राम नाम की राजनीति, क्या अब कांग्रेस के ‘हिंदुत्व’ बनाम बीजेपी के ‘हिंदुत्व’ की होगी जंग?

कांग्रेस का धर्मयुद्ध: समय का चक्र एक बार फिर ले रहा कांग्रेस से हिंदुत्व की परीक्षा, पढ़िए राम मंदिर पर कांग्रेस के बदले रुख का राजनीतिक विश्लेषण

Source: News18Hindi Last updated on: August 25, 2020, 12:05 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
राम नाम की राजनीति, क्या अब कांग्रेस के ‘हिंदुत्व’ बनाम बीजेपी के ‘हिंदुत्व’ की होगी जंग?
20 अगस्त को होगी राम जन्मभूमि निर्माण ट्रस्ट की बैठक (प्रतीकात्मक तस्वीर)
नई दिल्ली. अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर निर्माण के लिए हुए भूमि पूजन के बाद मेरे पास हरियाणा कांग्रेस कमेटी के महासचिव ने एक प्रेस नोट भेजा. जिसका शीर्षक था “कांग्रेसियों ने राम मंदिर निर्माण को लेकर मनाया जश्न”. यहीं के एक कांग्रेस विधायक नीरज शर्मा ने इस अवसर पर चंडीगढ़ स्थित एमएलए हॉस्टल ग्राउंड में सुंदर कांड का पाठ किया...कांग्रेस नेताओं द्वारा कमोबेश दूसरे राज्यों में भी राम मंदिर को लेकर प्रतिक्रिया उत्साहजनक ही देखने को मिली.

मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ ने राम मंदिर भूमि पूजन को उत्सव के रूप में मनाया. एमपी कांग्रेस कार्यालय के साथ कमलनाथ का घर भी राममय दिखा. कांग्रेस कार्यालय में जय श्रीराम का नारा लगा. जबकि 4 अगस्त को कमलनाथ ने हनुमान चालीसा का पाठ किया. वो ट्विटर पर भगवा में दिखे और सवाल पूछा कि क्या भारतीय जनता पार्टी ने धर्म का ठेका ले रखा है?

दरअसल, हिंदुत्व के मसले पर कांग्रेस नेताओं की ओर से खुलकर ऐसी प्रतिक्रिया तब आई जब उन्होंने इस मसले पर अपने दो शीर्ष नेताओं राहुल और प्रियंका गांधी का रुख देखा. इन दोनों नेताओं ने अपने 4 और 5 अगस्त के ट्विट में लिखा-‘सरलता, साहस, संयम, त्याग, वचनवद्धता, दीनबंधु राम नाम का सार है. राम सबमें हैं, राम सबके साथ हैं…मर्यादा पुरुषोत्तम राम प्रेम हैं वे कभी घृणा में प्रकट नहीं हो सकते. राम करुणा हैं वे कभी क्रूरता में प्रकट नहीं हो सकते. राम न्याय हैं वे कभी अन्याय में प्रकट नहीं हो सकते.’

hardcore Hindutva vs soft Hindutva, BJP and Congress politics on ram mandir, Ram Janambhoomi in Ayodhya, indian politics after mandir bhumi pujan, Priyanka Gandhi Vadra, Indian National Congress, rahul gandhi, narendra modi, कट्टर हिंदुत्व बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व, राम मंदिर पर बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति, अयोध्या राम जन्मभूमि, मंदिर भूमि पूजन के बाद भारतीय राजनीति, प्रियंका गांधी वाड्रा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी
राम मंदिर शिलान्यास पर मध्य प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में जश्न मनाते पूर्व सीएम कमलनाथ
दरअसल, हिंदुत्व को लेकर कांग्रेस के रुख में यह परिवर्तन यूं ही नहीं हुआ है. सोनिया गांधी ने 2014 के आम चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए सबसे बड़े कारण का खुलासा किया था. मुंबई में एक टीवी कार्यक्रम के दौरान सोनिया ने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी, कांग्रेस को हिंदू विरोधी पार्टी साबित करने में कामयाब रही. उसके कुछ दिन बाद राहुल गांधी को सफाई देनी पड़ी थी कि कांग्रेस सिर्फ मुसलमानों की पार्टी नहीं है.



इन दो सवालों पर घिरती कांग्रेस

पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस की इमेज इस तरह की बनी है कि उसे ‘हिंदू-मुस्लिम’ पर सफाई देनी पड़ रही है. वो इस ‘धर्मयुद्ध’ से बाहर नहीं निकल पा रही है. राहुल गांधी के ‘टेंपल रन’ के बाद भी बीजेपी ने उसे सॉफ्ट हिंदुत्व का ज्यादा फायदा नहीं लेने दिया.

-कांग्रेस को हिंदू विरोधी बताने वाले लोग, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के उस बयान का उदाहरण देते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के स्रोतों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है. सिंह ने यह बयान साल 2006 में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में दिया था. जिसमें सभी राज्यों के सीएम मौजूद थे.

हालांकि इसके दूसरे पक्ष की बात नहीं होती है जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय के तत्कालीन प्रवक्ता संजय बारू ने मनमोहन सिंह के बयान पर सफाई देते हुए कहा था कि वो सभी अल्पसंख्यकों की बात कर रहे थे, केवल मुसलमानों की नहीं.

बीजेपी और दूसरे भगवा संगठन कांग्रेस पर हिंदुत्व को लेकर दूसरा बड़ा हमला रामसेतु मामले पर करते हैं. मनमोहन सिंह की सरकार ने 2007 में रामसेतु और राम के वजूद को नकार दिया था.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हलफनामे में कहा था कि 'राम-सेतु' के ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेष होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं.

उस वक्त एएसआई में स्मारक मामलों को देखने वाले तत्कालीन निदेशक सी. दोरजी ने कहा था कि रामायण एक मिथकीय कथा है, जिसका आधार वाल्मिकी रामायण और रामचरित मानस है. ऐसा कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है जिससे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रुप से इस कथा के प्रामाणिक होने और इस कथा के पात्रों के होने का प्रमाण मिलता हो.

हिंदू धर्म के लिए घोर आपत्ति वाली यह बात कांग्रेस के किसी नेता और मंत्री ने नहीं बल्कि एक अधिकारी ने कही थी. हालांकि, जब इस मुद्दे ने तूल पकड़ा तो सरकार ने डैमेज कंट्रोल में देर नहीं लगाई. तत्कालीन कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कहा था कि सरकार किसी की आस्था को चोट नहीं पहुंचाना चाहती और वह इस हलफनामे को वापस लेकर नए को दाखिल करेगी. इस मामले पर कांग्रेस को घेरने वाले यह बात कभी नहीं बताते.

hardcore Hindutva vs soft Hindutva, BJP and Congress politics on ram mandir, Ram Janambhoomi in Ayodhya, indian politics after mandir bhumi pujan, Priyanka Gandhi Vadra, Indian National Congress, rahul gandhi, narendra modi, कट्टर हिंदुत्व बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व, राम मंदिर पर बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति, अयोध्या राम जन्मभूमि, मंदिर भूमि पूजन के बाद भारतीय राजनीति, प्रियंका गांधी वाड्रा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी
राम मंदिर भूमि पूजन पर हरियाणा के विधायक नीरज शर्मा का चंडीगढ़ में सुंदरकांड पाठ


राम मंदिर के 'अचीवमेंट' पर कांग्रेसियों का तर्क

कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि 23 दिसंबर 1949 को जब 'विवादित स्थल' में रामलला की मूर्तियां रखी गईं उस वक्त कांग्रेस सरकार थी.

एक फरवरी 1986 को एक अहम फैसले के तहत स्थानीय कोर्ट ने विवादित स्थल पर हिंदुओं को पूजा की इजाजत दे दी और ताले दोबारा खोले गए तब कांग्रेस सत्ता में थी.

जब 9 नवंबर 1989 को विवादित स्थल के पास ही राम मंदिर निर्माण का शिलान्यास हुआ तब राजीव गांधी की सरकार थी.

राम मंदिर की आधारशिला रखे जाने के बाद राजीव गांधी ने अयोध्या से ही अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की और देश में ‘रामराज्य’ लाने का वादा किया.

जनवरी, 1993 में कांग्रेस राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाई थी और बीजेपी ने इसका विरोध किया था. उस वक्त पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे.

बीजेपी ने कांग्रेस से कैसे छीना मंदिर का मुद्दा?

मंदिर पर कांग्रेस की इन कोशिशों के बावजूद हिंदुत्व और राम मंदिर का मुद्दा बीजेपी ने कैसे हथिया लिया? यह एक दिलचस्प सवाल है जिसका जवाब भी उतना दिलचस्प है.

साल 1984 के दिसंबर महीने में राजीव गांधी ने आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली. अप्रैल 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में दो सीटों के साथ खाता खोल लिया, जबकि कांग्रेस ने 533 में से 404 सीटों पर कब्जा किया था.

इस बीच 23 अप्रैल 1985 को सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला आया. यह फैसला था 62 वर्षीय एक मुस्लिम महिला शाहबानो को तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का. तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने पहले इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन बाद में इस पर मुस्लिमों के रुख को देखते हुए मई 1986 में ही उन्हें झुकना पड़ा. मुसलमानों के दबाव में उनकी सरकार ने मुस्लिम महिला एक्ट 1986 पास कर दिया जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्क्रिय करने के लिए था.

यह बीजेपी और दक्षिणपंथी संगठनों के लिए कांग्रेस को घेरने का अवसर था. हुआ भी ऐसा ही. बीजेपी और हिंदू संगठनों ने कांग्रेस सरकार की इस ‘तुष्टिकरण राजनीति’ की आलोचना शुरू कर दी.

जून 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी हुई, जिसमें पार्टी ने पहली बार राम मंदिर बनाने का प्रस्ताव पारित किया. इसे रामजन्म भूमि आंदोलन का नाम दिया गया. इस संकल्प को बीजेपी ने पूरी ताकत से आगे बढ़ाया. इसे एक धार्मिक मुहिम बनाकर राजनीतिक रूप दे दिया गया.

शाहबानो केस से एक तरफ कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे थे तो दूसरी ओर राम मंदिर को लेकर लगातार बन रहे राजनीतिक दवाब के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी नहीं चाहते थे कि उनकी हिंदू विरोधी छवि बने. ऐसे में सरकार ने बीच का रास्ता निकाला और विवादित स्थल के पास ही 9 नवंबर 1989 को मंदिर का शिलान्यास करा दिया गया. वीएचपी ये दावा कर रही थी कि शिलान्यास उसी जगह पर हुआ है जहां के लिए उसने एलान किया था.

सियासी जानकार बताते हैं कि तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और यूपी के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की समझ यह थी कि शिलान्यास से हिंदू तो खुश होकर कांग्रेस के खेमे में आ ही जाएंगे, ‘निर्माण’ रोक देने से मुसलमान भी संतुष्ट ही रहेंगे. इस संतुलन से कांग्रेस के दोनों हाथों में लड्डू होंगे. तब शाहबानो के बावजूद चुनाव जीतने में दिक्कत नहीं होगी. लेकिन, राजीव गांधी का राम मंदिर और हिंदू प्रेम का दांव उल्टा पड़ गया. आडवाणी जैसे नेताओं के साथ बीजेपी पूरे मंदिर आंदोलन को अपनी राजनीतिक धारा में ले चुकी थी.

राजीव गांधी सरकार ने मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास तो करा दिया, लेकिन 1989 के आम चुनाव में ये मुद्दा धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक भी हो गया. क्योंकि विश्व हिंदू परिषद तो दबाव बना ही रही थी, साथ ही पालमपुर में मंदिर का प्रस्ताव पास करने के बाद इसमें बीजेपी भी कूद चुकी थी.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राजीव गांधी की कुछ सियासी गलतियों की वजह से बीजेपी ने अयोध्या आंदोलन को पूरी तरह से हाईजैक कर लिया. जून 1989 में बीजेपी ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू किया. इससे मंदिर आंदोलन को तो नया जीवन मिला ही, मंदिर आंदोलन ने बीजेपी को भी बड़ा सहारा दिया.

1984 में सिर्फ 2 लोकसभा सीटों वाली पार्टी मंदिर मुद्दे पर अपने रुख से हिंदू वोटबैंक को अपनी ओर करने में कुछ हद तक कामयाब रही. उसे 1989 में 85 सीटें मिलीं. फिर इसे और धार देने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने रथ-यात्रा की शुरुआत की.

hardcore Hindutva vs soft Hindutva, BJP and Congress politics on ram mandir, Ram Janambhoomi in Ayodhya, indian politics after mandir bhumi pujan, Priyanka Gandhi Vadra, Indian National Congress, rahul gandhi, narendra modi, कट्टर हिंदुत्व बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व, राम मंदिर पर बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति, अयोध्या राम जन्मभूमि, मंदिर भूमि पूजन के बाद भारतीय राजनीति, प्रियंका गांधी वाड्रा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी
लालकृष्ण आडवाणी ने रथ-यात्रा ने बीजेपी के लिए बड़ी भूमिका अदा की (File Photo)


चुनाव के परिणामों में राजीव गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई और बीजेपी के गठबंधन से विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गए. सत्ता में बदलाव के बाद राम मंदिर आंदोलन धीरे-धीरे विश्व हिंदू परिषद के हाथ से निकल कर भारतीय जनता पार्टी के हाथ में आ गया. तब से जनमानस में कांग्रेस की छवि हिंदू विरोध की बननी शुरू हो गई थी.

लेकिन कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी तक आते-आते देश की सबसे पुरानी पार्टी का चेहरा बिल्कुल हिंदू विरोधी के तौर पर उभरने लगा. बीजेपी और संघ परिवार ने थोड़ा आगे बढ़कर उसकी छवि  'मुस्लिम पार्टी' वाली बना डाली. इसमें परिस्थितियां भी जिम्मेदार थीं. बीजेपी ने इसे भुनाया और खुद को सबसे बड़े हिंदू हितैषी पार्टी के रूप में खड़ा किया.

राम मंदिर और धर्म वाली पॉलिटिक्स   

अब बात करते हैं राम मंदिर के भूमि पूजन के बाद वाली कांग्रेस की. हिंदुत्व को लेकर जो कांग्रेस पहले बचकर बयान देती थी वो अब इससे भाग नहीं रही. तो क्या यह माना जाए कि भूमि पूजन के बाद इस मसले को लेकर उसके व्यवहार में परिवर्तन आया है? दरअसल, राजनीति संख्याबल का खेल है और कांग्रेस जानती है कि मंदिर मसले पर कुछ भी नकारात्मक बोलने से चुनाव में उसे बहुसंख्यक आबादी की पहले से कहीं अधिक नाराजगी झेलनी पड़ सकती है.



ऐसे में क्या अब राजनीतिक पिच पर कांग्रेस का हिंदुत्व बनाम भाजपा के हिंदुत्व की जंग होगी? क्या अब कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व और सेकुलरिज्म का कॉकटेल बनाने की कोशिश कर रही है. क्या वो वाकई राम मंदिर पर अपने नए स्टैंड से बीजेपी के हिंदू वोटबैंक में सेंध लगा पाएगी? या फिर तीसरी बात है, जिसमें कांग्रेस यह बताना चाहती है कि हिंदू-मुस्लिम दोनों उसके एजेंडे में हैं और वो किसी भी धर्म विशेष की तरफ झुकी नहीं है.

हालांकि, राहुल गांधी और प्रियंका इस वक्त हिंदुत्व और सेकुलरिज्म को लेकर जो प्रयोग कर रहे हैं उस नीति पर कांग्रेस वर्षों पहले ही चल चुकी है.

कांग्रेस में हमेशा से एक धड़ा हिंदुत्ववादी और दूसरा समाजवादी सोच का रहा है. इसके हिंदूवादी धड़े से ही खिन्न होकर आचार्य नरेंद्र देव पार्टी से अलग हो गए थे. समय का चक्र अब कांग्रेस से एक बार फिर हिंदुत्व की परीक्षा ले रहा है. इससे पहले बीजेपी के आरोपों का जवाब देने के लिए राहुल गांधी खुद को ‘जनेऊधारी हिंदू’ और ‘शिवभक्त’ बता चुके हैं. हालांकि, शशि थरूर ने ‘हिंदू पाकिस्तान’ वाला बयान देकर उनके किए धरे पर पानी फेर दिया था.

राहुल गांधी का हिंदुत्व

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने मंदिरों में भगवान के दर्शन किए. वह अयोध्या के हनुमान गढ़ी भी गए थे. चित्रकूट के कामतानाथ मंदिर और मिर्जापुर के विंध्याचल मंदिर में भी उन्होंने पूजा-अर्चना की थी.

गुजरात चुनाव (2017) में राहुल गांधी सोमनाथ सहित कई मंदिरों में दर्शन करने गए थे. तब भी इस टेंपल रन पर बीजेपी ने खूब सवाल उठाए थे. जवाब में कांग्रेस ने कहा था कि बीजेपी का 'भक्ति पर पेटेंट' नहीं है. खुद राहुल गांधी ने कहा था कि 'मैं भगवान शिव का भक्त हूं. वो जो कुछ भी कहना चाहते हैं उन्हें कहने दीजिए. मेरी सच्चाई मेरे साथ है.'

याद कीजिए, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी बीजेपी कांग्रेस को हिंदू विरोधी पार्टी साबित करने पर तुली हुई थी. इसलिए राहुल गांधी को न सिर्फ मंदिरों में बार-बार जाना पड़ा बल्कि वो कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भी गए.

खैर, अब एक तरफ भगवान राम को लेकर राहुल और प्रियंका गांधी के हालिया बयान कांग्रेस को फिर से सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर जाने का इशारा कर रहे हैं तो दूसरी ओर बीजेपी नेता लगातार इस कोशिश में जुटे हुए हैं कि कांग्रेस की छवि मंदिर निर्माण में रोड़े अटकाने वाली पार्टी के रूप में बनी रहे. ताकि वो उसे चुनावों में हिंदू विरोधी करार दे सके. इसके लिए उसके पास रामसेतु मुद्दे का औजार काफी है.

hardcore Hindutva vs soft Hindutva, BJP and Congress politics on ram mandir, Ram Janambhoomi in Ayodhya, indian politics after mandir bhumi pujan, Priyanka Gandhi Vadra, Indian National Congress, rahul gandhi, narendra modi, कट्टर हिंदुत्व बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व, राम मंदिर पर बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति, अयोध्या राम जन्मभूमि, मंदिर भूमि पूजन के बाद भारतीय राजनीति, प्रियंका गांधी वाड्रा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी
राहुल गांधी कई मंदिरों की यात्रा कर चुके हैं (File Photo)


राम मंदिर शिलान्यास के बाद की कांग्रेस

मंदिर के लिए बुधवार को हुए भूमि पूजन के बाद जश्न मनाने में कांग्रेसी कार्यकर्ता भी पीछे नहीं थे. हालांकि, वो इसका श्रेय पीएम नरेंद्र मोदी की जगह पूर्व पीएम राजीव गांधी को दे रहे थे.

हरियाणा कांग्रेस के महासचिव बलजीत कौशिक ने कहा, राम मंदिर निर्माण में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का अतुलनीय योगदान है. 1986 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीर बहादुर सिंह को मनाया और राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवाए. तब जाकर लोगों को भगवान श्रीराम के दर्शन का अवसर मिला.

1985 में दूरदर्शन ने राजीव गांधी के कहने पर रामानंद सागर के रामायण का प्रसारण किया. चेन्नई में अपनी आखिरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब राजीव गांधी से राम मंदिर पर सवाल पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि इस पर आम राय बनाने की कोशिशें जारी हैं. अयोध्या में ही राम मंदिर बनेगा.

कुछ कांग्रेस नेताओं ने राजीव गांधी के वक्त 1989 में हुए मंदिर शिलान्यास की फोटो शेयर करके कहा है कि शिलान्यास तो पहले हो गया था, अब एक पार्टी चुनाव प्रचार कर रही है. कुछ कह रहे हैं कि राजीव गांधी का सपना साकार हुआ है.

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राम मंदिर के मसले पर कांग्रेस की कोई भी प्रतिक्रिया अब अप्रासंगिक ही रहेगी. धर्म वाले मुद्दे पर ‘बड़े भाई’ की भूमिका में बीजेपी ही खड़ी मिलेगी. बीजेपी हमेशा यही कहेगी कि कांग्रेस के कपिल सिब्बल जैसे नेता राम मंदिर मामले का निपटारा होने में सबसे बड़ी बाधा बने हुए थे.

hardcore Hindutva vs soft Hindutva, BJP and Congress politics on ram mandir, Ram Janambhoomi in Ayodhya, indian politics after mandir bhumi pujan, Priyanka Gandhi Vadra, Indian National Congress, rahul gandhi, narendra modi, कट्टर हिंदुत्व बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व, राम मंदिर पर बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति, अयोध्या राम जन्मभूमि, मंदिर भूमि पूजन के बाद भारतीय राजनीति, प्रियंका गांधी वाड्रा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी
9 नवंबर 1989 को विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास किया था  (File Photo)


कांग्रेस ने सबसे पहले उठाया राम नाम का सियासी लाभ

अयोध्या में राम मंदिर मामले को लेकर सबसे पहले किसने राजनीतिक फायदा लिया था? आप सोचेंगे बीजेपी. लेकिन ऐसा नहीं है. राम नाम का राजनीतिक लाभ कांग्रेस ने लिया था, वो भी अयोध्या में. उसने यहां हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करके चुनाव जीता था. कांग्रेस के हिंदुत्ववादी सोच के नेताओं में गोविंदबल्लभ पंत और पुरुषोत्तम दास टंडन प्रमुख थे, जो आस्था के प्रखर समर्थक थे. हालांकि कांग्रेस का हिंदुत्व भाजपा के हिंदुत्व से अलग था.

अयोध्या के वयोवृद्ध पत्रकार शीतला सिंह ने एक बार हमसे बातचीत में कहा था कि आजादी के बाद आचार्य नरेंद्र देव एवं उनके साथ 11 सदस्यों ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्यता भी छोड़ दी. आचार्य नरेंद्र देव सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर फैजाबाद सीट से उप चुनाव लड़ रहे थे. उनको हराने के लिए कांग्रेस ने खुलकर हिंदू कार्ड खेला.

उप चुनाव शुरू हुआ तो कांग्रेस ने धार्मिक मुद्दा उठाया. आचार्य नरेंद्र देव को नास्तिक बताते हुए अयोध्या जैसी धार्मिक नगरी के मनोभावों के खिलाफ बताया गया. उनके खिलाफ देवरिया जिले से बाबा राघव दास नाम के साधु को उम्मीदवार बनाया गया. जो मूल रूप से पुणे (महाराष्ट्र) के रहने वाले थे. जबकि जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि आचार्य के खिलाफ कोई चुनाव न लड़े. चुनाव में जो बैनर लगे, उनमें इसे राम-रावण की लड़ाई बताया गया.

शीतला सिंह के मुताबिक उत्तर प्रदेश के प्रीमियर गोविंद वल्लभ पंत ने कांग्रेस प्रत्याशी बाबा राघव दास के समर्थन में अयोध्या के संतों-महंतों की सभाएं कीं, जिनमें उन्होंने कहा कि राघव दास में तो गांधी जी की आत्मा बसती है, लेकिन आचार्य नरेंद्र देव तो नास्तिक हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की नगरी अयोध्या ऐसे व्यक्ति को कैसे स्वीकार कर पाएगी?

इस चुनाव में पुरुषोत्तम दास टंडन भी प्रचार में शामिल हुए. उन्होंने भी आचार्य जी की नास्तिकता का सवाल उठाया था. आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ राम-रावण संवाद के नाम से ऐसे पर्चे बांटे गए, पोस्टर लगाए गए, जिनमें रावण रूपी नरेंद्र देव को हराने और राम रूपी बाबा राघव दास को जिताने का आह्वान किया गया था. कहा गया कि जो कांग्रेस का विरोध कर रहे हैं, वे देश के दुश्मन हैं. जैसा कि आजकल हो रहा है.

hardcore Hindutva vs soft Hindutva, BJP and Congress politics on ram mandir, Ram Janambhoomi in Ayodhya, indian politics after mandir bhumi pujan, Priyanka Gandhi Vadra, Indian National Congress, rahul gandhi, narendra modi, कट्टर हिंदुत्व बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व, राम मंदिर पर बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति, अयोध्या राम जन्मभूमि, मंदिर भूमि पूजन के बाद भारतीय राजनीति, प्रियंका गांधी वाड्रा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी
कांग्रेस ने बाबा राघवदास को हिंदुत्व का प्रतीक बनाया और आचार्य नरेंद्र देव को राम विरोधी


‘संवेद’ पत्रिका ने जनवरी 2016 के ‘समाजवाद और आचार्य नरेंद्र देव’ विशेषांक में लिखा है “कांग्रेस के अंदर एक ऐसा समूह था जो अघोषित रूप से चाहता था कि भारत हिंदू राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हो....“गोविंदबल्लभ पंत और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे कांग्रेसी नेताओं ने प्रचार अभियान में यह बात फैलाई कि नरेंद्र देव ईश्वर को नहीं मानते. कांग्रेस नेताओं ने सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ जनता से पूछा कि क्या आप अपना वोट ऐसे व्यक्ति को देंगे जो राम को भगवान नहीं मानते? बाबा राघव दास ने खुद घर-घर जाकर तुलसी की माला दी. अंतत: साधु जीत गया और एक संघर्षशील समाजवादी हार गया.”

यह बात 1948 की है. माना जाता है कि आजाद भारत में धर्म निरपेक्षता पर कट्टर हिंदुत्व की यह पहली जीत थी.

अब मंदिर भूमि पूजन के बाद सियासी नफे-नुकसान का आकलन करते हुए कांग्रेस एक बार फिर हिंदुत्व और सेक्लुरिज्म के दोराहे पर खड़ी नजर आ रही है. इस रुख के चुनावी नफे-नुकसान के लिए हमें किसी बड़े चुनाव का इंतजार करना होगा.
ब्लॉगर के बारे में
ओम प्रकाश

ओम प्रकाश

लगभग दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. इस समय नेटवर्क-18 में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. खेती-किसानी और राजनीतिक खबरों पर पकड़ है. दैनिक भास्कर से कॅरियर की शुरुआत. अमर उजाला में फरीदाबाद और गुरुग्राम के ब्यूरो चीफ का पद संभाल चुके हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: August 7, 2020, 5:52 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर