नक्षत्र मालाकार: आजादी की लड़ाई का एक विस्मृत योद्धा

रेणु ने नक्षत्र मालाकार को चलित्तर कर्मकार बनाकर अमर कर दिया. उनके रॉबिनहुड और सुल्ताना डाकू वाले चरित्र ने कई लेखकों को सम्मोहित किया. उनके ही गाँव के अनुपलाल मण्डल ने उनपर एक पूरा उपन्यास ही लिख डाला – तूफान और तिनके.

Source: News18Hindi Last updated on: August 15, 2022, 9:11 am IST
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नक्षत्र मालाकार: आजादी की लड़ाई का एक विस्मृत योद्धा
नक्षत्र मालाकार का मतलब है – जन-जीवन की एक जबरदस्त छटपटाहट.

चलित्तर को कौन नहीं जानता! बिहार सरकार की ओर से पंद्रह हजार का इनाम ऐलान किया गया है. हर स्टेशन के मुसाफिरखाने में उसकी एक बड़ी सी तस्वीर लटका दी गई है. पुलिस, सीआईडी और मिलिटरी का एक स्पेशल जत्था उसे गिरफ्तार करने के लिए साल भर से जिले के कोने-कोने में घूम रहा है. नए एसपी साहब ने प्रतिज्ञा की है, या तो चलित्तर को गिरफ्तार करेंगे अथवा नौकरी छोड़ देंगे. … घर-घर में चलित्तर की कहानियाँ होती हैं. नेताजी के सिंगापुर आने के समय गाँव-घर, घाट-बाट, नाच-तमाशा में लोग जैसी चर्चा करते थे, वैसी ही चर्चा चलित्तर की भी होती है. … कटहा के बड़े दारोगा से थाने पर जाकर, भेंट करके, बातचीत करके, पान खाकर और नमस्ते करके जब उठा तो हँसकर कहा, हम ही चलित्तर कर्मकार हैं. दारोगा साहब को दांती लग गई. … कलक्टर साहेब दार्जिलिंग रोड से कहीं जा रहे थे, डँगरा घाट की नाव बह गई थी. कलक्टर साहेब लौटे आ रहे थे कि एक आदमी ने आकर सलाम किया और कहा कि “चलिए, उस पार पहुंचा देते हैं.“ कलक्टर साहेब तो मोटर में बैठे ही रहे, उस आदमी ने मोटर सहित कलक्टर साहेब को नदी तैरकर पार करा दिया. सिरिफ मोटर का एक पहिया एक हाथ से पकड़ा रहा. उस पार जाकर कलक्टर साहब ने खुश होकर नाम-गाम पूछा तो बताया – चलित्तर कर्मकार. कलक्टर साहेब के हाथ से कलम छूटकर गिर गई.

मैला आँचल (1954)


फणीश्वर नाथ रेणु ने नक्षत्र मालाकार को चलित्तर कर्मकार बनाकर अमर कर दिया. वैसे, आजादी की लड़ाई के इस अनोखे योद्धा के बारे में वे नहीं लिखते तो भी सीमांचल में नक्षत्र मालाकार किसी परिचय के मोहताज नहीं थे. वे उन लोगों में से थे जो अपने जीवनकाल में ही किवदंती बन जाते हैं. ’40 और ’50 के दशक में इलाके में उनके नाम का डंका बजता था. जमींदारों को उसके नाम से रात-रात भर नींद नहीं आती थी. पुलिस वाले थाने के अंदर सहमे बैठे रहते थे. पता नहीं नछत्तरा — मातबर लोग उन्हे इसी नाम से बुलाते थे -– कब, कहाँ से आ जाए.


bharat ki khoj


सिनेमा घरों में उनके फ़ोटो के साथ इनामी इश्तेहार दिखाए जाते थे. बिहार मिलिटरी पुलिस की एक बटालियन और बलूच सिपाहियों का एक दस्ता उन्हे पकड़ने कटिहार लाया गया. लोग मार खा लेते, लेकिन नछत्तर का पता नहीं बताते. जेल में हर रात उनकी सेल बदल दी जाती थी. बक्सर जेल में उनके साथ बंद कम्युनिस्ट नेता अली अमजद ने अपनी आत्मकथा में लिखा, जेलर डरते थे कि मालाकार सीखचे काट कर फरार हो जाएगा!


वे न केवल गोदाम लुटवा कर अनाज गरीबों में बँटवा देते थे बल्कि सरकार के खबरी का काम करने वालों के नाक-कान काट लेते थे. कोई अगर अपना नाक-कान गमछा से ढँक कर घूमता तो लोग समझ जाते थे कि हो न हो, ये आदमी नछत्तर के हत्थे चढ़ा होगा. 1970 में दिनमान में रघुवीर सहाय को दिए एक इंटरव्यू में रेणु ने कहा: “अभी भी 2-3 दर्जन लोग बिना नाक-कान वाले हैं.“


कटिहार के एक गरीब माली परिवार में 1905 में जन्मे नछत्तर का खून थोड़ा ज्यादा ही गरम था. नमक सत्याग्रह, विदेशी कपड़ों की होली और शराब दुकानों की पिकेटिंग से शुरू उनका राजनीतिक सफर कांग्रेस से होते हुए सोशलिस्ट पार्टी की तरफ मुड़ा और सीपीएम पर खत्म हुआ. 1936 में वे सोशलिस्ट पार्टी में भर्ती हुए तो जेपी ने प्यार से नाम बदल दिया — नछत्तर माली नहीं, नक्षत्र मालाकार कहो.


1942 के आंदोलन में नक्षत्र को मन-माफिक काम मिल गया. रेणु के मुताबिक: “वह ढूंढ-ढूंढकर बम बनाने वालों को, राइफलें बनाने वालों को जुटाता था.“ कटिहार में रूपौली थाने को क्रांतिकारियों ने उड़ा दिया. 6 लोगों मरे. नक्षत्र समेत 36 लोग नामजद हुए. आजादी के पहले पचासों मुकदमे चले, नौ बार गिरफ्तार हुए, पर कभी सजा नहीं हुई. गवाह नहीं मिलते थे. कौन नकटा बने!


उनके रॉबिनहुड और सुल्ताना डाकू वाले चरित्र ने कई लेखकों को सम्मोहित किया. उनके ही गाँव के अनुपलाल मण्डल ने उनपर एक पूरा उपन्यास ही लिख डाला – तूफान और तिनके. रेणु तो उनके साथी ही थे – 1941-42 से 1947 तक आजादी की लड़ाई में दोनों साथ थे. 1971 में सारिका में छपे एक इंटरव्यू में रेणु ने बताया: “जब-जब राजनीतिक लोगों ने ‘राजनीतिक’ मानने से इनकार किया और उनको विशुद्ध क्रिमिनल करार देने की साजिश की – हम कई लोगों ने विरोध किया. … नक्षत्र मालाकार का मतलब है – जन-जीवन की एक जबरदस्त छटपटाहट.“


अनाज लूटने की शुरुआत मालाकार ने 1947 के अकाल में की. बड़े किसानों और व्यापारियों ने बखारों में अनाज दबा लिया था. बकौल रेणु: “हम लोग प्रस्ताव पास करते थे लेकिन कुछ करते नहीं थे. लेकिन वह आदमी बैठने वाला नहीं था. उसने बखार खुलवा कर अनाज बँटवाना शुरू कर दिया.“ सन 47 के बाद भी जब वे उसी तर्ज पर काम करते रहे, तो सोशलिस्ट पार्टी वाले भी डरने लगे और उन्हे निकाल दिया. उसके बाद एक केस में नछत्तर को आजन्म कारावास की सजा हुई. 14 साल बाद वे जेल से निकले और अपनी झोपड़ी में 1987 में अंतिम सांस ली.


इस “जबरदस्त छटपटाहट” को रेणु ने मैला आँचल में क्या खूब उकेरा है: किराँती चलित्तर कर्मकार! … मोमेंट के समय गोरा मलेटरी उनके नाम को सुनते ही पेसाब करने लगता था. बम-पिस्तौल और बंदूक चलाने में मशहूर! मोमेंट के समय जितने सरकारी गवाह बने थे, सबों के नाक-कान काट लिए थे चलित्तर ने. बहादुर है. कभी पकड़ाया नहीं. कितने सीआईडी को जान से खतम किया. धरमपुर के बड़े-बड़े लोग इसके नाम से थर-थर कांपते थे. ज्यों ही चलित्तर का घोडा दरवाजे पर पहुंचा कि कि ‘सीसी सटक’. दीजिए चन्दा. …. पचास! नहीं, पाँच सौ से कम एक पैसा नहीं लेंगे. चाबी लाइये तिजोरी की. नहीं? …. ठाँय, ठाँय! ….. दस खूनी केस उसके ऊपर था, लेकिन कभी पकड़ा नहीं गया.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
एनके सिंह

एनके सिंहवरिष्ठ पत्रकार

चार दशक से पत्रकारिता जगत में सक्रिय. इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक भास्कर में संपादक रहे. समसामयिक विषयों के साथ-साथ देश के सामाजिक ताने-बाने पर लगातार लिखते रहे हैं.

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First published: August 15, 2022, 9:11 am IST