भारत की खोज: कैसे बना रतन मटका किंग, 4,200 करोड़ का कारोबार

सट्टा इस देश में 1867 से ही गैरकानूनी है। ज्यादातर मटकेवाले कारोबारी लोग थे। अपने गैरकानूनी काम के लिए उन्हे मुंबई के माफिया गैंगों का प्रोटेक्शन लगता था। मुंबई के अन्डरवर्ल्ड को पत्रकार जे. डे बड़ी बारीकी से समझते थे।

Source: News18Hindi Last updated on: October 4, 2022, 5:39 pm IST
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भारत की खोज: कैसे बना रतन मटका किंग, 4,200 करोड़ का कारोबार
60 के दशक में रतन मटके की साख जमी.

सट्टे के कारोबार का सालाना टर्नओवर आज से 30 साल पहले 4,200 करोड़ रुपए था. मटका किंग कहलाने वाला रतन खत्री नई जमीन तोड़ने में यकीन रखता था. मटके से पर्ची निकालने का सिस्टम खत्म कर वह ताश के पत्तों से सट्टे का नंबर निकालने लगा.


उसके सट्टे को फिल्म समीक्षक स्व. जयप्रकाश चौकसे ने आसान भाषा में समझाया है: “ खेल के नए तरीके में ताश की गड्‌डी से गुलाम, बेगम, बादशाह के चित्र वाले पत्ते हटा दिए जाते थे, केवल इक्के से दस्से तक ताश की गड्‌डी को कई बार शफल करने के बाद एक पत्ता निकाला जाता था, दोबारा शफल करके दूसरा पत्ता और तीनों बार शफल किए पत्तों के जोड़ से विजयी अंक बनता था.“


सट्टेबाज मानते थे खत्री अपने गैरकानूनी कारोबार को ईमानदारी से चलाता था. वह इस बात को समझ गया था कि न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज के भाव पर आधारित पहले के सट्टे इसलिए ज्यादा नहीं चल पाए कि उनमें पारदर्शिता नहीं थी. अक्सर बेईमानी की शिकायतें आती रहती थीं.


सो, सबसे पहले उसने जुआरियों का भरोसा जीता. मटके का नंबर वह खुद नहीं निकालता था. यह काम वहाँ मौजूद पब्लिक से ही कराया जाता था. हर दफा ताश की नई गड्डी इस्तेमाल की जाती थी. चुने गए पत्तों में खत्री नाखून से खरोंच मार देता था ताकि बाद में कोई हेराफेरी नहीं कर सके.


चवन्नी की भी बाजी

इस तरह 60 के दशक में रतन मटके की साख जमी. नशा भी सस्ता था – कोई चवन्नी की बाजी भी लगा सकता था, और उसपर ढाई रुपए तक कमा सकता था. कारोबार के फलने-फूलने सबसे बड़ी वजह मटके का नेटवर्क था, जो रियल टाइम में देश के कोने-कोने में लगभग एक साथ खुलता था. और यह गैरकानूनी धंधा सरकार के टेलीफोन महकमे की मदद से चल रहा था!


रतन एक सिन्धी रिफ़्यूजी था. बंटवारे के बाद परिवार सिंध से मुंबई आया तो वह 15 साल का था. काम-धंधे की तलाश में उसका संपर्क एक कच्छी, कल्याण भगत, से हुआ, जो कपास का सट्टा चलाता था. न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज के भाव पर खुलने वाला यह सट्टा सप्ताह में केवल पाँच दिन होता था.


कल्याण ने इस गैप को पाटने के लिए 1962 में वर्ली मटका चालू किया. एक मटके में पर्चियाँ डालकर लकी नंबर निकाला जाता था. रतन खत्री उसका मैनेजर था. उस्ताद से अलग होकर 2 मई 1964 को उसने रतन मटका चालू किया और जल्दी ही सबको पीछे छोड़ दिया.


1975 में जब इमरजेंसी लगी तो खत्री भी जेल पहुँच गया और 19 महीने अंदर रहा. बाहर निकालने के बाद उसने अपना कारोबार दोबारा जमाया और 90 की दशक के शुरुआत तक मटका किंग बना रहा. कई दफा अंदर गया पर उसका धंधा फलता-फूलता रहा.


माफिया और मटका

सट्टा इस देश में 1867 से ही गैरकानूनी है. ज्यादातर मटकेवाले कारोबारी लोग थे. अपने गैरकानूनी काम के लिए उन्हे मुंबई के माफिया गैंगों का प्रोटेक्शन लगता था. मुंबई के अन्डरवर्ल्ड को पत्रकार जे. डे बड़ी बारीकी से समझते थे. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘खल्लास’ में लिखा है कि 1970 के दशक के अंत तक माफिया की आमदनी का मुख्य श्रोत मटका हुआ करता था.


धंधे में इतनी कमाई देखकर माफिया गैंगों ने आगे चलकर कल्याण और खत्री सरीखे कारोबारियों को खदेड़ कर सट्टे के पूरे नेटवर्क पर कब्जा जमा लिया. 1990 के दशक में दगड़ी चाल गैंग के डॉन दिलीप कुलकर्णी ने खत्री को इतना धमकाया कि जान के डर की वजह से उसने सन्यास ले लिया.


जो काम पुलिस 25 साल में नहीं कर पाई उसे माफिया ने चुटकी बजाते कर दिया. उसका कारोबार कल्याणजी के बेटे वसंत शाह ने ले लिया. थोड़े ही दिनों के बाद दगड़ी चाल गैंग ने उसे दिन-दहाड़े ‘खल्लास’ कर दिया. इस सनसनीखेज मर्डर के बाद बंबई के सट्टे के पूरा कारोबार माफिया के हाथ में चला गया.


सादा कुर्ता-पायजामा पहनने वाला खत्री रंगीन मिजाज आदमी था. फिल्मों का और फिल्म बनाने वालों से दोस्ती गाँठने का उसे नशा था. 1975 में बनी बॉलीवुड फिल्म धर्मात्मा में प्रेमनाथ के चरित्र पर मटका किंग के जीवन की झलक है. इसका स्क्रिप्ट लिखने में खत्री ने काफी मदद की थी. बाद में उसने खुद रंगीला रतन बनाई, जिसमें ऋषि कपूर और परवीन बाबी थे.


2020 में 88 साल की उम्र में रतन खत्री की मृत्यु हो गई. अपने अंतिम दिनों में उसका एक ही काम था – रेस के सीजन में मुंबई रेसकोर्स के चक्कर काटना और घोड़ों पर दाव लगाना. चोर चोरी से जा सकता है, हेराफेरी से नहीं.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
एनके सिंह

एनके सिंहवरिष्ठ पत्रकार

चार दशक से पत्रकारिता जगत में सक्रिय. इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक भास्कर में संपादक रहे. समसामयिक विषयों के साथ-साथ देश के सामाजिक ताने-बाने पर लगातार लिखते रहे हैं.

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First published: October 4, 2022, 5:39 pm IST