्सीजन संकट है फिर भी पेड़ों का महत्व नहीं समझ रहे हैं. इसी को लेकर भारी-भरकम जुर्माना लगाया गया है. इंडियन काउसिंल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एज्युकेशन एक पेड़ की औसत उम्र 50 साल मानी गई है. ICFRE के मुताबिक 50 साल में एक पेड़ 50 लाख कीमत की सुविधा देता है. और इन 50 सालो में एक पेड़ 23 लाख 68000 रुपए कीमत का वायु प्रदुषण कम करता है. साथ ही 20 लाख रुपए कीमत की भू-क्षऱण नियंत्रण और उर्वरता बढ़ाने का भी काम करता है.


पेड़ ज़रूरी या हीरा
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जंगल जरूरी हैं या हीरे. लोगों का कहना है कि हीरा निकालना है आप निकालिए, लेकिन उसके लिए इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटने की ज़रूरत क्या है. क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं निकाला जा सकता है कि जंगल को ना काटा जाए. “बुंदेली बौछार” के संपादक सचिन चौधरी जनता की इस मुहिम के साथ हैं, वो कहते हैं कि हम बुंदेलखंड के साथ अन्याय नहीं देख सकते हैं. पानी, सूखे को झेलता इलाका जंगल स्वाहा होने के बाद और बदहाल हो जाएगा. सचिन बताते हैं कि केन-बेतवा लिंक परियोजना के लिए भी लाखों पेड़ काटे जाने हैं, हम उसके भी खिलाफ हैं.

ऐसा नहीं है कि स्थानीय लोग विकास के लिए तैयार नहीं है लेकिन विकास की कीमत लाखों पेड़ तो नहीं हो सकते हैं. ये लड़ाई लंबी चलने वाली है. क्योंकि एक तरफ़ सरकार है और दूसरी तरफ जनता. (डिस्क्लेमरः ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: May 21, 2021, 4:20 PM IST
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