चपरासी से भी कम है किसानों की औसत आय, ये है अर्थव्यवस्था को संभाले रखने वालों का सच

देश के 38 फीसदी सांसद खुद को बताते हैं किसान फिर भी कई राज्यों में नहीं मिल रहा है मोदी सरकार द्वारा घोषित दाम, आखिर अन्नदाताओं को कब मिलेगा उचित दाम पाने का कानूनी अधिकार?

Source: News18Hindi Last updated on: September 7, 2020, 5:43 PM IST
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चपरासी से भी कम है किसानों की औसत आय, ये है अर्थव्यवस्था को संभाले रखने वालों का सच
किसानों की कमाई का सच...
नई दिल्ली. अप्रैल-जून की तिमाही में भारत की जीडीपी (GDP) ग्रोथ माइनस 23.9 फीसदी दर्ज की गई है. इतने बुरे दौर में अर्थव्यवस्था को कृषि का थोड़ा सहारा मिला है. अकेले इसी सेक्टर की ग्रोथ 3.4 फीसदी यानी पॉजिटिव रही है. इसके बावजूद खेती-किसानी की अनदेखी जारी है. किसानों के सामने हजार कई चुनौतियां सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी हैं. आजादी के इतने साल बाद भी खेती-किसानी की इतनी ही तरक्की हुई है कि हमारे किसानों की अधिकतम औसत आय (Farmers Income) चपरासी से भी कम ही है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस सेक्टर पर ध्यान नहीं दिया गया तो हालात और खराब हो सकते हैं.

भारत की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है लेकिन सभी राजनीतिक दलों का खेती के विकास और किसानों के कल्याण के प्रति रवैया ढुलमुल ही रहा है. किसानों की खुशहाली की बात सभी करते हैं, उनके लिए योजनाएं भी बनाते हैं लेकिन, खेती की मूलभूत समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है. वर्षों से किसानों के सामने चार महत्वपूर्ण समस्याएं हैं. जिनका हल अब तक कोई नहीं निकाल पाया.

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ये है भारत के किसानों की आय


इन चार समस्याओं का समाधान कब होगा?
पहला, उनकी फसल का वाजिब दाम नहीं मिल रहा है. दूसरा, फसल लागत में कमी नहीं आ रही. तीसरा, उनके ऊपर कर्ज का भारी दबाव है. चौथा, उपज भंडारण की सुविधा नहीं है. यही समस्याएं आज भी कायम है. मौसम की मार झेलकर जब अन्नदाता फसल पैदा कर लेता है तो सरकार उसे उचित दाम नहीं दिला पाती.

नतीजा, कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां किसान फसल खराब होने और कर्ज के बोझ तले दबकर जान न दे रहा हो. उसके आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं. क्योंकि आज भी देश में किसानों की सबसे ज्यादा औसत आय सिर्फ 18,059 रुपये है. जबकि सरकारी चपरासियों को भी 25 हजार से कम वेतन नहीं मिलता.

पीएम किसान स्कीम की रकम बढ़ाने की जरूरत2016 के इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार देश के 17 राज्यों में किसानों की सालाना आय सिर्फ 20 हजार रुपये है. इनकी आय बढ़ानी है तो सीधे दी जाने वाली सहायता की रकम को बढ़ाना होगा. कई विशेषज्ञों का कहना है कि पीएम किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं में अगर पैसा बढ़ा दिया जाए तो हालात सुधर सकते हैं. 2022 तक अन्नदाताओं की आय दोगुनी करने का सपना दिखाया तो गया है लेकिन अब तक आय कितनी बढ़ी है इस बारे में सरकार कुछ नहीं बता रही.

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किसानों को नगद दी जाने वाली राशि बढ़ाने की हो रही मांग

किसानों की सहायता के लिए  विशेषज्ञों के सुझाव 


राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य विनोद आनंद और किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंह ने किसानों को सालाना 24 हजार रुपये देने की मांग की है. पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री एवं राष्ट्रीय किसान आयोग के प्रथम अध्यक्ष रहे सोमपाल शास्त्री ने लघु एवं सीमांत किसानों को 20 हजार रूपये एकड़ रुपये नगद देने का सुझाव दिया है. जबकि कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन (MS Swaminathan) की अगुवाई वाले स्वामीनाथन फाउंडेशन ने पीएम किसान योजना के तहत दी जाने वाली रकम को 6000 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये सालाना करने का सुझाव दिया है.


फिर भी नहीं उठता किसानों का सवाल
जनता ने 17वीं लोकसभा के लिए जिन नेताओं को अपना सांसद चुना है उनमें से करीब 38 फीसदी ने खुद को किसान बताया है. इसके बावजूद संसद में मजबूती से किसानों के सवाल नहीं उठते. सवाल उठते तो किसानों की दुर्दशा नहीं होती. कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा के मुताबिक आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 से 2016-17 के बीच यानी 16 साल में भारत के किसानों को उनकी फसलों का उचित दाम न मिलने के कारण करीब 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.

इस नुकसान की भरपाई के लिए न तो कोई सरकार कभी आगे आई और न ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस पर चिंता जाहिर की. आरबीआई की चिंता तभी बढ़ती है जब किसान का कोई लोन माफ हो.

MRP की बात छोड़िए, MSP का भी अधिकार नहीं
सारी दुनिया अपना प्रोडक्ट मैक्सिमम रिटेल प्राइज (MRP) पर बेचती है लेकिन किसानों की फसल का मिनिमम सपोर्ट पाइस (MSP) तय होता है. हालांकि उसका भी कानूनी अधिकार नहीं है. मतलब उद्योग जगत अपने उत्पाद का अधिकतम रेट लेता है और किसान न्यूनतम. आज भी किसान एमएसपी को अपना लीगल राइट बनाने की मांग कर रहे हैं, ताकि उन्हें उनकी उपज का सही दाम मिले. लेकिन सरकार इस पर राजी नहीं दिखती. अर्थव्यवस्था के सबसे मजबूत स्तंभ का यही सच है.

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किसानों के लिए कर्ज बन रहा मर्ज और ले रहा जान


किसानों पर कर्ज का मर्ज
आज भारत के हर किसान परिवार पर औसतन 47,000 रुपये का कर्ज लदा हुआ है. तकरीबन 68 प्रतिशत किसान-परिवारों की आमदनी नकारात्मक है. करीब 80 फीसदी किसान बैंक लोन न चुका पाने की वजह से आत्‍महत्‍या कर रहे हैं और इस वक्‍त देश में क़रीब 60 फीसदी किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं. लेकिन जमीनी स्‍तर पर उनके लिए काम नहीं दिखता. ऊपर से प्राकृतिक आपदा, कृषि से जुड़े लोगों का भ्रष्टाचार और अब कोराना वायरस की मार.

इस तरह तो आगे नहीं बढ़ेगी खेती-किसानी

>>दाम न मिलने के अलावा दूसरी सबसे बड़ी समस्या फसल खराब होने की है. बाढ़, बारिश, ओलावृष्टि और दूसरे मौसमीय कारणों से सबसे ज्यादा किसान परेशान हो रहे हैं. फसल बीमा में ऐसी स्ट्रक्चरल खराबी है कि उसका लाभ जैसा कागजों में दिखाया जाता है वैसा किसानों तक नहीं पहुंच पाता.

>>भ्रष्टाचार इतना कि बैंकर बिना ‘सुविधा शुल्क’ लिए किसान क्रेडिट कार्ड नहीं देता. 2020 में भी किसानों को या तो यूरिया खाद दिन-दिन भर लाइन में लगकर खरीदनी पड़ रही है या फिर ब्लैक में.

>>कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा के मुताबिक हमारा बैंकिंग सिस्टम एक तरफ जहां अक्सर गरीबों के साथ अमानवीय व्यवहार करता है, जिससे वे जेल जाने या आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं, वहीं अमीरों के साथ नरम व्यवहार करता है और आसानी से उन्हें बैंक को चूना लगाने का मौका दिया जाता है.

>>गन्ना किसानों की लॉबी काफी मजबूत मानी जाती है, लेकिन सिस्टम उन्हें भी पर्ची के खेल में पीस रहा है. गन्ना खेतों में खड़ा रह जाता है और मिलें बंद कर दी जाती हैं. किसानों के नाम पर सरकार मिलों को हजारों करोड़ रुपये की मदद देती है लेकिन उसका लाभ किसान के अकाउंट तक नहीं पहुंचता.

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मध्य प्रदेश में एमएसपी से आधे दाम पर खरीद का ये रहा सबूत


>>इस साल 19 मई को देश की कुछ मंडियों में 59 पैसे लेकर 3.5 रुपये किलो तक के रेट पर प्याज (Onion Price) बिका है. जबकि लागत 9 रुपये किलो आती है. ऐसे में खेती कैसे बढ़ेगी.

>>मोदी सरकार ने मक्के का एमएसपी 1850 रुपये क्विंटल तय किया है. जबकि यह बिहार और मध्य प्रदेश में सिर्फ 1020 से लेकर 1200 रुपये प्रति क्विंटल तक ही खरीदा गया. हालांकि इसकी प्रति क्विंटल लागत 1213 रुपये आती है.

>>मोदी सरकार ने साल 2020-21 के लिए मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum support price) 7,196 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, लेकिन बीजेपी शासित एमपी में किसानों को आधा दाम मिला है.

>>इस साल किसानों के फार्म से अंगूर 10 रुपये किलो बिका है. फूल की खेती बर्बाद हो गई. उन्हें कोई क्षतिपूर्ति नहीं मिली. गाय का दूध पानी से भी कम रेट पर बिक रहा है. ऊपर से दुग्ध उत्पादों के आयात की अनुमति दे दी गई है.

>>मार्च के बाद डीजल के रेट में करीब 18 रुपये की वृद्धि हुई है. इससे पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्यों में लागत 1600 रुपये प्रति एकड़ बढ़ने का अनुमान है. दूसरी ओर धान का सरकारी रेट सिर्फ 53 पैसे प्रति किलो बढ़ा है.

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बिहार में नहीं मिला केंद्र सरकार द्वारा तय किया गया मक्के का रेट


>> देश में इस समय 6,55,959 गांव हैं. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में महज 5,427 कोल्ड स्टोर (Cold Stores in Rural Areas) हैं. अब जरा सोचिए किसानों की फसल क्यों नहीं बर्बाद होगी. उन्हें क्यों नहीं अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर होना पड़ेगा.

उपज का उचित दाम मिले तो कर्ज की नहीं होगी जरूरत

यूनाइटेड नेशन के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) में चीफ टेक्निकल एडवाइजर रह चुके प्रोफेसर व कृषि वैज्ञानिक रामचेत चौधरी कहते हैं कि किसानों की उपज की मार्केट मिल जाए और उन्हें उचित मूल्य मिलने लगे तो उसे कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी. वो खुशहाल हो जाएगा. लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी सरकार ऐसा कर नहीं पाई है. आज भी किसान उचित दाम की ही लड़ाई लड़ रहा है.
ब्लॉगर के बारे में
ओम प्रकाश

ओम प्रकाश

लगभग दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. इस समय नेटवर्क-18 में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. खेती-किसानी और राजनीतिक खबरों पर पकड़ है. दैनिक भास्कर से कॅरियर की शुरुआत. अमर उजाला में फरीदाबाद और गुरुग्राम के ब्यूरो चीफ का पद संभाल चुके हैं.

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First published: September 6, 2020, 8:17 AM IST
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