कोल्हान: झारखंड में क्यों हो रही अलग देश की मांग, कौन कर रहा 30 हजार सिपाहियों की भर्ती

अभी तक आपने देश में अलग राज्य की मांग ही सुनी होगी. अलग राज्य की अर्से से होती रही मांग के तहत ही झारखंड का गठन हुआ. अब अचरज इस बात पर है कि झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले का एक इलाका अलग कोल्हान देश की मांग करने लगा है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 25, 2022, 4:52 PM IST
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कोल्हान: झारखंड में क्यों हो रही अलग देश की मांग, कौन कर रहा 30 हजार सिपाहियों की भर्ती
झारखंड में काफी लंबे अरसे से कोल्हान देश की मांग उठती रही है.

अभी तक आपने देश में अलग राज्य की मांग सुनी होगी. अलग राज्य की अर्से से होती रही मांग के तहत ही झारखंड का गठन हुआ. अब अचरज इस बात पर है कि झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले का एक इलाका अलग कोल्हान देश की मांग करने लगा है. हालांकि यह मांग नयी नहीं है. इसका बीजोरापण 30 मार्च 1980 को ही हो गया था. सच कहें तो अंग्रेजों ने वर्षों पहले इसकी बुनियाद रखी थी. बहरहाल 30 मार्च 1980 को अल सुबह चाईबासा की सड़कों पर उस इलाके के आदिवासी समाज के लोगों का महा जुटान हुआ. दोपहर होते-होते मंगलाहाट में हजारों लोगों का जमावड़ा लग गया. ये हो आदिवासी समाज के लोग थे. बड़ी रैली हुई और अलग कोल्हान देश की मांग का शंखनाद किया गया. यहां के हो आदिवासियों को लकड़ा कोल भी कहते हैं.


समय-समय पर होती रही अलग देश की मांग

उसके बाद से समय-समय पर कोल्हान अलग देश की मांग उठती रही है. अलग कोल्हान देश की मांग करने वालों का नेतृत्व करने वालों में रामू बिरवा प्रमुख था, जिसने खुद को कोल्हान का राष्ट्रपति भी घोषित कर दिया था. वह लगातार कोल्हान को अलग देश बनाने की मांग करता था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा, जहां बाद में उसकी जेल में ही मौत हो गई. रामू बिरवा के साथी केसी हेंब्रम को भी देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद मामला ठंडा पड़ गया और पुलिस-प्रशासन भी निश्चिंत था.


जानकारी के बावजूद कोई अलर्ट नहीं

केसी हेंब्रम हाल तक जेल में ही था. कुछ ही महीने पहले वह जेल से जमानत पर बाहर आया है. उसके बाद से कोल्हान अलग देश की गतिविधियां फिर से उसने शुरू कर दीं. इस नयी गतिविधि के बारे में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को कोल्हान इस्टेट गवर्नमेंट के उत्तराधिकारी बतौर खेवटदार आनंद चातार ने अगस्त 2020 में एक पत्र लिखा. पत्र की प्रतिलिपि झारखंड के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भी भेजी गयी थी. पत्र में लिखा था कि कोल्हान इस्टेट क्षेत्र में विल्किनसन रूल्स के तहत मुंडा-मानकी स्वशासन विधि व्यवस्था कायम है. इसके तहत कोल्हान के बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने की शुरुआत की गयी है. इसलिए मंत्रालय झारखंड सरकार को यह जानकारी दे दे कि कोल्हान क्षेत्र में वह बेरोजगारों को रोजगार देना बंद कर दे. आश्चर्य कि इस पत्र के बावजूद प्रशासन अलर्ट नहीं हुआ. राज्य की बात छोड़ भी दें तो केंद्र सरकार ने भी इस पत्र की अनदेखी की.


बहाली प्रक्रिया से साजिश का भांडा फूटा

इसका भांडा तब फूटा, जब रविवार (23 जनवरी 2022) को पश्चिमी सिंहभूम जिला में कोल्हान गवर्नमेंट इस्टेट के नाम से कोल्हान की रक्षा के लिए एक गांव लादुरबासा में युवकों की सुरक्षा बल के रूप में बहाली की प्रक्रिया चल रही थी. युवाओं को नियुक्ति पत्र भी बांटा जा रहा था, जिसमें नौकरी की मियाद 40 साल रखी गयी थी. 30 हजार सिपाहियों की भर्ती होनी थी. साथ में 10 हजार शिक्षक भी बहाल किये जाने थे. बहाली के लिए आवेदन फार्म की कीमत 50 रुपये रखी गयी थी, लेकिन बेरोजगारी का आलम यह था कि गांवों में ये फार्म 500 रुपये तक बिक रहे थे. नियुक्ति के लिए युवाओं का हुजूम उमड़ रहा था. युवा भी भ्रम में थे. उन्हें लग रहा था कि नियुक्ति की यह कवायद झारखंड सरकार ने शुरू की है. नियुक्ति पत्र मिलने के 6 महीने बाद नौकरी दी जानी थी और 70 हजार रुपये मासिक वेतन का वादा किया जा रहा था. इतना ही नहीं, ड्यूटी के दौरान मौत होने पर आश्रित को 50 लाख मुआवजे का प्रावधान भी रखा गया था. लादुरबासा गांव में बाजाप्ता फार्म बेचने और नियुक्ति पत्र देने के काउंटर भी बनाये गये थे.


गिरफ्तारी के विरोध में ताने पर हमला





रेवड़ी की तरह बंड रही नौकरी के लिए आसपास के गांवों से हजारों युवकों का हुजूम रविवार को उमड़ पड़ा था. बाद में जब पुलिस को इसकी भनक मिली तो आनन-फानन अधिकारी पहुंचे और नौकरी बांट रहे 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें जैसे ही थाने लाया गया, आसपास के गांवों के हजारों लोग पारंपरिक हथियारों से लैस होकर थाने पहुंचे और थाने को घेर लिया. एनएच 65 को घंटों जाम कर दिया गया. पुलिस ने पहले समझाने की कोशिश की. बाद में बल प्रयोग कर उन्हें भगाया. थाने पर हमला करने के आरोप में 17 लोग गिरफ्तार किये गये हैं.


कोल्हान इलाके के बारे में जान लें

1980 में अलग कोल्हान देश की मांग जब शुरू हुई तो इसका नेतृत्व कोल्हान रक्षा संघ के नेता नारायण जोनको, क्राइस्ट आनंद टोप्पनो और कृष्ण चंद्र हेंब्रम (केसी हेंब्रम) कर रहे थे. ये लोग 1837 के विल्किनसन रूल का हवाला दे रहे थे. इनका कहना था कि कोल्हान इलाके पर भारत का कोई अधिकार ही नहीं बनता है. ब्रिटेन की सत्ता के प्रति वे अपनी आस्था जता रहे थे. कोल्हान कभी अविभाजित बिहार का प्रमंडल हुआ करता था. इसके अंतर्गत दो जिले- पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम आते थे. सिंहभूम के इन दोनों जिलों से काट कर बने सरायकेला खरसावां जिले का भी कुछ हिस्सा कोल्हान में है.


जानिए विल्किनसन रूल के बारे में

अंग्रेजों के शासन काल में सर थामस विल्किंसन साउथ वेस्ट फ्रंटियर एजेंसी (एसडब्लूएफए) के प्रमुख हुआ करते थे. उन्होंने सैन्य सहायता से कोल विद्रोह को दबाया था. कोल्हान इलाके के 620 गांवों के मुंडाओं (प्रधान) को ब्रितानी सेना के समक्ष आत्मसमर्पण करने को मजबूर होना पड़ा. तब मुंडाओं ने कोल विद्रोह को अपने नेतृत्व में उफान पर पहुंचा दिया था. अपनी कूटनीतिक चाल से सर विल्किनसन ने साल 1837 में ‘कोल्हान सेपरेट इस्टेट’ की घोषणा कर चाईबासा को उसका मुख्यालय बना दिया. लोगों को अपने वश में करने के इरादे से विल्किनसन ने इस इलाके में पहले से चली आ रही मुंडा-मानकी स्वशासन व्यवस्था को लागू करवा दिया. इसे ही विल्किनसन रूल कहा जाता है, जिसे आधार बना कर अलग कोल्हान देश की मांग की जाती रही है. इस रूल के तहत सिविल मामलों के निपटारे का अधिकार मुंडाओं को मिला तो आपराधिक मामलों के निष्पादन के लिए मानकी को अधिकृत किया गया.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ओमप्रकाश अश्क

ओमप्रकाश अश्क

प्रभात खबर, हिंदुस्तान और राष्ट्रीय सहारा में संपादक रहे. खांटी भोजपुरी अंचल सीवान के मूल निवासी अश्क जी को बिहार, बंगाल, असम और झारखंड के अखबारों में चार दशक तक हिंदी पत्रकारिता के बाद भी भोजपुरी के मिठास ने बांधे रखा. अब रांची में रह कर लेखन सृजन कर रहे हैं.

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First published: January 25, 2022, 4:49 PM IST
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