भारत की खोज: क्लब जहां कुत्ते और हिन्दुस्तानी नहीं घुस सकते थे

“कलकत्ता के बंगाल क्लब में कुत्तों और हिंदुस्तानियों का घुसना मना है. बंबई के याट क्लब में कुत्ते तो घुस सकते हैं, पर हिन्दुस्तानी नहीं.“- सामरसेट मॉम, 1938 में भारत यात्रा के बाद.

Source: News18Hindi Last updated on: August 9, 2022, 10:02 am IST
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भारत की खोज: क्लब जहां कुत्ते और हिन्दुस्तानी नहीं घुस सकते थे
डिस्कवरी ऑफ इंडिया में जवाहरलाल नेहरू ने भी बंगाल क्लब के नस्लभेद का जिक्र किया है.

दक्षिण अफ्रीका से 1896 में पहली दफा भारत लौटने पर गांधीजी देश की राजधानी कलकत्ता गए और वहाँ ग्रेट ईस्टर्न होटल में रुके. 1840 में खुला यह होटल इतना आलीशान था कि उसे पूरब का नगीना कहा जाता था. गांधी जी बहुत जल्दी पत्रकारों से दोस्ती गांठ लेते थे. होटल में उनकी मुलाकात लंदन के डेली टेलीग्राफ के संवाददाता जॉन एलरथॉरप से हुई. आगे गांधी जी के शब्दों में:


वे बंगाल क्लब में रहते थे. उन्होंने मुझे वहाँ आने के लिए न्योता. उस समय उन्हे मालूम नहीं था कि होटल के ड्रॉइंग रूम में किसी हिन्दुस्तानी को नहीं ले जाया जा सकता था. बाद में उन्हे इस पाबंदी का पता चला. इस लिए वे मुझे अपने कमरे में ले गए. हिंदुस्तानियों के प्रति स्थानीय अंग्रेजों का तिरस्कार देखकर उन्हे खेद हुआ. मुझे ड्रॉइंग रूम में न ले जाने के लिए उन्होंने माफी मांगी.


club notice


इस घटना के चार दशक बाद ब्रिटिश लेखक सामरसेट मॉम 1938 में हिंदुस्तान घूमने आए. अपनी पुस्तक राइटर्स नोटबुक में वे लख्ते हैं कि वे बरार के प्रिंस साथ लंच कर रहे थे, जिन्होंने उनसे पूछा कि क्या उन्हे बंबई में याट क्लब में ठहराया गया था? मॉम लिखते हैं:


“हाँ,” मैंने जवाब दिया.

“और क्या आप कलकत्ता भी जाएंगे?”

“हाँ.“

“फिर तो आप वहाँ बेंगाल क्लब में रुक रहे होंगे?”

“यही उम्मीद है,” मैंने जवाब दिया.

“क्या आपको मालूम है कि इन दो जगहों में क्या फर्क है?”

मैंने मासूमियत से जवाब दिया, “नहीं.“


इसपर भारतीय मेजबान ने मॉम को बताया कि एक जगह न कुत्ते घुस सकते हैं, न हिन्दुस्तानी, दूसरी जगह कुत्ते तो घुस सकते हैं पर हिन्दुस्तानी नहीं. बंबई क्लब इनसे भी ज्यादा कट्टर था. आजादी के बाद जब सरकार ने उसपर दवाब डाला कि हिंदुस्तानियों को भी मेम्बर बनाए तो 1958 में क्लब ही बंद कर दिया गया!


डिस्कवरी ऑफ इंडिया में जवाहरलाल नेहरू ने भी बंगाल क्लब के नस्लभेद का जिक्र किया है. दो सौ साल पुराना बंगाल क्लब शुरू से ही एक नकचढ़ा क्लब रहा है. ईस्ट इंडिया कंपनी के आला अफसरों ने 1827 में जब इसकी स्थापना की तो शुरू में गोरे व्यापारियों को भी मेम्बर नहीं बनाया जाता था. अंग्रेज सामंत और अन्य कुलीन लोग तब तिजारत करने वालों को हिकारत से बॉक्सवाला कहते थे – बक्से के साथ फेरी लगाकर समान बेचने वाला.


हिंदुस्तानियों को तो छोड़िए, अंग्रेज औरतें भी बंगाल क्लब की मेम्बर नहीं बन सकती थीं. आजादी के 12 साल बाद 1959 में बंगाल क्लब ने पहली बार हिंदुस्तानियों के लिए मेंबरशिप खोली. औरतों के साथ यह भेदभाव तो 1988 तक जारी रहा! क्लब के कायदे कानून 21वी सदी में भी उतने ही नकचढ़े रहे.


मैं लगभग एक दशक तक स्टेट्समेन के रुरल रिपोर्टिंग अवॉर्ड के जूरी का सदस्य था. स्टेट्समेन भारत का शायद एकलौता अखबार था जिसकी मिल्कियत आजादी के बाद भी अंग्रेजों के हाथ में थी. यहाँ तक कि 1960 के दशक तक वहाँ अंग्रेज संपादक ही होते थे. 15-20 साल पहले एक दफा स्टेट्समेन ने मेरे रहने का इंतजाम बंगाल क्लब में किया. कमरे में घुसते के साथ एक नोटिस रखा मिला. उसमें उन पोशाकों की लिस्ट थी जो क्लब में बैन थी:

• बिना कालर के शर्ट या बनियान.

• धोती-कुर्ता के बिना चप्पल या सेंडल. रबर की चप्पल/ सेंडल तो किसी भी सूरत में नहीं.

• धोती या चूड़ीदार के बिना कुर्ता. ढीला या अलीगढ़ी पायजामा किसी भी सूरत में नहीं.

• संडे और छुट्टियों के दिन के अलावा जीन्स. 5 बजे शाम के बाद तो जीन्स किसी भी दिन नहीं.

• बैन: क्लब में कहीं भी जूते उतार कर खाली पाँव बैठने पर.


शायद यह महज इत्तिफ़ाक नहीं है कि 200 साल पुराना यह यह क्लब जिस विक्टोरियन इमारत में है उसमें कभी लॉर्ड मैकाले रहा करते थे. क्लब की दीवारों पर टंगे अंग्रेज हुक्मरानों के 100-150 साल पुराने पोर्ट्रेट, लंदन, विएना और जर्मनी में बनी दीवाल घड़ियाँ और ऐन्टीक फर्नीचर आपको किसी अजायबघर में दाखिल होने की अनुभूति कराते हैं.


history of indian club


आजादी के 75 साल बाद भी हमारे क्लब अभी अंग्रेजी राज के साए से नहीं निकले हैं. 1988 में पेंटर एमएफ हुसैन को मुंबई के वेलिंगडन क्लब में इसलिए नहीं घुसने दिया गया कि वे नंगे पाँव चलते थे. इसके कई दशक बाद बंबई हाई कोर्ट के एक जज को, जो बाद में सुप्रीम कोर्ट के भी जज बने, इसी क्लब के डाइनिंग हाल में इसलिए नहीं घुसने दिया गया क्योंकि वे कोट नहीं पहने थे. पार्टी में शामिल एक वकील ने उनके लिए कहीं से कोट का इंतजाम किया. दिल्ली जिमखाना में औरतें चप्पल पहन कर नहीं घुस सकती हैं. उन्हे वहाँ रखी सेंडल पहननी पड़ती है.


कम्युनिस्ट नेता ज्योति बसु कलकाता स्विमिंग क्लब (निर्माण: 1887) में इसलिए नहीं घुस पाए कि वे धोती पहने थे. इंफ़ोसिस के एन आर नारायण मूर्ति को बैंगलोर क्लब से इसलिए बाहर निकाल दिया गया था कि दिवाली के दिन वे कुर्ता-पायजामा पहन कर आ गए थे. मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस डी हरीपारन्थमन को तामिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन ने अपने क्लब में घुसने नहीं दिया क्योंकि वे पारंपरिक तमिल मुंडू पहन कर क्लब आ गए थे. नाराज मुख्यमंत्री जयललिता ने इसका तोड़ निकाला: सरकार ने एक कानून बना कर क्लब का ड्रेस कोड ही बैन कर दिया!

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
एनके सिंह

एनके सिंहवरिष्ठ पत्रकार

चार दशक से पत्रकारिता जगत में सक्रिय. इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक भास्कर में संपादक रहे. समसामयिक विषयों के साथ-साथ देश के सामाजिक ताने-बाने पर लगातार लिखते रहे हैं.

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First published: August 9, 2022, 10:02 am IST