Bihar Election: बिहार में 20 बार मुख्यमंत्री बनाने वाली कांग्रेस का कैसे हुआ पतन?

ऐसा क्या हुआ कि कभी बिहार की राजनीति में एकछत्र शासन करने वाली कांग्रेस पिछले 30 साल से अपने वजूद के लिए तरस रही है? पढ़िए-विश्लेषण.

Source: News18Hindi Last updated on: October 23, 2020, 7:38 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
Bihar Election: बिहार में 20 बार मुख्यमंत्री बनाने वाली कांग्रेस का कैसे हुआ पतन?
बिहार में कांग्रेस के पतन की पूरी कहानी
नई दिल्ली. बिहार के सियासी दंगल में इस बार कांग्रेस लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की पार्टी आरजेडी के साथ गठबंधन करके 70 सीटों पर अपनी किस्मत आजामा रही है. लेकिन हालात कोई बहुत अच्छे नहीं दिख रहे हैं. एक वक्त ऐसा था जब बिहार में कांग्रेस (Congress) का सिक्का चलता था, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि वहां पर इसका नेता कौन है यही ज्यादातर लोगों को पता नहीं होगा. 10 मार्च 1990 के बाद जैसे इसके ग्रहों की चाल बदल गई और पार्टी का पतन होता चला गया.

आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसे दो कालखंडों में देखा जा सकता है. प्री मंडल-कमंडल और पोस्ट मंडल-कमंडल. मंडल-कमंडल की राजनीति का दौर शुरू हुआ तो कांग्रेस ने न तो उस तरह के छत्रप पैदा किए और न अपने आपमें बड़ा बदलाव किया. वो ऐसा दौर था जब पिछड़ी जातियों (OBC Castes) के नेता लालू-नीतीश का उभार हुआ और बीजेपी की एंट्री ने अपर कास्ट को अपनी ओर खींच लिया. ऐसे में कांग्रेस कहीं की नहीं रह गई.

bihar assembly election 2020, Rise and fall of Congress, Decline of Congress Party in bihar, Mandal-Kamandal, election politics, obc, upper caste, बिहार विधानसभा चुनाव 2020, कांग्रेस का उदय और पतन, बिहार में कांग्रेस के हालात, मंडल-कमंडल, चुनावी राजनीति, ओबीसी, अपर कास्ट
1980 के बाद आपस में लड़ते रहे बिहार कांग्रेस के नेता!


इसे भी पढ़ें: बिहार की सत्ता में 'ड्राइवर' बनेगी बीजेपी या फिर JDU की 'स्टेपनी' ही रहेगी?

कांग्रेस को पहला झटका

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को अपने एक फैसले में रायबरेली से सांसद के रूप में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया. साथ ही 6 साल तक उनके किसी भी तरह के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. इसके खिलाफ इंदिरा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 24 जून को अदालत ने प्रधानमंत्री पद पर उन्हें बने तो रहने दिया, लेकिन हाईकोर्ट के आदेश को खारिज नहीं किया. उनकी जीत को संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण ने चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट से निराश होने के बाद 25 जून 1975 की रात इंदिरा ने 'आपातकाल' लागू कर दिया.19 महीने बाद जब आपातकाल खत्म हुआ तो जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी ने एक होकर जनता पार्टी बनाई. इसे 1977 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में खूब समर्थन मिला. आपातकाल के अत्याचारों ने उत्तर भारत में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया. बिहार में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली, जबकि विधानसभा में उसे सिर्फ 57 सीटों पर संतोष करना पड़ा. कर्पूरी ठाकुर दूसरी बार जनता पार्टी से मुख्यमंत्री बने. 1980 के चुनाव से पहले इसी पार्टी की ओर से श्यामसुंदर दास भी कुछ महीने तक सीएम रहे. इससे पहले दो बार ही बिहार में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी.

bihar assembly election 2020, Rise and fall of Congress, Decline of Congress Party in bihar, Mandal-Kamandal, election politics, obc, upper caste, बिहार विधानसभा चुनाव 2020, कांग्रेस का उदय और पतन, बिहार में कांग्रेस के हालात, मंडल-कमंडल, चुनावी राजनीति, ओबीसी, अपर कास्ट
बिहार में कांग्रेस के उदय और पतन की कहानी


दोबारा लौटी कांग्रेस लेकिन कलह के साथ

1980 के चुनाव में कांग्रेस ने फिर जोरदार वापसी की और जगन्नाथ मिश्र को दोबारा कमान मिली. दिलचस्प ये है कि 1980 से 1990 तक 10 साल में ही कांग्रेस ने पांच बार सीएम बदला. मिश्रा के अलावा चंद्रशेखर सिंह, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आजाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा को भी इस कुर्सी पर बैठने का अवसर मिला. कांग्रेस के अलग-अलग गुट आपस में ही एक दूसरे को निपटाने में जुट गए. हार मानकर 1990 के चुनाव से पहले दिसंबर 1989 में पार्टी ने तीसरी बार जगन्नाथ मिश्र को ही कमान दे दी. मार्च 1990 के विधानसभा चुनाव के बाद से अब तक पिछले तीन दशक में कांग्रेस का ग्राफ ऊपर नहीं उठा.

बीजेपी की एंट्री ने बढ़ाई परेशानी

दरअसल, बिहार में भी कांग्रेस यूपी की तरह ही अगड़ी जातियों की पैरोकार थी. वो कमजोर पड़ने लगी थी और अगड़ी जातियों को विकल्प के तौर पर बीजेपी मिल चुकी थी. बीजेपी की स्थापना अप्रैल 1980 में हुई थी और वो इसी साल मई में हुए विधानसभा चुनाव में उतर गई थी. साल 1985 के चुनाव में लोगों ने बीजेपी को उभरते देखा था. उसके पास 10.53 फीसदी वोट के साथ 16 सीटें उसके पास थीं.

समझा जाता है कि कांग्रेस कलह से जूझ रही थी. सत्ता के साथ रहने का आदी हो चुका अपर कास्ट कांग्रेस को कमजोर पड़ता देख और धीरे से बीजेपी से सट गया. नतीजा ये हुआ कि 1990 के चुनाव में भगवा ब्रिगेड का वोट परसेंट बढ़कर न सिर्फ 16.35 हो गया बल्कि सीटें 39 तक पहुंच गईं.

मंडल का दौर और कांग्रेस

1990 में ही भारतीय राजनीति में दो बड़े परिवर्तन हो रहे थे, जिसने कांग्रेस को हाशिए पर खड़ा कर दिया. केंद्र में जनता दल की सरकार थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह पहली गैर कांग्रेसी सरकार के मुखिया रहे मोरारजी देसाई द्वारा 20 दिसंबर 1978 को गठित पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) की रिपोर्ट 7 अगस्त 1990 को लागू करने की घोषणा कर दी.

इस आयोग ने दिसंबर 1980 में ही अन्य पिछड़े वर्गों को नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश कर दी थी. लेकिन उसके बाद की इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों ने इस सिफारिश को लटकाए रखा. पिछड़ी जातियों, जो बिहार में सबसे अधिक संख्या में हैं, उनमें यह संदेश चला गया था. नतीजा यह हुआ कि पिछड़ी जाति के लोग अपने बीच से नेता तलाशने लगे.

bihar assembly election 2020, Rise and fall of Congress, Decline of Congress Party in bihar, Mandal-Kamandal, election politics, obc, upper caste, बिहार विधानसभा चुनाव 2020, कांग्रेस का उदय और पतन, बिहार में कांग्रेस के हालात, मंडल-कमंडल, चुनावी राजनीति, ओबीसी, अपर कास्ट
तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को मंडल कमीशन की रिपोर्ट सौंपते बीपी मंडल (File Photo)


रथयात्रा के बाद का संयोग

मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के 48 दिन बाद 25 सितंबर 1990  को भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर के लिए सोमनाथ (गुजरात) से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथयात्रा की शुरुआत की. तब बिहार में जनता दल के लालू प्रसाद यादव सीएम थे. रथयात्रा के अगुआ आडवाणी को 23 अक्टूबर 1990 को समस्तीपुर में सत्ता के इशारे पर तत्कालीन डीएम आरके सिंह (जो अब मोदी सरकार में मंत्री हैं) ने गिरफ्तार करवा दिया. यहां बीजेपी ने कांग्रेस के अपर कास्ट वाले वोटबैंक (Vote Bank) का दिल जीतने में काफी हद तक सफलता पा ली थी.

इन दो घटनाओं ने भारतीय राजनीति को बहुत गहरे से प्रभावित किया. मंडल और कमंडल की इस राजनीति में कांग्रेस हाशिए पर चली गई. 1990 से 1995 का दौर बिहार में सामाजिक परिवर्तन का दौर माना जाता है. क्योंकि पहली बार सत्ता में पिछड़ी जातियों की अच्छी भागदारी थी. इस दौरान कांग्रेस ने अपनी खोई हुई सियासी ताकत को वापस पाने का कोई प्रयास नहीं किया. लालू प्रसाद यादव मजबूत होते गए और कांग्रेस कमजोर.

bihar assembly election 2020, Rise and fall of Congress, Decline of Congress Party in bihar, Mandal-Kamandal, election politics, obc, upper caste, बिहार विधानसभा चुनाव 2020, कांग्रेस का उदय और पतन, बिहार में कांग्रेस के हालात, मंडल-कमंडल, चुनावी राजनीति, ओबीसी, अपर कास्ट
लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा से बिहार में क्या बदला? (File Photo)


इसे भी पढ़ें: BSP-RLSP गठबंधन की ये भी है वजह, यूपी में फायदा लेने की तैयारी में मायावती

आरजेडी और जेडीयू का दौर

5 जुलाई 1997 को लालू यादव ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का गठन कर लिया. इसके बाद फरवरी 2005 तक उन्हीं का परिवार सत्ता पर काबिज रहा. हालांकि इसी बीच 30 अक्टूबर 2003 को जेडीयू की स्थापना हो चुकी थी. लालू के दौर में ही वो जेडीयू नेता नीतीश कुमार (Nitish Kumar) 3 से 10 मार्च 2000 तक सात दिन के लिए मुख्यमंत्री बने. लेकिन पर्याप्त बहुमत न होने की वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.

साल 2005 के बाद से नीतीश कुमार का राज है, वो पिछड़ी जाति के कुर्मी समाज से आते हैं. लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) के फार्मूले से उन्होंने यादवों के बाद दूसरी बड़ी ताकत माने जाने वाली कुशवाहा जाति के वोटबैंक का फायदा उठाया. इन 15 वर्षों में समय-समय पर उनका अगड़ी जातियों की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी से गठबंधन रहा है. ऐसे में कांग्रेस न तो पिछड़ों में पकड़ बना पाई और न ही अपने पुराने कोर वोटबैंक अगड़ों में.

bihar assembly election 2020, Rise and fall of Congress, Decline of Congress Party in bihar, Mandal-Kamandal, election politics, obc, upper caste, बिहार विधानसभा चुनाव 2020, कांग्रेस का उदय और पतन, बिहार में कांग्रेस के हालात, मंडल-कमंडल, चुनावी राजनीति, ओबीसी, अपर कास्ट
लालू प्रसाद यादव और राहुल गांधी (File Photo)


‘24 अकबर रोड’ के लेखक रशीद किदवई ने कांग्रेस के अर्श से लेकर फर्श तक आने का कारण बताया. वो कहते हैं, “कांग्रेस ने इमरजेंसी के बाद भी अपने आपको स्थापित कर लिया था, लेकिन मंडल-कमंडल के दौर में वो पिछड़ती ही चली गई. मंडल से पहले बिहार कांग्रेस में ही खींचतान चल रही थी. इसके अलग-अलग धड़ों ने पार्टी को आगे बढ़ाने की बजाय एक दूसरे को ही निपटाने का काम किया. पिछड़ों-अगड़ों की जातीय गोलबंदी में वो एडजस्ट नहीं कर पाई. यूपी की तरह ही बिहार कांग्रेस में भी ब्राह्मण ही डोमिनेट कर रहे थे. पार्टी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की तरह अपना कोई मजबूत क्षत्रप नहीं पैदा किया. मुस्लिम वोटरों की तरफ भी उसका कम ही ध्यान था. इस तरह कांग्रेस वहां रसातल में ही जाती रही.”

2020 के हालात

कभी दलित कांग्रेस का कोर वोटबैंक हुआ करता था. उसमें रामविलास पासवान जैसे नेताओं ने सेंधमारी कर दी. रामविलास के निधन के बाद अब इस वर्ग के बड़े नेता के तौर पर चिराग पासवान उभर रहे हैं. जबकि ज्यादातर ब्राह्मण बीजेपी के साथ हैं. ओबीसी का बड़ा धड़ा पहले से ही लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के साथ है. मुस्लिमों को असदुद्दीन ओवैसी के रूप में नया विकल्प मिल गया है. कुशवाहा वोटरों को आरएलएसपी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा लुभा रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस का कोई दांव चलता नजर नहीं आ रहा है.
ब्लॉगर के बारे में
ओम प्रकाश

ओम प्रकाश

लगभग दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. इस समय नेटवर्क-18 में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. खेती-किसानी और राजनीतिक खबरों पर पकड़ है. दैनिक भास्कर से कॅरियर की शुरुआत. अमर उजाला में फरीदाबाद और गुरुग्राम के ब्यूरो चीफ का पद संभाल चुके हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: October 20, 2020, 3:10 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर