मुनाफा व्यापारी कमाएंगे, टैक्सपेयर्स के पैसे से घाटा सरकार भरेगी, ये है भावांतर स्कीम का सच!

नए कृषि अध्यादेशों के बाद भावांतर भरपाई स्कीम से किसानों का घाटा पाटने की योजना पर इसलिए सवाल उठा रहे हैं किसान संगठन

Source: News18Hindi Last updated on: September 2, 2020, 10:40 AM IST
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मुनाफा व्यापारी कमाएंगे, टैक्सपेयर्स के पैसे से घाटा सरकार भरेगी, ये है भावांतर स्कीम का सच!
पीएम किसान स्कीम में गड़बड़ी की वजह से रोका जा रहा है भुगतान
नई दिल्ली. बीजेपी शासित कुछ राज्य कह रहे हैं कि नए कृषि अध्यादेशों की वजह से अगर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP- Minimum Support Prices) नहीं मिला तो वो दाम में घाटे के अंतर को भरने का काम भावांतर भरपाई योजना (Bhavantar Bharpayee Yojana) से करेंगे. यानी किसान के घाटे को सरकार पाटेगी. सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इसके पीछे होने वाली पैसे की बंदरबांट और किसानों के कष्ट को समझना जरूरी है. सुनने में आपको अटपटा लग सकता है कि आखिर किसानों को संभावित घाटे की भरपाई के लिए इंतजाम करने के बाद कैसी नाराजगी? दरअसल, आप इस योजना को गहराई से समझेंगे तो पाएंगे कि भावांतर किसानों के लिए नहीं बल्कि व्यापारियों के भले के लिए है. इसे लेकर कृषि विशेषज्ञों के पास पास तर्क हैं.

यूं ही नहीं देश के 62 किसान संगठनों की संस्था राष्ट्रीय किसान महासंघ ने भावांतर भरपाई योजना पर नाराजगी जताई है. महासंघ के संस्थापक सदस्य एवं कृषि विशेषज्ञ बिनोद आनंद का कहना है कि नए कृषि अध्यादेशों के बाद मंडी (APMC-Agricultural Produce Market Committees) से बाहर किसान अपनी उपज व्यापारियों को बेचेंगे तो पूरा दाम भी व्यापारियों को ही देना चाहिए.

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किसानों ने कहा-भावांतर नहीं एमएसपी चाहिए


अगर व्यापारियों (Traders) के कम पैसे देने से किसी किसान (Farmers) को घाटा होता है तो सरकार भरपाई करेगी. सरकार ऐसा कहती है लेकिन पूरा घाटा नहीं भरती. यानी यदि किसी उपज का एमएसपी 2000 रुपये प्रति क्विंटल है और मंडी से बाहर कोई व्यापारी या कंपनी किसान से उसकी खरीद 1500 रुपये की दर पर करता है तो किसान को सरकार 200-300 रुपये ही देगी. पूरा घाटा भरने की उम्मीद छोड़ दीजिए.
ऐसे में यही माना जाएगा सरकार किसानों के नाम पर बैकडोर से व्यापारियों की मदद कर रही है. कोई भी सरकार ऐसा करेगी तो व्यापारी किसान को हमेशा एमएसपी से कम दाम ही देगा. मुनाफा कमाएगा व्यापारी और उसकी भरपाई सरकार करती रहेगी.



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सवाल ये उठता है कि जिस पैसे से भावांतर भरपाई योजना चलाई जाएगी वो किसका है? जाहिर है कि वो टैक्सपेयर्स का पैसा है. आनंद का कहना है कि भावांतर योजना संगठित तरीके से टैक्सपेयर्स का पैसा उड़ाने के समान है. जब सरकार कह रही है कि नए अध्यादेशों से किसानों को पहले के मुकाबले उपज का अच्छा दाम मिलेगा तो उसे एक ऑर्डर पास करने में क्या दिक्कत है कि एमएसपी से नीचे की खरीद गैरकानूनी मानी जाएगी और ऐसा करने वालों को जेल भेजा जाएगा.
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हरियाणा के कृषि मंत्री जेपी दलाल ने भावांतर की बात कही है


आनंद कहते हैं कि अगर सरकार ऐसा नहीं कह रही है तो यही मानकर चलिए कि नई व्यवस्था में किसानों को एमएसपी जितना दाम नहीं मिलेगा. इसकी तस्दीक हरियाणा जैसे राज्य कर रहे हैं जो भावांतर योजना से घाटा पाटने की बात कर रहे हैं.

हरियाणा के कृषि मंत्री ने क्या कहा?

हरियाणा के कृषि मंत्री जेपी दलाल का कहना है कि केंद्र सरकार के दोनों कृषि अध्यादेश आने से अगर किसान को मंडियों से बाहर न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी अधिक दाम मिलता है तो वह फसल बेच सकता है. एमएसपी पर तो सरकार खरीदेगी ही अन्यथा भावांतर भरपाई योजना में फसल के भाव के अंतराल को पूरा किया जाएगा. दलाल ने किसानों से अपील की कि वे इन अध्यादेशों के विषय में किसी के बहकावे में न आएं.

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मध्य प्रदेश में भावांतर के बाद लुटता रहा किसान

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन में मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष राहुल राज कहते हैं कि भावांतर योजना में भारी भ्रष्टाचार है. इससे व्यापारी खुश रहता है और किसान दुखी. दरअसल, यह किसानों के नाम पर है जरूर लेकिन इससे हित सधता है व्यापारियों का.

जिस दिन मध्य प्रदेश में भावांतर योजना शुरू हुई थी उस दिन व्यापारियों ने हदरा मंडी में 6500 रुपये क्विंटल वाली मूंग का दाम गिराकर 4500 रुपये कर दिया था. जबकि इस योजना के तहत सरकार अधिकतम 500 रुपये क्विंटल तक की भरपाई कर रही थी. वो भी पैसा साल भर बाद आता था. इस तरह किसान घाटे में ही रहा.

ऐसे में हमें भावांतर नहीं चाहिए. हमें एमएसपी पर कानून चाहिए. भावांतर से किसान दुखी ही रहता है. क्योंकि इस योजना की वजह से मंडी में व्यापारी लोग किसानों को लूटने का काम करते हैं और सरकार बहुत कम पैसे की भरपाई करती है. हम केंद्र सरकार के दोनों अध्यादेशों को मान लेंगे, बस वो एमएसपी को किसानों का कानूनी अधिकार बना दे.

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मंडियों में भी नहीं मिल पा रहा एमएसपी


लाभ-हानि के संबंध में किसानों का भय दूर किया: तोमर 

हालांकि, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि दो नए अध्यादेशों की वजह से किसान अब अपनी उपज मनचाही कीमत पर, मनचाहे स्थान पर बेच सकते हैं. उपज बिक्री व लाभ-हानि के संबंध में किसानों का भय दूर किया गया है. खेती क्षेत्र को समग्र रूप से इन अध्यादेशों का लाभ मिलेगा. निजी निवेश गांवों-खेतों तक पहुंचेगा.

कृषि अध्यादेश और किसानों की आशंकाएं

अध्यादेश-1: कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार-संवर्धन एवं सुविधा अध्यादेश

सरकारी तर्क: इस अध्यादेश के लागू हो जाने से किसानों के लिए एक सुगम और मुक्त माहौल तैयार हो सकेगा, जिसमें उन्हें अपनी सुविधा के हिसाब से कृषि उत्पाद खरीदने और बेचने की आजादी होगी. कोई अपनी उपज कहीं भी बेच सकेगा. किसानों को अधिक विकल्प मिलेंगे, जिससे बाजार की लागत कम होगी और उन्हें अपनी उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी.

इस अध्यादेश से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कंपनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं. कृषि माल की बिक्री कृषि उपज मंडी समिति (APMC) में होने की शर्त हटा ली गई है. जो खरीद मंडी से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं लगेगा.

किसानों का तर्क: जब किसानों के उत्पाद की खरीद मंडी में नहीं होगी तो सरकार इस बात को रेगुलेट नहीं कर पाएगी कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिल रहा है या नहीं. इस अध्यादेश में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि किसान व कंपनी के बीच विवाद होने की स्थिति में कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता.व्यापारियों का कहना है कि सरकार के नए अध्यादेश में साफ लिखा है कि मंडी के अंदर फसल आने पर मार्केट फीस लगेगी और मंडी के बाहर अनाज बिकने पर मार्केट फीस नहीं लगेगी. ऐसे में मंडियां तो धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी. कोई मंडी में माल क्यों खरीदेगा.

अध्यादेश-2: मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश-2020

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किसान एमएसपी को अपना कानूनी अधिकार बनवाना चाहते हैं


सरकार का तर्क: इस अध्यादेश को सरकार ने कांट्रैक्ट फार्मिंग के मसले पर लागू किया है. इससे खेती का जोखिम कम होगा और किसानों की आय में सुधार होगा. समानता के आधार पर किसान प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम होगा. किसानों की आधुनिक तकनीक और बेहतर इनपुट्स तक पहुंच सुनिश्चित होगी. मतलब यह है कि इसके तहत कांट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा. जिसमें बड़ी-बड़ी कंपनियां किसी खास उत्पाद के लिए किसान से कांट्रैक्ट करेंगी. उसका दाम पहले से तय हो जाएगा. इससे अच्छा दाम न मिलने की समस्या खत्म हो जाएगी.

किसानों का तर्क: अन्नदाताओं के लिए काम करने वाले संगठनों और कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस अध्यादेश के बाद किसान अपने ही खेत में सिर्फ मजदूर बनकर रह जाएगा. केंद्र सरकार पश्चिमी देशों के खेती का मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है. कांट्रैक्ट फार्मिंग में कंपनियां किसानों का शोषण करती हैं. उनके उत्पाद को खराब बताकर रिजेक्ट कर देती हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ओम प्रकाश

ओम प्रकाश

लगभग दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. इस समय नेटवर्क-18 में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. खेती-किसानी और राजनीतिक खबरों पर पकड़ है. दैनिक भास्कर से कॅरियर की शुरुआत. अमर उजाला में फरीदाबाद और गुरुग्राम के ब्यूरो चीफ का पद संभाल चुके हैं.

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First published: September 2, 2020, 10:30 AM IST
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