हाथरस केस को लेकर अब नया विवाद, ‘दलित’ शब्द के इस्तेमाल पर छिड़ी बहस, ये है बड़ी वजह

दलित शब्द के इस्तेमाल को लेकर बीजेपी में भी एक राय नहीं, कोर्ट ने कब और किसकी याचिका पर इसे लेकर दिया था बड़ा आदेश, पढ़िए-इसका पूरा विश्लेषण

Source: News18Hindi Last updated on: October 18, 2020, 1:01 PM IST
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हाथरस केस को लेकर अब नया विवाद, ‘दलित’ शब्द के इस्तेमाल पर छिड़ी बहस, ये है बड़ी वजह
क्या दलित शब्द को लेकर भाजपा नेताओं में दो राय है?
नई दिल्ली. हाथरस मामले (Hathras Case) को लेकर अब एक नया विवाद छिड़ गया है. पीड़ित परिवार वंचित समाज से आता है. टीवी पर इसे लेकर चल रही बहस में जिसने भी 'दलित' शब्द का इस्तेमाल किया, उसे बीजेपी (BJP) अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्रभारी रह चुके शांत प्रकाश जाटव (Shant Prakash Jatav) ने आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया है. चाहे वो इसी समाज और बीजेपी से ही क्यों न आता हो. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर जाटव ने कहा कि दलित शब्द का इस्तेमाल करने पर वो कानूनी कार्रवाई करेंगे. इसकी जगह अनुसूचित जाति शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए. क्योंकि अदालत और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने इस पर रोक लगाई हुई है.

हाथरस कांड पर बुलाई गई एक टीवी डिबेट में सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रभान प्रसाद को भी उन्होंने दलित शब्द पर आड़े हाथों लिया. बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय सोनकर शास्त्री ‘दलित आंदोलन’ नामक पत्रिका चलाते हैं. शांत प्रकाश उन पर भी सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या दलित शब्द (Dalit word) को लेकर भाजपा (BJP) नेताओं में ही दो राय है? कैसे एक ही पार्टी में कोई दलित शब्द के इस्तेमाल का पैरोकार है तो कोई इसका खुला विरोध कर रहा है. जाटव का कहना है कि यह शब्द गैर संवैधानिक है.

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क्या 'दलित' शब्द सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भ का निर्माण करता है? (प्रतीकात्मक फोटो)


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विजय सोनकर शास्त्री ने क्या कहा?

न्यूज18 हिंदी ने इस बारे में विजय सोनकर शास्त्री से बातचीत की. शास्त्री कहते हैं, “दलित असंवैधानिक नहीं बल्कि गौरवशाली शब्द है. लेकिन जब इसे नकारात्मक भाव में कहा जाएगा तब गलत हो जाएगा. हरिजन शब्द कितना अच्छा था. लेकिन उसे भी नकारात्मक बना दिया गया. बाद में उसे बैन कर दिया गया. कल लोग अनुसूचित जाति का नकारात्मक अर्थों में इस्तेमाल करने लगेंगे तो वो भी खराब हो जाएगा. फिर कौन सा शब्द आएगा?”



शास्त्री के मुताबिक, “सिर्फ दलित ही नहीं किसी भी जाति का नाम नकारात्मक नजरिए से लिया जाएगा तो वो खराब लगेगा. दलित शब्द का अर्थ है जिनका दमन और दलन हुआ हो.” मोदी सरकार में सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रामदास अठावले भी दलित शब्द को अपमानजनक नहीं मानते. दलित शीर्षक से ढेरों किताबें हैं.मेरठ यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सतीश प्रकाश कहते हैं, “अनुसूचित जाति एक तटस्थ शब्द है, लेकिन 'दलित' एक सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भ का निर्माण करता है. यह एक जीवंत शब्द है. यह दबे-कुचले लोगों के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है.

वो आदेश, जिसकी वजह से छिड़ी हुई है बहस

पंकज मेश्राम ( Pankaj Meshram) नामक शख्स की याचिका पर 6 जून 2018 को बांबे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने अपने एक आदेश में कहा था कि मीडिया में लिखी जा रही खबरों में दलित शब्द पर प्रतिबंध लगे. अदालत के आदेश में कहा गया था कि "केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और इसके कार्यकर्ता अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के लिए 'दलित' शब्द का उपयोग करने से बचें क्योंकि, भारत के संविधान या किसी भी कानून में इस शब्द का उल्लेख नहीं है.

याची के मुताबिक “अनुसूचित जाति (Scheduled caste) समुदाय को गांवों में बहुत भेदभाव का सामना करना पड़ता है और ‘दलित‘ शब्द उत्पीड़न का प्रतीक बन गया है. जब कोई आपको दलित कहता है, तो यह केवल अपमानजनक अर्थ में होता है.” इसलिए यह शब्द पूरी तरह से सरकारी रिकॉर्ड से निकाल देना आवश्यक है.

बांबे हाईकोर्ट से पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जनवरी 2018 में ही इसी तरह का आदेश दिया था. ग्वालियर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता मोहनलाल महोर की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश संजय यादव और अशोक कुमार जोशी की पीठ ने कहा था कि दलित शब्द का इस्तेमाल किसी भी सरकारी और गैर सरकारी विभागों में नहीं किया जाए. उसके लिए संविधान में बताए शब्द ही इस्तेमाल में लाया जाए.

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राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग भी दलित शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जता चुका है. आयोग ने कई बार ये कहा है कि संविधान में अनुसूचित जाति का प्रयोग ही उचित और संवैधानिक है.

सूचना प्रसारण मंत्रालय की क्या है एडवाइजरी?

अदालत के फैसले के बाद 7 अगस्त 2018 को केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने सभी टीवी चैनलों को एक एडवाइजरी जारी कर 'दलित' शब्‍द के इस्‍तेमाल से परहेज करने को कहा.

तब केंद्रीय राज्यमंत्री रामदास आठवले ने कहा था कि उनकी पार्टी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी. हालांकि, फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए 'दलित' शब्द का इस्तेमाल नहीं करने संबंधी मीडिया को दिए गए केंद्र के परामर्श को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी.

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दलित शीर्षक से ढेरों किताबें हैं और कई आंदोलन हो चुके हैं. (File Photo)


दलित शब्द और प्रेस काउंसिल का तर्क

नवंबर 2018 में भारतीय प्रेस परिषद (PCI- Press Council of India) के चेयरमैन सीके प्रसाद ने 'दलित' शब्द के इस्तेमाल पर बैन को नकारते हुए कहा था कि-बांबे हाई कोर्ट के जिस आदेश का हवाला दिया गया है, उसे पूरी तरह से गंभीरता से समझने के बाद उसका अलग अर्थ सामने आता है. हाईकोर्ट ने सलाह दी है आदेश नहीं. परिषद ने विचार-विमर्श के बाद माना कि सभी परिस्थितियों में दलित शब्द का इस्तेमाल रोके जाने की सलाह नहीं दी गई है. इसलिए शब्द के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगाना उचित नहीं है. शायद किसी विशेष मामले में 'दलित' शब्द का उपयोग आवश्यक हो सकता है और इसलिए हमने कहा है कि पूरी तरह प्रतिबंध व्यवहारिक नहीं है.”

1982 में इस शब्द पर भी लगाई गई थी रोक

इससे पहले 10 फरवरी 1982 में नोटिफिकेशन जारी कर हरिजन शब्द पर भी रोक लगाई गई थी. हरिजन बोलने पर कड़ी सजा का प्रावधान है. अभी यह पता नहीं चल पाया है कि दलित शब्द का इस्तेमाल करते हुए पाए जाने पर कितनी सजा का प्रावधान रखा गया है. 18 अगस्त 1990 में मंत्रालय ने राज्य सरकारों से शेड्यूल्ड कास्ट (SC) के अनुवाद के रूप में ‘अनुसूचित जाति’ उपयोग करने का अनुरोध किया था.
ब्लॉगर के बारे में
ओम प्रकाश

ओम प्रकाश

लगभग दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. इस समय नेटवर्क-18 में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. खेती-किसानी और राजनीतिक खबरों पर पकड़ है. दैनिक भास्कर से कॅरियर की शुरुआत. अमर उजाला में फरीदाबाद और गुरुग्राम के ब्यूरो चीफ का पद संभाल चुके हैं.

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First published: October 9, 2020, 7:00 PM IST
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