मंडी किसी प्रकृति, खेत या किसान को नहीं जानती

सरकार ने नए कानून बनाकर आलू, प्याज जैसी सब्जियों को आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी से हटा दिया है. वहीं किसान अपना सामान अब खुले बाज़ार में कहीं भी बेच सकते हैं. इस बात को लेकर भी एक कानून पारित हो गया. हम इसके विस्तार में नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि उसके विशेषज्ञ दूसरे हैं. जिनके पास उसका अलग-अलग आंकड़ें औऱ आकलन हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 1, 2020, 1:49 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
मंडी किसी प्रकृति, खेत या किसान को नहीं जानती
नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों में आक्रोश है.
मराठी लघु फिल्म मंडी एक प्याज की खेती करने वाले किसान की कहानी बयान करती है. सच्ची घटना पर बनी फिल्म की शुरूआत एक किसान से होती है. जो एक छोटे लोडिंग ट्रक में अपनी खेत से निकली प्याज को भरकर मंडी में बेचने ले जा रहा होता है. जब वो जा रहा होता है तो उसकी पत्नी उसे कुछ पैसे देती है. जो उसने कहीं से बचा कर रखे थे. ट्क में किसान का बच्चा गन्या भी जाना चाहता है, उसका किसान पिता मना करता है लेकिन वो फिर भी बगैर बताए ट्रक में पीछे चढ़ जाता है.

पूरे रास्ते भर, हरे भरे पहाड़, और खूबसूरत रास्तों के मज़े लेते हुए गन्या अपने किसान पिता के साथ मंडी पहुंचता है. उसे बगैर बताए आ जाने पर पिता से डांट पड़ती है. फिर दोनों मंडी में सामान खरीदने वाले आढ़तिये के पास पहुंचते हैं. वो उनकी प्याज को तोलता है. जिसका कुल वज़न 10 क्विंटल है. आढ़तिया 50 पैसे प्रतिकिलो के हिसाब से प्याज़ के दाम लगाता है.

किसान लगभग रोने को हो आता है. आढ़तिया थोड़ी दया दिखाते हुए दाम 60 पैसे कर देता है. इस तरह 10 क्विंटल प्याज के दाम 600 रूपए बनते हैं. जब मंडी की पावती बनती है तो उसमें मंडी टेक्स, ट्रक का किराया जैसे तमाम खर्चे लगाए जाते हैं जो कुल मिलाकर 815 रूपए होते हैं. यानि किसान को अपनी प्याज वहां देने के एवज में 215 रूपए देने हैं. किसान एक बार को फैसला लेता है कि उसे वहां प्याज नहीं बेचना है. तो आढ़तिया उसे कहता है कि नहीं बेचेगा तो उसे 815 रूपए देने होंगे.


इस तरह वो केवल 215 रूपए देकर बच जाएगा. लाचार किसान अपनी बीवी के दिए हुए पैसे देकर प्याज रख कर बाहर आ रहा होता है. उसे उदास देखकर उसका बेटा कहता है कि वो हेलीकॉप्टर अगली फसल पर ले लेगा, उसे परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. किसान अपने बेटे की तरफ देखता है औऱ मंडी के दरवाज़े पर बैठ कर रोने लगता है. बेटा उसे देखता है औऱ फिर दौड़ कर अंदर जाता है. और वहां पड़ी हुई प्याज़ उछालने लगता है औऱ चिल्लाता जाता है. सारी प्याज ले लो. फिल्म के अंत में एक रसीद दिखाई जाती है. जो काटेगांव के किसान विक्रम कोल्हे की है जिसे अपनी प्याज मंडी में बेचने के लिए 343 रूपए देने पड़े थे.
बीते दिनों खबर आई कि प्याज आलू जैसी सब्जियों को आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी से हटा दिया गया है. वहीं किसान अपना सामान अब खुले बाज़ार में कहीं भी बेच सकते हैं. इस बात को लेकर भी एक कानून पारित हो गया. हम इसके विस्तार में नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि उसके विशेषज्ञ दूसरे हैं. जिनके पास उसका अलग-अलग आंकड़ें औऱ आकलन हैं. हम इस पर भी चर्चा नहीं करना चाहते हैं कि निम्नतम समर्थन मूल्य को लेकर वर्तमान सरकार का कहना की उसे हटाया नहीं जाएगा, हालांकि वो कानून में लिखित तौर पर कभी नहीं रहा है. इस वक्तव्य के पीछे का क्या गणित है. क्योंकि उसे समझाने वाले विशेषज्ञ उसे अपने अपने तरीके से समझा भी रहे हैं.

किसान को हमारी ही तरह कानून कितना समझ आ रहा है ये भी अलग विषय है. लेकिन ये बात तो ज़रूर की जानी चाहिए कि कानून अक्सर मदर इंडिया के सुक्खी लाला के बही की तरह क्यों होते हैं जिसे बिरजू कभी भी नहीं समझ पाता है. किसान तो बस उस राधा की तरह है जो अपना पिछला भूल कर अगले की तैयारी में जुट जाती है. भारत का एक गांव इस बात की जीती जागती मिसाल बना है.


बात एक ऐसे गांव की करते हैं. जो भारत की सूखे इलाकों में आता है. जहां पानी की मार रहती थी. वहां पर मौजूद इस गांव ने पहले तो अपनी दम पर अपने गांव को पानी से लबरेज कर दिया. आज इस गांव में भूमिगत पानी का स्तर 20-25 फीट पर मौजूद है. जो बांदा जैसे जिले में कल्पना से परे थे. बांदा जिले के महुआ ब्लॉक में एक गांव है जखनी. जिसे बीते दिनों अपने अथक प्रयासों की वजह से जलगांव का दर्जा मिला. जल मंत्री से लेकर नीति आयोग तक सभी ने गांव के प्रयासों को सराहा औऱ गांव के म़ॉडल- ‘खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़’, को भारत भर के गांव में लागू करने को कहा. इसी गांव के निवासी उमाशंकर पांडेय उन लोगों में से हैं जो जल बचाने की इस प्रक्रिया को पिछले 15 सालों से भी ज्यादा वक्त से बिना रुके कर रहे हैं. इसी का नतीजा है कि जहां एक तरफ दुनियाभर में प्याज की हाहाकार मची हुई थी उसी दौरान गांव में प्याज की बंपर पैदावार हुई.
बांदा के 2615 की आबादी वाले गांव के कुल 250 किसानों में से 40 किसानों से 2000 क्विंटल प्याज की पैदावार कर दी. किसान अपनी फसल को लॉक़डॉउन की वजह से दिल्ली या लखनऊ नहीं ले जा सके. चूंकि किसानों के पास प्याज के उचित संग्रहण की गांव में या आसपास सुविधा उपलब्ध नहीं थी. इसलिए उन्हें अपनी प्याज औने पौने दामों में 12-13 रूपए किलो बेचना पड़ी. यानि उन्हें पिछले साल की पैदावार की तुलना में इस साल प्रतिकिलोग्राम 5 रुपए का घाटा सहना पड़ा.


जखनी में प्याज का ऊगना इसलिए अहम है क्योंकि बुंदलेखंड में आमतौर पर प्याज नहीं उगाई जाती है. दरअसल प्याज की फसल के लिए अच्छी रोशनी, औऱ भरपूर मात्रा में पानी की ज़रूरत होती है. और बुंदलेखंड में भरपूर पानी के बारे में सोचना, कल्पना से परे की बात हो जाती है. 2018 में ही बुंदलेखंड भारत की उन क्षेत्रों में था जो पानी के अभाव से जूझ रहा था औऱ यहां सामान्य से 9 फीसद कम बारिश हुई थी.

दो साल पहले यहां के तात्कालीन कलेक्टर हीरालाल ने गांव के जल संरक्षण के प्रयासो को देखते हुए, गांव के किसानों की बेहतरी के लिए एक उल्लेखनीय काम किया. और किसानों को प्रशिक्षण के लिए कन्नौज के केंद्र भेंजा जहां इज़राइल से आए विशेषज्ञों ने उन्हें जल संरक्षण औऱ फसल की उचित पैदावार का प्रशिक्षण दिया. ज्ञात रहे इज़राइल जल संरक्षण के मामले में दुनिया में अव्वल देश है.

कलेक्टर हीरालाल का मानना था कि किसान, अदरक, प्याज, चना जैसी फसल जिन्हें वो घरेलू इस्तेमाल के लिए उगाते हैं उन्हें कमाई का ज़रिए बनाए. गांव के निवासी औऱ जखनी गांव में जल चेतना लाने वाले उमाशंकर पांडेय कहते हैं कि किसानों के पास उत्पन्न करने की काबीलियत होती है. बस उन्हें सरकार का समर्थन चाहिए. अगर सरकार से उतना ही मिल जाए तो किसान अपनी दम पर पूरे भारत को आत्मनिर्भर बना सकते हैं. उन्हें फसलों के लिए उन इलाकों में भी सही इंतजाम करना चाहिए जहां उनकी पैदावार कम होती है. जखनी में फसल रखने का उचित इंतजाम नहीं होने की वजह से किसानों को घाटा सहना पड़ा और देश के दूसरे इलाके प्याज की कमी से जूझ रहे हैं. जबकि उचित इंतजाम से इन दोनों बातों को दूर किया जा सकता था.

हालांकि इस इलाके में 10 संग्रहण केंद्र बनाने की इजाजत मिली थी लेकिन उनमें से चार ही बन पाए. और वैज्ञानिक तरीके से फसल के संग्रहण की बजाए किसानों को पारंपरिक तरीके पर जाना पड़ा जिसकी वजह से जो नुकसान 1-2 फीसद पर सिमट सकता था वो ब़ड़कर 12-15 फीसद पहुंच गया.


इसे एक आशाभरी सोच ही कही जा सकती है कि जखनी के किसान इसके बावजूद निरुत्साहित नहीं है. अगले साल और कई किसान प्याज की फसल उगाने के इच्छुक हैं. शायद यही जीवटता है जो किसान को बनाए हुई है. शायद वो समर्थन मूल्य जैसी बातों से पार पा चुका है. वो समझ चुका है कि मंडी किसी भी तरह की प्रकृति, खेत, या किसान को मानती या जानती ही नहीं है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: October 1, 2020, 1:46 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर