जानवर खाए जाते हैं या भगाए जाते हैं

लॉकडाउन ने जिस तरह से लाखों मज़दूरों को बेघर कर दिया और वो अपना सामान अपने कंधो पर टांगे सड़कों पर निकल पड़े हैं. उसी तरह ये जानवर भी तो बेघर हुए हैं. इनके पास भी खाने को नहीं है और सबसे बड़ी बात हमने तो इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 17, 2020, 3:11 PM IST
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जानवर खाए जाते हैं या भगाए जाते हैं
जानवर भी तो बेघर हुए हैं. इनके पास भी खाने को नहीं है और सबसे बड़ी बात हमने तो इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है.
जुमांजी फिल्म एक लूडोनुमा खेल पर आधारित है. ये खेल दो बच्चों को अपने घर में पड़े कबाड़ में मिलता है. खेल का नियम ये है कि खिलाड़ी सिर्फ पांसे फेंक सकता है लेकिन उसके आए नंबर पर गोटियां खुद ब खुद चलती है और उसका परिणाम लूडो के बीच वाले हिस्से में लिखा हुआ आ जाता है और जो परिणाम लिख कर आता है वो सच में होने लगता है. खेल का एक नियम ये भी है कि खेल को पूरा करना होगा क्योंकि अगर उसे बीच में छोड़ दिया तो जो जिस हालत में होगा, या जैसी परिस्थितियां पैदा हुई होंगी, वो जस की तस रह जाएगी. खेल आगे बढ़ता है और एक जगह एक खिलाड़ी जब अपनी चाल चलता है तो परिणाम में लिखा हुआ आता है. कि अब वो सब आएंगे जो तुमसे दूर हैं और अचानक तमाम तरह के जानवर घर के अंदर घुसने लगते हैं.

पूरी दुनिया में एक नीरवता पसर गई है
जानवर वैसे ही आ रहे हैं जैसे वो जंगल में टहल रहे हैं. उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं है लेकिन वो बस लगातार विचर रहे हैं. छोटे और शाकाहारी जानवरों के बाद मांसाहारी जीव आते हैं और फिर शेर भी आता है. देखते ही देखते पूरा शहर एक जंगल में तब्दील हो जाता है. अब लॉकडाउन काल का एक सच्चा किस्सा सुनाता हूं, फिर आगे की बात करेंगें. लॉकडाउन से पूरी दुनिया में एक नीरवता पसर गई है. घर से बाहर निकलो या घर में रहो, एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है. इक्का दुक्का लोग, कंधे पर झोला टांगे घर का सामान ले जाने के लिए निकले हुए दिख रहे थे. दोपहर का वक्त था इसलिए सन्नाटे मे इज़ाफा दोगुना था. ऐसे में बहुत ज़ोर से शोर सुनाई दिया.

इंसानी शोर डराने लगा है
अचानकर उठा ये शोर डराने वाले भी था और हैरान भी कर रहा था. कई दिनों से चिड़ियों का कलरव सुनते हुए कानों को अब इंसानी शोर डराने लगा है. हालांकि हम सभी जानते हैं कि शोर फिर से एक ना एक दिन उठना ही है. ये शांति हमें ये भी बताती है कि हम इंसान कितना शोर करते हैं, बल्कि यूं कहना चाहिए कि हम शोर ही करते हैं क्योकिं पक्षियों की लगातार उठती आवाज़ आपको परेशान नहीं कर रही है और शायद किसी को भी परेशान नहीं कर रही है जबकि हम इसे सुनने के आदी नहीं है और जिसे सुनने के हम आदी है वो अब हमें शोर महसूस हो रहा है.

शोर की तरफ बढ़ा दिया
खैर अचानक उठे शोर से उठी आशंकाओं ने मुझे शोर की तरफ बढ़ा दिया. जैसे जैसे में करीब पहुंचता जा रहा था शोर और घबराहट बढ़ती जा रही थी. अचानक जो दृश्य मेरे सामने था उसने मुझे अंदर तक हिला दिया था. कॉलोनी के अंदर एक मैदाननुमा जगह जो किसी इस्तेमाल में नहीं आती है और जहां अक्सर गाए घूमती रहती हैं. उसी मैदाननुमा जगह की दीवार पर करीब 50 लोग खड़े हुए चिल्ला रहे थे. उनकी आवाज़ ने अचानक मुझे हिलाकर रख दिया और मैं कोरोना का डर और तमाम सामाजिक दूरी के भय को त्यागते हुए उस ओर भागा. दीवार के उस पार एक गाय के पैरों में एक औरत पड़ी हुई थी. गाय के खुरों ने उसे लहुलुहान कर दिया था. लोग उस गाय को पत्थर मार रहे थे. लेकिन वो गाय वहां से हिल नहीं रही थी बल्कि लगातार उस औऱत पर अपना थूथन लगा कर उसे देख रही थी.एक आदमी ने गाय को धकेला 
एक नज़र से ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपने शिकार की जिंदगी को जांच रहा हो ( जानवर अपने शिकार की मौत का अंदाज़ा ऐसे ही लगाते हैं, हमने तमाम किताबों, कहानियों, फिल्मों और वैज्ञानिक धारावाहिकों में यही मीमांसा तो देखी है). उसकी हर बार की हरकत उसके पैरों में पड़ी औरत को ओर मारती जा रही थी. बाहर खड़ी भीड़ अब अंदर जा चुकी थी, किसी के हाथ में डंडा था, किसी के हाथ में सीढ़ी थी. कोई पत्थर बरसा रहा था. पचास लोग मिलकर एक गाय को संभाल नहीं पा रहे थे. ये वही गाय थी जिसका दूध अकेले एक आदमी निकाल लेता है. गाय ने पैर उठाया, वो उस औरत के मुंह पर पड़ने वाला था, मेंरी आंखे बंद औऱ धड़कने तेज हो चुकी थीं और मेरे मुंह से एक घुटी हुई चीख निकली की बचालो मर जाएगी. अचानक एक आदमी ने गाय को धकेला और दूसरे ने नीचे से औरत को खींचा और बाहर निकाल लाए.

लाखों मज़दूरों को बेघर कर दिया
अभी मेरे लिए इससे बड़ी हैरानी की बात बाकी थी. जब वहां जमा भीड़ उस औरत को बाहर निकाल रही थी, तब वो गाय उसके पीछे नहीं भागी, जब वो गाय ( जैसा हमें दिख रहा था) उस औरत को अपने पैरों के तले दबाये हुए थी तब उसके चेहरे में किसी तरह की दरिंदगी, कोई गुस्से का भाव नज़र नहीं आ रहा था. हो सकता है वो उस औरत से बात करने की कोशिश कर रही हो. लॉकडाउन ने जिस तरह से लाखों मज़दूरों को बेघर कर दिया और वो अपना सामान अपने कंधो पर टांगे सड़कों पर निकल पड़े हैं. उसी तरह ये जानवर भी तो बेघर हुए हैं. इनके पास भी खाने को नहीं है और सबसे बड़ी बात हमने तो इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है.

कब से हुई शुरुआत
धरती पर मानव ने जब उत्पादन की नींव रखी, उसके बाद से ही इंसानों और जानवरों के रिश्तों में एक बड़ा बदलाव आया. सामान्य इतिहास की नज़र से देखें तो ये बदलाव हरित क्रांति के बाद आया. इसके बाद ही बड़े स्तर पर प्रजातियां विलुप्त होना शुरू हुईं. इस प्रक्रिया ने पूरी धरती के जीवन को बदल कर रख दिया और वनोपज पर जीने वाले ने उत्पादन के गणित को समझा और जानवर पालतू बनाए जाने लगे. इसकी शुरुआत जब हुई तो जानवरों की ज्यादा प्रजातियां इसमें शामिल नहीं थी.

करीब 20 तरह की स्तनपाई और पक्षियों की प्रजातियों को ही इंसानों ने पालतू बनाना शुरू किया था बाकि सभी जंगल में रहने वाली या इंसानी भाषा में कहें तो जंगली ही थी. लेकिन धीरे धीरे सदियां गुज़रती गईं और बाकी रह गई जंगली प्रजातियों की जगह, उनका भोजन, और वो खुद हमें सालने लगे, हमने या तो उन्हें खत्म कर दिया या उन्हें अपना पालतू बना लिया. आज लगभग 90 फीसद जानवरों की प्रजातियां किसी ना किसी तरह से इंसानी गुलाम है. कम से कम हम ऐसा ही मान कर चलते हैं.

मानव की इस प्रवृत्ति को 'अपने-अपने राम' उपन्यास में लेखक भगवान सिंह अलग नज़रिये से गढ़ते हैं. एक जगह वाल्मीकि का उल्लेख आता है और वो तमाम तरह की कहानियों में उनको डाकू बताए जाने के लेकर एक तर्क देते हैं. दरअसल ये पूरी पुस्तक ही इस तर्क पर चलती है कि सारी कहानियां सभ्यता और असभ्यता के बीच गढ़ी गई है. भगवान सिंह किसी राक्षस के अस्तित्व से इंकार करते हैं. किताब बताती है कि किस तरह वाल्मीकि एक आदिवासी थे और जंगलों में रहते थे, जब सभ्यता के नाम पर उनके जंगलों को काटा जाने लगा, वहां पर खेती बाड़ी की जाने लगी तो उन्होंने विरोध किया.

इसी विरोध ने आगे चलकर उन्हें कहानियों में डाकू बना दिया. भगवान सिंह अपनी पुस्तक भारतीय परंपरा की खोज में बताते हैं कि राक्षस (वनसंपदा कि रक्षा करने वाले कटिबद्ध जन) और असुर (उत्पादन के विरोधी), दनु या दानव (मिल बांट कर खाने और उदार भाव से किसी अपरिचित को भी देने वाले ), इन कृषिकर्मियों की निंदा इनको देव और ब्राह्मण ( दोनों का अर्थ था, आग लगानेवाला) कहकर करते थे.

कितने जीव थे और हमने क्या किया
अगर आप बच्चों की फिल्में देखें, कोई परीकथा पढ़ें या नार्निया जैसा कुछ आपकी नज़र के सामने आए तो आप पाएंगे कि धरती पर कितने तरह के जीव हैं. नार्निया का शेर आसलान और उसके साथी जानवरों की संख्या मनुष्यों से कई गुना अधिक है. बच्चें कहानियों में फिल्मों मे जिन जानवरों को विचरते हुए पाते हैं. वही जानवर उन्हें हकीकत की दुनिया में या तो नदारद मिलते हैं या फिर वो सिर्फ चिड़ियाघर में उन्हें देख पाते हैं या फिर अभ्यारण्य रूपी बाड़ों में कैद जानवर उन्हें नज़र आते हैं वो भी यदा कदा.

युवाल नोआ हरारी अपनी किताब ह्यूमन ड्यूस में बताते हैं कि एक वक्त जिस जर्मनी में भेड़िए बहुतायत में पाए जाते थे, आज वहां पर 50 लाख पालतू कुत्ते हैं जबकि सब मिला जुलाकर पूरी धरती पर महज़ 2 लाख भेड़िए ही रह गए हैं. वहीं अगर पूरी धरती पर पालतू कुत्तों की संख्या पर नज़र डालें तो ये करीब 40 करोड़ के आस पास होगी. वहीं दुनिया में केवल 40 हज़ार शेर ही रह गए हैं लेकिन पालतू बिल्लियों की संख्या 60 करोड़ के आस पास है.

अगर अफ्रीकन भैंसे की बात करें तो इसकी संख्या जहां 9 लाख के करीब है, वहीं गायों की संख्या 150 करोड़ हो चुकी है.अगर चिकन की गणना करें तो इनकी संख्या 2000 करोड़ के करीब बैठेगी. नोवाल बताते है कि 1980 में यूरोपीय जंगली पक्षियों की संख्या 200 करोड़ के आसपास थी जो 2009 तक घटकर 160 करोड़ रह गई है. इसी दौरान यूरोप ने मीट और अंडे के लिए 190 करोड़ चिकन का उत्पादन किया. पिछले 70 हज़ार सालों में इंसानों ने धरती की पूरी इकोल़ॉजी को बदल कर रख दिया है.

हमने उन्हें पाला नहीं ढाला भी
बात सिर्फ पालने तक ही सीमित नहीं रही है, हमने जानवरों को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश भी की और कई जगह पर हम सफल हुए और कई जगह पर जानवर असफल हुआ. सबसे पहले सफलता की बात करते हैं. इंसान ने जानवरों को जो अपने हिसाब से ढालने में सफलता हासिल की उसका सबसे बड़ा उदाहरण कुत्ता है. कुत्ते को इंसान ने जेनेटिक तौर पर इतनी बार बदला है कि अब ये कह पाना मुश्किल है कि जो कुत्ता आपको दिख रहा है वो असली है भी या नहीं. यहां तक कि कुत्ते की टेढ़ी पूंछ को लेकर कहावत कही जाती है, उसे भी हमने ही टेढ़ा किया है.

कुत्तों की जो प्रजातियां आज मौजूद हैं इनमें से 80 फीसद 150 साल पहले तक थे ही नहीं. मानवता की कुत्तों को बेहतर बनाने की इस कोशिश ने इतिहास में सबसे लंबी चलने वाले (SELECTIVE BREEDING/प्रजनन के लिए प्रजाति चुनने) के प्रयोग को जन्म दिया. दरअसल SELECTIVE BREEDING एक प्रजाति को बेहतरीन बनाने की कोशिश है. मसलन DOGO ARGENTINO ये वो प्रजाति है जिसे इंसानों ने अपने खेतों को नुकसान कर रहे सुअरों को मात देने के लिए तैयार किया.

कुछ खूबियां इस कुत्ते में थी जैसे ये तेज दौड़ सकता था. लेकिन ये मुकाबला नहीं कर सकता था तो दूसरी जाति के कुत्तें जिनमें क्रूरता की खूबी थी उसके साथ इस जाति को जोड़ना शुरू किया गया और करीब 25 साल के बाद जो जाति पैदा हुई वो इंसानों के काम के लायक थी. ऐसा माना जाता है कि जब शिकारी एक जगह बसने लगे, तो उन्होंने कूड़ा करना शुरू किया ,कुछ का मानना है कि भेड़िए मुफ्त के खाने को मना नहीं कर सके और उन्होंने वहां घूमना शुरू कर दिया, इस तरह वक्त के साथ कूड़े ने शिकार की जगह ले ली और भेड़िए का शिकार करना धीरे धीरे कम होता गया वो ज्यादा पहुंच में होते गए और खाने के लिए काम करने को तैयार रहते थे. कुत्तो में तब्दीली की कहानी बहुत लंबी है किसी लेख में उस पर विस्तार से चर्चा करेंगे. अभी इसी के दूसरे पहलू पर बात करते हैं.

इंसानो के बदलाव में जो जानवर असफल हुए उसका सबसे बड़ा उदाहरण मेड काउ डिजीज है जिसकी वजह से लाखों गायों को जिंदा जला दिया गया था. दरअसल यूरोपीय देशों में गायों के मांस के उत्पादन को लेकर जब भूख बढ़ी तो विक्रेताओं को लगा कि गायों से ज्यादा मांस निकाला जाए और गाय को ज्यादा मांसल बनाने के लिए उनके चारे में सुअर की आंतें और दूसरे अवशेष मिलाए गए. पहले तो गायों ने इन्हें खाने से इनकार किया लेकिन फिर भूख सब करवा देती है. आखिर गाय इस चारे को खाने को मजबूर हुई और नतीजा ये निकला कि गायों के शरीर के अंदर सुअर में पाया जाने वाला सूक्ष्मजीव पहुंच गया और आहार श्रृंखला के तहत ये इंसानो के शरीर मे प्रवेश कर गया, इसने इंसानों पर विपरीत असर किया और जब इसकी पड़ताल हुई तो दोषी गायों को जिंदा जला दिया गया.

वेगन बनना और हकीकत को समझने में अंतर
इन दिनों एक शब्द चला है, वेगन. ये इंसानों का एक नया तरीका है जिसमें वो जानवरों के किसी भी उत्पाद का सेवन नहीं करते हैं यानी दूध और उसके बने किसी उत्पाद का सेवन नहीं करना और ज़ाहिर है मांस का सेवन भी नहीं करना. सुनने और समझने में ये काम बेहद मानवीय लगता है. लेकिन यहां भी दिक्कत इस बात की है कि हमने जिन जानवरों को पालतू बना दिया है. उसका क्या होगा. दरअसर इंसान एक बेहद स्वार्थी तबका है जो हर काम मकसद के लिए करता है. उत्पादन के लिए जिन जानवरों की फार्मिंग की जा रही है, सोचिए हमने जानवरों के लिए फार्मिंग यानी खेती शब्द का प्रयोग किया है. जिसका अर्थ ही उत्पादन है.

वो जानवर जिस जगह रहते हैं और उनका वहां रहना उनके मरने से ज्यादा दुखदायी होता है. वहां रह रहे जानवर को एक उत्पाद समझ कर पाला जा रहा है. अब वेगन ये कह रहा है कि हमें उनके उत्पाद नहीं उपयोग में लाना चाहिए, अच्छी बात है लेकिन जो संख्या ऊपर दी है, उन जानवरों का क्या होगा. इसके बारे में किसी के पास कोई जवाब नहीं है. यहां ज़रूरी ये नहीं है कि आहार श्रृंखला में क्या चल रहा है. वो दरअसल एक प्रक्रिया है और वो खत्म होते होते होगी. यहां जानवरों के उत्पाद का सेवन करने से ज्यादा ज़रूरी ये समझना है कि उनके उत्पादन पर कैसे रोक लगे.

एक तबका ये कह सकता है कि उनके उत्पाद इस्तेमाल नहीं होंगे तो उनका उत्पादन रुक जाएगा तो फिर सवाल यही आता है कि इतने सारे जानवरों का बोझ क्या इंसान बगैर किसी मकसद के वहन करेगा. उत्तर प्रदेश में अन्ना गाय( ऐसी गाय जो दूध देना बंद कर देती हैं) की हालत किसी से छिपी नहीं है. हिंदी फिल्म का एक गाना इसके लिए शायद कुछ सही बैठता हो पंछी से छुड़ा कर उसका घर, तुम अपने घर में ले आए, ये प्यार का पिंजरा मन भाया, तुम मन ही मन में मुस्काए, जब प्यार हुआ इस पिंजरे से तो कहने लगे आज़ाद रहो.’
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: May 16, 2020, 6:53 PM IST
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