केंद्र सरकार के वो अध्यादेश, जिनके खिलाफ किसान-व्यापारी दोनों उठा रहे हैं आवाज

कृषि क्षेत्र में सुधार के नाम पर लाए गए दो नए अध्यादेशों और EC Act में संशोधन के बाद क्यों गुस्से में हैं किसान और छोटे व्यापारी, पढ़िए, दोनों के तर्क

Source: News18Hindi Last updated on: August 25, 2020, 12:33 PM IST
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केंद्र सरकार के वो अध्यादेश, जिनके खिलाफ किसान-व्यापारी दोनों उठा रहे हैं आवाज
कृषि सुधार के अध्यादेशों पर क्या हैं सरकार और किसानों के तर्क
नई दिल्ली. केंद्र सरकार जिन अध्यादेशों को कृषि सुधार (Agricultural reform) का सबसे बड़ा कदम बता रही है, उसके खिलाफ किसान और व्यापारी दोनों खड़े हो गए हैं. पहले पंजाब और हरियाणा के किसानों ने ट्रैक्टर आंदोलन किया और अब व्यापारियों ने चार राज्यों की मंडियों में हड़ताल करवा दी है. मोदी मंत्रिमंडल ने 3 जून को दो नए अध्यादेशों पर मुहर लगाई थी और EC Act में संशोधन की मंजूरी दी थी. आईए जानते हैं कि आखिर वो कौन से प्वाइंट हैं जिन्हें लेकर किसान और व्यापारी दोनों सरकार के विरोध में आ खड़े हुए हैं.

अध्यादेश-1: कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार-संवर्धन एवं सुविधा अध्यादेश (Farmer's Produce Trade and Commerce-Promotion and Facilitation Ordinance-2020)

सरकारी तर्क: इस अध्यादेश के लागू हो जाने से किसानों के लिए एक सुगम और मुक्त माहौल तैयार हो सकेगा, जिसमें उन्हें अपनी सुविधा के हिसाब से कृषि उत्पाद खरीदने और बेचने की आजादी होगी. 'एक देश, एक कृषि मार्केट' बनेगा. कोई अपनी उपज कहीं भी बेच सकेगा. किसानों को अधिक विकल्प मिलेंगे, जिससे बाजार की लागत कम होगी और उन्हें अपने उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी.

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इस अध्यादेश से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कंपनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं. कृषि माल की बिक्री कृषि उपज मंडी समिति (APMC) में होने की शर्त हटा ली गई है. जो खरीद मंडी से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं लगेगा.

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किसानों का तर्क: जब किसानों के उत्पाद की खरीद मंडी में नहीं होगी तो सरकार इस बात को रेगुलेट नहीं कर पाएगी कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिल रहा है या नहीं. इस अध्यादेश में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि किसान व कंपनी के बीच विवाद होने की स्थिति में कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता.व्यापारियों का कहना है कि सरकार के नए अध्यादेश में साफ लिखा है कि मंडी के अंदर फसल आने पर मार्केट फीस लगेगी और मंडी के बाहर अनाज बिकने पर मार्केट फीस नहीं लगेगी. ऐसे में मंडियां तो धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी. कोई मंडी में माल क्यों खरीदेगा.

अध्यादेश-2: मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश-2020 (The Farmers Agreement on Price Assurance and Farm Services Ordinance)

सरकार का तर्क: इस अध्यादेश को सरकार ने कांट्रैक्ट फार्मिंग के मसले पर लागू किया है. इससे खेती का जोखिम कम होगा और किसानों की आय में सुधार होगा. समानता के आधार पर किसान प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम होगा. किसानों की आधुनिक तकनीक और बेहतर इनपुट्स तक पहुंच सुनिश्चित होगी. मतलब यह है कि इसके तहत कांट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा. जिसमें बड़ी-बड़ी कंपनियां किसी खास उत्पाद के लिए किसान से कांट्रैक्ट करेंगी. उसका दाम पहले से तय हो जाएगा. इससे अच्छा दाम न मिलने की समस्या खत्म हो जाएगी.

किसानों का तर्क: अन्नदाताओं के लिए काम करने वाले संगठनों और कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस अध्यादेश के बाद किसान अपने ही खेत में सिर्फ मजदूर बनकर रह जाएगा. केंद्र सरकार पश्चिमी देशों के खेती का मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है. कांट्रैक्ट फार्मिंग में कंपनियां किसानों का शोषण करती हैं. उनके उत्पाद को खराब बताकर रिजेक्ट कर देती हैं.

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तो क्या खत्म हो जाएगी एमएसपी?


एक्ट में बदलाव: Essential Commodity Act 1955 में संशोधन

सरकार का तर्क: देश में ज्‍यादातर कृषि उत्पाद सरप्‍लस हैं, इसके बावजूद कोल्‍ड स्‍टोरेज और प्रोसेसिंग के अभाव में किसान अपनी उपज का उचित मूल्‍य पाने में असमर्थ रहे हैं. क्‍योंकि आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम की तलवार लटकती रहती थी. ऐसे में जब भी जल्दी खराब हो जाने वाली कृषि उपज की बंपर पैदावार होती है, तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था.

इसलिए आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम में संशोधन करके अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस एक्‍ट से बाहर किया गया है. इसके साथ ही व्यापारियों द्वारा इन कृषि उत्पादों की एक लिमिट से अधिक स्टोरेज पर लगी रोक हट गई है. जब सरकार को जरूरत महसूस होगी तो वो फिर से पुरानी व्यवस्था लागू कर देगी.

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किसानों का तर्क: एक्ट में संशोधन बड़ी कंपनियों और बड़े व्यापारियों के हित में किया गया है. ये कंपनियां और सुपर मार्केट सस्ते दाम पर उपज खरीदकर अपने बड़े-बड़े गोदामों में उसका भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे.

पहले व्यापारी किसानों से उनकी उपज को औने-पौने दाम में खरीदकर पहले उसका भंडारण कर लेते थे. बाद में उसकी कमी बताकर कालाबाजारी करते थे. उसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया था. जिसके तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक थी. लेकिन अब इसमें संशोधन करके सरकार ने उन्हें कालाबाजारी करने की खुली छूट दे दी है.
ब्लॉगर के बारे में
ओम प्रकाश

ओम प्रकाश

लगभग दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. इस समय नेटवर्क-18 में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. खेती-किसानी और राजनीतिक खबरों पर पकड़ है. दैनिक भास्कर से कॅरियर की शुरुआत. अमर उजाला में फरीदाबाद और गुरुग्राम के ब्यूरो चीफ का पद संभाल चुके हैं.

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First published: August 21, 2020, 2:56 PM IST
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