एनिमल फार्मिंग और ग्लोबल वार्मिंग

ब्राजील (Brazil) जैसे देश जिस तरह से मवेशी उत्पादन या यूं कहें जानवरों की खेती के मामले में खुद को अग्रणी रखने की ज़िद में अमेज़न को खत्म करने पर उतारू हैं, अमेरिका लगातार सूखा झेलने के बावजूद टेक्सास में घास के मैदानों को बढ़ावा दे रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 12, 2020, 1:20 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
एनिमल फार्मिंग और ग्लोबल वार्मिंग
सांकेतिक तस्वीर
नई दिल्ली. एक गरीब किसान है उसैफ, वो अपने बैल कन्नन को बहुत प्यार करता है.. उसके लिए वो कोई बैल नहीं बल्कि उनके परिवार का सदस्य है. लेकिन सामाजिक ताकतों और शोषण के नए तरीकों के आगे उसैफ की आर्थिक हालत खराब हो जाती है. और हालात उसे तोड़ कर रख देते हैं. उसे अपनी बेटी की शादी के खर्च और उसके लिए दहेज जुटाने के लिए अपने धान के खेत गिरवी रखने पड़ते हैं और मवेशी बेचने पड़ते हैं. एक दिन नौबत ऐसी आती है कि उसके परिवार के सदस्य उस पर कन्नन को बेचने का दबाव डालते हैं. उसैफ परिवार के दबाव के चलते, कन्नन को शहर बेचने के लिए जाता है. वहां नगर निगम की इमारत के बाहर जानवरों के संहार से जुड़ा वो कुछ ऐसा देखता है कि हैरान रह जाता है. वो कन्नन को लेकर घर लौट आता है. घऱ पर उसे अपनी पत्नी और बेटी की खरीखोटी सुननी पड़ती है. लेकिन वो फिर भी खुश होता है कि कन्नन को वो उस इमारत में छोड़ कर नहीं आया. ये कहानी है शब्धिकुन्ना कालप्पा नाम की एक लघु फिल्म की. फिल्म में कन्नन को लेकर जाना औऱ वापस लाना दोनों ही हालात में हम कहानी में इंसान की मासूमियत का प्रदर्शन करते हैं.

ये मासूमियत कभी सही भी होती है औऱ गलत भी. जैसे हमने जानवरों को पालने को लेकर खुद के लिए जो प्रचार किया है, वो ये दर्शाता है कि हम इंसान तो हर जिंदगी का भला चाहते हैं. इसलिए जब कोई मोहल्ले में कुत्ते को खाना खिला रहा होता है तो हम उसकी सराहना करने से नहीं चूकते हैं. इसी बात का दूसरा पहलू ये है कि जानवरों को मार कर खाना जहां एक आहार श्रंखला का हिस्सा हो सकता है है, लेकिन उसे खाने के लिए पालना, और इस कदर पालना कि एक तरह से उसकी फार्मिंग (Animal Farming) यानि खेती करने लगना हमारी दरिंदगी को प्रदर्शित करता है.

हम जब भी जानवरों से जुड़ी बातें करते हैं, कोई कहानी कहते हैं, कोई फिल्म रचते हैं तो या तो हमारे सामने हाथी मेरा साथी, शब्धिकुन्ना कालप्पा जैसी इंसान और जानवरों के रिश्ते दिखाती फिल्में होती हैं या फिर जल्लीकट्टू (Jallikattu) जैसा दरिंदगी का प्रदर्शन करता सिनेमा होता है. लेकिन जानवरों को पालने को लेकर या उनकी फार्मिंग को लेकर एक पहूल और है जिसके बारे में हम जानते नहीं हैं क्योंकि हमसे छिपाया भी जाता है. अगर आपसे कहें कि जानवरों की फार्मिंग से सिर्फ आपकी इंसानियत पर असर नहीं पड़ रहा है बल्कि पर्यावरण पर भी असर पड़ रहा है. एनिमल फार्मिंग या जानवरों को पालने और मारने का एक बात से सीधा नाता है. वो है ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming).

जी हां आपने सही सुना. आज पूरी दुनिया मे वैश्विक तापमान को लेकर दुनिया में लगातार चिंतन औऱ चिंता नज़र आ रही है. सरकारें कार्बन उत्सर्जन को लेकर तमाम विकल्प तलाशने की बात कर रहे हैं. वैकल्पिक ऊर्जा को अपनाने की बात की जा रही है. लेकिन इन तमाम बातों में एक बात को बहुत धीरे से, आसानी से औऱ चुपके से गुम कर दिया जा रहा है. वो बात है मीट औऱ डेयरी उद्योग , ये उद्योग अकेला जितना ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित कर रहे हैं वो दुनियाभर के ट्रांसपोर्ट सिस्टम के बराबर है. इसके साथ ही जिन मवेशियों को उत्पाद बना कर उद्योग स्थापित किया गया है, उनकी पाचन क्रिया से अच्छी खासी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है. पाचन तंत्र से निकली मीथेन गैस गाड़ियों से निकली कार्बन से 86 गुना ज्यादा घातक होती है.
एक हैमबर्गर बराबर दो महीने का नहाना
इसके साथ ही प्राकृतिक गैस के उत्पादन में अकेले अमेरिका (America) में जहां हर साल 10 हज़ार करोड़ गैलन पानी खर्च हो जाता है वहीं अगर इसकी तुलना एनिमल फार्मिंग यानि पशुपालन से किया जाए तो यहीं मात्रा 34 लाख करोड़ गैलन हो जाती है. इसकी सीधी सादी वजह है, दुनियाभर में जिस तरह से पुशपालन किया जा रहा है. उनके लिए लगातार जंगल को काटकर घास के मैदान बनाए जा रहे हैं. और मवेशी जो अनाज खाते हैं उसका वॉटर फुट प्रिंट बहुत ज्यादा होता है.

हैरानी की बात ये है कि यही मोटा अनाज जो इंसानों के लिए बेहतर माना जाता था, उसे इंसानो ने अपनी थाली से बाहर निकाल दिया. औऱ मवेशियों को वही अनाज खिला कर, हम मवेशियों को ही खा रहे हैं. यानि अमेरिका और यूरोप जैसे देश जो एक हैमबर्गर खाते हैं उसमें कोई इंसान दो महीने तक नहा सकता है. मजेदार बात ये है कि दुनिय़ाभर में पानी की बर्बादी को लेकर लगातार काम किया जा रहा है. जल संऱक्षण (Water Conservation) के लिए पानी के लीकेज से लेकर शॉवर नहीं लेना, फ्लश बार बार नहीं करना जैसे पता नहीं कितने तरीकों को बताया जाता है . लेकिन ये एक बर्गर के उत्पादन के आगे टिकता ही नहीं है. एक बर्गर बराबर 660 गैलन पानी यानि ये पानी अगर एक बार बहा तो आपके घऱ नहीं पूरी कॉलोनी को गीला कर दे.पशु उत्पादन औऱ मौसम में बदलाव
मौसम बदलाव पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की मानें तो मानव जनित मौसम बदलाव में 51 फीसद हिस्सा पशु उत्पादन का है. यही नहीं मवेशियों को खाने के लिए पैदा करने का मतलब है दुनियाभर के पानी का 30 फीसद हिस्से का उपभोग, धरती की करीब 45 फीसद ज़मीन का अधिग्रहण, यही नहीं धरती के फेफड़े कहे जाने वाले अमेज़न के जंगलों का 91 फीसद का खत्म होना (चारागाह बनाने में लग रहा है). इसी तरह का काम हम समुद्र में मछिलियों के साथ कर रहे हैं. हर साल जितनी मछलियां समुद्र से निकाली जाती है उसकी मात्रा को इस तरह समझा जा सकता है, जितनी मछलियां हर साल पकड़ी जा रही हैं अगर उसी मात्रा में धरती पर मौजूद जानवर चाहें फिर को कोई सा भी जानवर हो, उसे पकड़ा जाए तो अगले साल धरती पर जानवर नहीं बचेगा.

घास के मैदान औऱ घमासान
मवेशियों के उत्पादन के लिए जगह, घास के मैदान यानि चारागाह को अगर आंक़ड़ों में समझें तो जो बात निकल कर आती है उसे जानकर आपका मुंह खुला का खुला रह जाएगा. 4500 एकड़ ज़मीन से करीब 37 हज़ार किलो मीट का उत्पादन होता है. यानि अगर हम नियमित मीट का उपभोग करने वाली एक संख्या के साथ इस आंकड़े का हिसाब लगाएंगे तो हमें समझ आएगा कि इतनी मात्रा को पैदा करने के लिए धऱती बहुत ज्यादा छोटी है. अगर अब दूध के बारे में सोचें तो ये बात पता नहीं कहां रुकेगी. एक गाय या भैंस रोज़ाना 50 से 70 किलो चारा खाती है. जो हफ्ते का 20 टन हो जाता है. सोचिए दुनियाभर में कितने मवेशी और कितना चारा लग रहा है. जिसके लिए लगातार जंगलों को काट कर घास का मैदान बनाया जा रहा है.

मीट खाने वालों की तादाद जिस तेजी से बढ़ रही है और जिस तरह से मीट को रोज़ाना के खाने में ज़रूरी बताया जा रहा है. उसके पीछे एक वजह है दाम. मवेशी उत्पादन करने वाले मवेशी को जिस दाम में बेच रहे हैं, वो उसकी लागत से काफी कम है. दरअसल उसमें वो उस कीमत को नहीं जोड़ रहे हैं जो समाज पर थोपी जा रही है, जैसे स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या, पर्यावरण को नुकसान की कीमत, नीली क्रांति के नाम पर दी जाने वाली सब्सिडी, अगर इन सभी कीमतों को जोड़ कर मीट को बेचा जाए तो उसको खाने वाले के बीच में आसानी से संतुलन पैदा हो सकता है. क्योंकि इसके बाद मीट का दाम बहुत बढ़ जाएगा. लेकिन सरकार नीली क्रांति को जिस तरह से बढ़ावा दे रही है, ब्राजील जैसे देश जिस तरह से मवेशी उत्पादन या यूं कहें जानवरों की खेती के मामले में खुद को अग्रणी रखने की ज़िद में अमेज़न को खत्म करने पर उतारू हैं, अमेरिका लगातार सूखा झेलने के बावजूद टेक्सास में घास के मैदानों को बढ़ावा दे रहा है उससे समझ आता है कि सरकार सिर्फ सूखा मुनाफा देख रही है, और इसमें कोई दो राय नहीं है खेती जब तक पेट भरने के लिए होती है तब तक सुखद होती है लेकिन जैसे ही वो मन भरने के लिए होने लगती है तब उसका अंत दुखद ही होता है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: December 12, 2020, 1:20 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर