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    किसान ही राज्य सरकारें भी फसल बीमा कंपनियों के दुष्चक्र दुखी, अब PMFBY से बाहर होने की तैयारी!

    पीएम फसल बीमा योजना को 7 राज्यों ने किया रिजेक्ट, अब मध्य प्रदेश भी तैयारी में, प्रीमियम से कम ही मिलता है मुआवजा, साथ में सियासी नुकसान भी. पढ़िए किसानों और राज्यों की परेशानी.

    Source: News18Hindi Last updated on: October 3, 2020, 9:28 AM IST
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    किसान ही राज्य सरकारें भी फसल बीमा कंपनियों के दुष्चक्र दुखी, अब PMFBY से बाहर होने की तैयारी!
    फसल बीमा योजना का किसे मिल रहा फायदा?
    नई दिल्ली. किसानों की भलाई के नाम पर शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY- Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) की असली फसल इंश्योरेंस कंपनियां काट रही हैं. वो लगातार प्रॉफिट में हैं और किसानों को पैसा जमा करने के बाद भी क्लेम के लिए भटकना पड़ रहा है. कई राज्यों को इन कंपनियों की चालबाजी साफ दिखने लगी है इसलिए वो इससे बाहर निकलने को बेताब हैं. कृषि मंत्रालय की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक कुछ राज्यों ने इस योजना से बाहर होने को चुना है. बिहार, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश में (रबी 2019-20) योजना का कार्यान्वयन नहीं किया गया. इसकी बड़ी वजह ये है कि कंपनियों से फसल बीमा करवाना घाटे का सौदा बनता जा रहा है. राज्यों का कहना है कि वो क्यों न खुद ही मुआवजा बांटें. पंजाब ने तो इस योजना को पहले ही रिजेक्ट कर दिया था.

    इस साल गुजरात, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश सरकार ने अब तक फसल बीमा योजना में अपना शेयर यानी प्रीमियम सब्सिडी नहीं दी है. बीजेपी शासित राज्य मध्य प्रदेश की सरकार भी इस योजना से बाहर निकलना चाहती है. वो राज्य का खजाना बचाने और किसानों का असंतोष कम करने के लिए फसल खराब होने पर खुद ही मुआवजा देना चाहती है. पीएम फसल बीमा योजना से सीएम शिवराज सिंह चौहान परेशान हैं. मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत करते हुए उन्होंने अपना यह दर्द साझा किया.

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    फसल बीमा योजना को क्यों छोड़ रहे हैं राज्य?


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    बीमा कंपनियों पर शिवराज सिंह चौहान का दर्द

    शिवराज सिंह ने किसानों से कहा, बीमा कंपनी खेल खेलती रहती है. खुद सोचिए कि क्या कोई कंपनी घाटे में बीमा करेगी? अगर वो प्रीमियम लेंगे 4000 करोड़ तो देंगे 3000 करोड़. इसलिए अब हम खुद मुआवजा देंगे. दो लेगेंगे तो दो और 10 लगेंगे तो 10 देंगे. काहे की कंपनी. आधी रकम नुकसान पर तुरंत दे देंगे और आधी नुकसान का आकलन करने के बाद. प्रधानमंत्री से मिलकर इसकी अनुमति लूंगा.

    वाईएसआर कांग्रेस भी परेशानबीमा कंपनियों के रवैये और भारी भरकम प्रीमियम से वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के शासन वाले आंध्र प्रदेश के लोग भी परेशान हैं. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सांसद वी. विजय साई रेड्डी का कहना है कि कभी-कभी फसल बीमा योजना में राज्य का हिस्सा उनके पूरे कृषि बजट का 50 फीसदी होता है.

    राज्यों को लग रहा है कि बीमा कंपनियां प्रीमियम का पैसा बहुत अधिक पा रही हैं और क्लेम नहीं दे रही हैं. ऐसे में राज्य का न सिर्फ आर्थिक नुकसान होता है बल्कि जब किसानों को क्लेम लेने में दिक्कत होती है तो वो उसका ठीकरा सरकार पर फोड़ते हैं. इससे सियासी नुकसान होने की संभावना बढ़ जाती है. कृषि प्रधान इन दो राज्यों के इस दर्द से बीमा कंपनियों की बदमाशी समझी जा सकती है.

    कितने फायदे में हैं बीमा कंपनियां?

    केंद्रीय कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) की रिपोर्ट बता रही है कि फसल बीमा का सबसे ज्यादा लाभ तो इंश्योरेंस कंपनियों को मिल रहा है. पिछले तीन साल में (2016-17 से 2018-19 तक) किसानों को इस स्कीम के तहत फसल खराब होने पर करीब 60 हजार करोड़ रुपये मिले हैं, जबकि इंश्योरेंस कंपनियों को प्रीमियम से 76 हजार करोड़ रुपये हासिल हुए. 16 हजार करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ. जबकि कंपनियों का कुछ खास खर्च नहीं हुआ. किसी बीमा कंपनी का जिले में ऑफिस तक नहीं है न तो उनके बीमा एजेंट हैं. बस फोन पर बात होगी. इसलिए कंपनी को फायदा ही फायदा है.

    कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि बीमा कंपनियों (Insurance companies)  द्वारा कुल प्रीमियम के रूप में प्राप्त हर 100 रुपये में से किसानों को 88.7 रुपये का ही भुगतान किया गया है. मतलब साफ है कि कंपनी करीब 11.3 फीसदी फायदे में रही. ऐसे में राज्यों की सोच अच्छी है कि क्यों न खुद मुआवजा बांटा जाए. बीमा कंपनियों का आखिर क्या काम है? जो पैसा कंपनियों के अकाउंट में जा रहा है वो क्यों न किसानों को मिले.

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    इंश्योरेंस कंपनियों को कितना फायदा?


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    हजारों करोड़ के दावे बाकी, देने में आनाकानी

    किसान नेताओं का कहना है कि बीमा कंपनियां किसानों (Farmers) को मुआवजे के लिए भटकाती रहती हैं इसलिए ज्यादातर किसान उनके दुष्चक्र में फंसने से अब बच रहे हैं. कहने को योजना प्राकृतिक आपदा और बीमारी से फसलों की बर्बादी की भरपाई के लिए है, मगर इसमें इतने झोल और पेंच हैं कि इसका लाभ लेने में किसानों के जूते घिस जाते हैं. इसीलिए इस पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं.

    साल 2019 में अलग-अलग कारणों से 12 राज्यों में किसानों के 7,337.2 करोड़,  जबकि 2019-20 में 13 राज्यों में किसानों के 2,074 करोड़ रुपये के दावे बाकी हैं. बीमा कंपनियां किसानों को दौड़ा रही हैं और सरकार की इमेज पर बट्टा लग रहा है.

    किसानों के नाम पर कंपनियों की मौज

    >>पीएम फसल बीमा योजना में सार्वजनिक क्षेत्र की 5 और निजी क्षेत्र की 13 कंपनियां पैनल पर हैं. लेकिन सभी कंपनियां हर राज्य और हर मौसम के लिए बोली प्रक्रिया में भाग नहीं लेतीं. वो पहले अपना फायदा देखती हैं. जो ज्यादा जोखिम वाला क्षेत्र है उनमें बीमा नहीं करतीं. स्कीम के कार्यान्वयन के लिए बीमा कंपनियों का चयन संबंधित राज्य सरकारों द्वारा बोली प्रक्रिया के जरिए किया जाता है.

    >>राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य बिनोद आनंद का कहना है कि जितना पैसा सरकार इन्हें प्रीमियम के रूप में देती है उतना आपदा आने पर किसानों को खुद ही दे दे तो बेहतर होगा. इंश्योरेंस कंपनी व किसान के बीच राज्य सरकार (राजस्व विभाग) है. जबकि बीमा केंद्रीय विषय है. किसान की फसल खराब होने के बाद पहले तहसीलदार और उसके मातहत कर्मचारी ही रिपोर्ट बनाते हैं. तो फिर फायदा निजी कंपनी को क्यों मिले. सरकार ही खुद मुआवजा दे.

    किसका कितना प्रीमियम

    पीएम फसल बीमा योजना (PMFBY) में प्रीमियम के तीन पार्ट किसान, केंद्र और राज्य होते हैं. किसानों को खरीफ फसलों के लिए कुल प्रीमियम का अधिकतम 2 फीसदी, रबी की खाद्य एवं तिलहन फसलों के लिए 1.5 फीसदी एवं कॅमर्शियल व बागवानी फसलों के लिए 5 फीसदी भुगतान करना होता है. प्रीमियम की शेष रकम ‘प्रीमियम सब्सिडी’ के रूप में केंद्र और राज्य सरकार मिलकर देती हैं. मैदानी राज्यों में यह हिस्सा 50-50 फीसदी का होता है. पूर्वोत्तर राज्यों में प्रीमियम सब्सिडी का 90 फीसदी हिस्सा केंद्र और 10 फीसदी स्टेट को देना होता है.

    कम होता बीमित फसल का रकबा

    >>इस योजना में बीमा कंपनियों की मनमानी की वजह से किसानों का इससे मोहभंग हो रहा है. इसकी तस्दीक साल दर साल घटते बीमित क्षेत्र के आंकड़े कर रहे हैं.

    >>साल 2016-17 में देश का कुल बीमित क्षेत्र 577.234 लाख हेक्‍टेयर था जो साल 2017-18 घटकर सिर्फ 515.438 लाख हेक्‍टेयर रह गया.

    >>यह सिलसिला 2018-19 में भी जारी रहा. अब यह घटकर महज 507.987 लाख हेक्‍टेयर ही रह गया.

    >>पिछले तीन साल में ही 69 लाख हेक्टेयर से अधिक बीमित क्षेत्र घट गया है. ये आंकड़ा केंद्रीय कृषि मंत्रालय का ही है.

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    किसानों के लिए आसान नहीं है खराब फसल का मुआवजा लेना (File Photo)


    दबाव में आकर स्वैच्छिक की गई स्कीम फिर भी...

    किसानों के दबाव में आकर मोदी कैबिनेट ने 19 फरवरी 2020 को PM-फसल बीमा योजना में बड़ा बदलाव करते हुए इसे किसानों के लिए स्वैच्छिक कर दिया था. जबकि पहले किसान क्रेडिट कार्ड लेने वाले करीब सात करोड़ किसानों को मजबूरन इसका हिस्सा बनना पड़ता था. इस वक्त करीब 58 फीसदी किसान ऋण लेने वाले हैं. लेकिन ताज्जुब ये है कि स्वैच्छिक करने के बाद भी केंद्र सरकार बीमा कंपनियों के लिए बैटिंग कर रही है.
    ब्लॉगर के बारे में
    ओम प्रकाश

    ओम प्रकाश

    लगभग दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. इस समय नेटवर्क-18 में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. खेती-किसानी और राजनीतिक खबरों पर पकड़ है. दैनिक भास्कर से कॅरियर की शुरुआत. अमर उजाला में फरीदाबाद और गुरुग्राम के ब्यूरो चीफ का पद संभाल चुके हैं.

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    First published: September 29, 2020, 10:36 AM IST
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