क्या हम मास हिस्टीरिया के शिकार होते जा रहे हैं ?

पालघर में तीन लोगों को भीड़ ने डंडों से पीट पीट कर मार डाला. वहां पुलिस भी मौजूद थी. वायरल वीडियो के हिसाब से पुलिस ने तीनों लोगों को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया, हालांकि पुलिस का अपना कथन है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 21, 2020, 6:02 PM IST
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क्या हम मास हिस्टीरिया के शिकार होते जा रहे हैं ?
फैक्टरी के मजदूरों ने दोनों युवक की कि जमकर पिटाई
मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में हाथीपावा पर्वत पर हजारों आदिवासी एक साथ मौजूद थे. वो एक अच्छा काम करने के लिए जुटे थे. वह सभी मिलकर पहाड़ों पर कंटूर ट्रेंचेज खोद कर उस पहाड़ में जल संरक्षण की तैयारी कर रहे थे. लगातार ऊपर चलते ड्रोन, पांच साल के बच्चे से लेकर 70 साल तक के बूढ़ों की मेहनत कैमरे में कैद कर रहे थे. एक अद्भुत नज़ारा दिखाई पड़ रहा था. एक साथ ताल बनाती गेती, कुदाल एक संगीत पैदा कर रही थी. तभी इस संगीत में व्यवधान पैदा हुआ और पहाड़ के ऊपर एक शोर सुनाई दिया, जो पहाड़ के नीचे से यात्रा करते हुए ऊपर आ रहा था. शोर धीरे-धीरे ऊपर बढ़ रहा था. आदिवासियों का झुंड लगातार चिल्ला रहा था. शोर बढ़ता जा रहा था और साथ में मन में एक आशंका घिरती जा रही थी. कोई अनहोनी का दृश्य मन के पटल पर तैर रहा था.

खरगोश ने हिम्मत जुटाई
तमाम तरह के अनुमान महज आधे मिनिट में दिमाग में आ चुके थे और शोर लगातार कानों के करीब आता जा रहा था. जब शोर एकदम करीब पहुंचा तो स्थिति साफ हो चुकी थी. हजारों आदिवासियों के घेरे को तोड़ता हुआ एक जंगली खरगोश ऊपर की तरफ अपनी जान बचाता हुआ आ रहा था. आदिवासी उसे शोर करते हुए डरा रहे थे और पकड़ने की जी तोड़ कोशिश में लगे हुए थे. पहाड़ के सिरे तक पहुंचते-पहुंचते शायद उसकी हिम्मत पस्त होने लगी थी. एक युवा के मजबूत पंजों में उसका पिछला हिस्सा आ चुका था. लेकिन फिर खरगोश ने हिम्मत जुटाई और युवा हथेलियों से फिसल कर कहीं जंगल में खो गया.

100 लोगों से ऊपर गिरफ्तारी भी हो चुकी है
अब एक मिनिट के लिए आंख बंद कीजिए और उस खरगोश की जगह किसी इंसान को रख कर देख लीजिए, भीड़ का किसी को मारने का आनंद समझ आ जाएगा. पालघर में तीन लोगों को भीड़ ने डंडों से पीट पीट कर मार डाला. वहां पुलिस भी मौजूद थी. वायरल वीडियो के हिसाब से पुलिस ने तीनों लोगों को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया, हालांकि पुलिस का अपना कथन है. महाराष्ट्र सरकार ने इस घटना पर जांच के आदेश भी दे दिए हैं और 100 लोगों से ऊपर गिरफ्तारी भी हो चुकी है. लेकिन राजनीति भी एक लिंचिंग के लिए तैयार रहती है तो वो करने में लग गई है.

आग लगाने और आनंद उठाने का काम
सोशल मीडिया पर एक अलग तरह की लिंचिंग चल रही है जो इस पूरे मुद्दे को किसी भी तरह से वो रंग देना चाहती है जिसके लिए वो अक्सर बिलबिलाती रहती है. गुरुवार को हुई इस घटना के बाद जब दो दिन बाद कहीं से तैरता हुआ ये वीडियो सामने आया तो फिर से दो धड़े बंट गए और एक धड़ा फिर से दूसरे धड़े से कहने लगा कि अब वो चुप क्यों है. दूसरे धड़े की तरह से अभी बयानबाजियों का सिलसिला शुरू नहीं हुआ है. लेकिन क्या ऐसा पहली बार हुआ, हम सभी जानते हैं कि ऐसा नहीं है. ये वो घटना है जो बीते दिनों लगातार बढ़ी है और हमने खुद इसे बढ़ाने, इसमें आग लगाने और आनंद उठाने का काम किया है. सोशल मीडिया पर पालघर की घटना के बाद तुरंत नए वीडियो बन कर तैयार हो गए. ये वो लोग थे जो शायद ऐसी घटनाओं का इंतजार करते रहते हैं.मौत पर ही मुखर
वीडियों में लगातार बताया जा रहा है कि जिन्हें मारा गया उन्हें धर्म विशेष का होने की वजह से मारा गया. जिनकी चुप्पी पर सवाल खड़ा किया जा रहा है उसके पीछे भी यही मकसद है कि वो किसी धर्म विशेष में होने वाली मौत पर ही मुखर होते हैं. यहां खास बात ये है कि न इस घटना पर और न ही इससे पहले घटी किसी भी घटना पर, किसी के मुंह से ये बात नहीं निकली की किसी इंसान की जान गई. कहीं वो जान किसी धर्म की थी, कहीं वो जान किसी कौम की थी.

मास हिस्टीरिया की शिकार जनता
अपने आसपास के माहौल में पनप रही अफवाहों की जद में आकर लोग एक्यूट साइकोसिस (मेनिया) के घेरे में आ जाते हैं और मास हिस्टीरिया का शिकार हो रहे हैं. अक्सर कोई अंजान डर एक से दूसरे में पहुंचकर अफवाहों को बढ़ावा देता है. एक्यूट साइकोसिस से पीड़ित व्यक्ति के दिमाग में डोपामीन हॉर्मोन की मात्रा सामान्य से काफी बढ़ जाती है, जिससे उसकी सोच, व्यवहार, बोलचाल आदि का संतुलन बिगड़ जाता है. पीड़ित इसमें सामान्य से अधिक गतिविधियां करने लगता है. मास हिस्टीरिया को ऐसी जगहों पर होने की आशंका ज्यादा बनी रहती है जहां परिवार या समाज में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़ाव देखने को मिलता है.

मास साइकोजेनिक इलनेस
इस तरह की घटनाओं को "मास हिस्टिरिया" या "जन भ्रम" के उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. 'हिस्टीरिया ' को हम बेलगाम भावनाओं की अनुभूति के तौर पर समझ सकते हैं और जब यही अनूभूति सामूहिक स्तर पर होती है तो इसे 'मास हिस्टीरिया' कहा जाता है. आगे चलकर आधुनिक मनोविज्ञान में इसे बदलकर ‘मास साइकोजेनिक इलनेस’ का नाम दिया जिसका मतलब होता है ऐसी शारीरिक बीमारी जो सामूहिक स्तर पर मानसिक वजहों से पैदा होती है. इसे समझने के लिए इसके पीछे की वजह को समझना जरूरी है. मास साइकोजेनिक इलनेस की घटनाओं की वजह असल स्थितियों में पाई जाती है. इन स्थितियों से जो डर पैदा होता है उसे लोग बढ़ा चढ़ाकर एक दूसरे के साथ मिलकर चर्चा में ले आते हैं.

मन में मौत के विचार उग्र होने लगते हैं
मसलन मान लीजिए कहीं का पानी पीने लायक नहीं रहा और उसमें से बदबू आने लग जाए, लोग उस बदबू से एक अंदाजा लगाते हैं कि ये पानी पीने से हम मर सकते हैं और वह डर जाते हैं फिर बगैर पता किए कि उस बदबू का कारण क्या है वो अपने तर्क लगाना शुरू कर देते हैं और धीरे-धीरे डर से उनके मन में मौत के विचार उग्र होने लगते हैं. फिर जब ऐसी अफवाएं चारों ओर फैल जाती है, तब लोग उत्तेजित हो जाते हैं और उनकी भावनाएं बेकाबू हो जाती है. वे गुस्से और डर के आवेश में आ जाते हैं और उनके सोचने समझने की ताकत कमजोर पड़ जाती है.

पत्तों पर सफेद रंग के निशान
बीते दिनों कुछ ऐसी घटनाएं हुई है जिनमें निराधार अफवाहों के दम पर किसी समूह में तहलका मचा हो और ऐसे हालातों में भी जो दुर्घटना की आशंका होती है, वह असल दुर्घटना के सामान प्रभावशाली हो जाती है. नब्बे के दशक में अचानक एक अफवाह फैली की एक नागिन जिसके पति को किसी आदमी ने मार दिया है वो उसका बदला लेने निकल पड़ी है और वो जहां से गुजरती है वहां के पत्तों पर उसके निशान छूट जाते हैं. लोगों को पत्तों पर सफेद रंग के निशान दिखने भी लगे. हर कोई हाथ में पत्ता लिए उसमें नागिन के निशान दिखाने लगा. गोया वही शख्स है जिसने उस नागिन के पति की हत्या की है. बाद में मालूम चला कि बरसात के मौसम में एक कीड़े के कारण पत्तों पर इस तरह के निशान बन जाते हैं.

बच्चा चुराने के संदेह में बुरी तरह पीटा
असम के कर्वी आंगलाग जिले में कुछ अज्ञात लोगों ने दो लोगों को बच्चा चुराने के संदेह में पीट-पीट कर मार डाला. पुलिस के मुताबिक दोनों युवक आंगलाग के एक पिकनिक स्थल से लौट रहे थे, जब गांव वालों ने उनकी कार को रोका और उन्हें खींच कर बाहर निकाल लिया. गांव वालों ने उन्हें बच्चा चुराने के संदेह में बुरी तरह पीटा. एक वायरल वीडियो के मुताबिक वो लोगों से खुद के बेगुनाह होने की गुहार कर रह थे लेकिन उन्मादी भीड़ कुछ भी सुनने को राजी नहीं हुई और बुरी तरह घायल अवस्था में उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई.

बंधे हुए आदमी की रॉड से पिटाई
अभी कुछ दिनों पहले एक वीडियो चारों तरफ वायरल हुआ जिसमें एक आदमी को बांध कर बुरी तरह पीटा जा रहा था. तीस सेकंड के इस वीडियो में पहले एक आदमी ने बंधे हुए आदमी की रॉड से पिटाई की फिर दूसरे ने उससे वो रॉड ले ली. बीते दिनों एक खबर छपी थी कि एक मोबाइल चोर को पब्लिक ने पकड़कर इतना पीटा की अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में ही उसकी मौत हो गई. इससे पहले दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में 31 साल के ई-रिक्शा चालक रवीन्द्र कुमार की तब कुछ युवाओं ने पीट पीट कर हत्या कर दी जब उसने दो लोगों को खुले मे पेशाब करने से रोका था.

शंका में पीट पीट कर मार डाला
पब्लिक लिंचिग के नाम से चर्चित यह शब्द भारत में 28 सितंबर 2015 को चर्चा में आया था. जब दादरी की जनता ने अखलाक को गौमांस होने की शंका में पीट पीट कर मार डाला और उसके बेटे को भी बुरी तरह घायल कर दिया था. इससे पहले और इसके बाद पब्लिक लिंचिंग के कई मामले भारत के अलग अलग हिस्सों में देखे गए हैं. ये घटनाएं ऐसे ही किसी सामूहिक गुस्से को दिखाती हैं जो व्हाट्सएप की एक फेक खबर से इस हद तक बढ़ गया कि लोगों ने किसी की जान लेने में गुरेज नहीं किया.

लोगों को अचानक ऑक्सीजन मिल जाता है
पालघर में हुई घटना के पीछे भी किसी अफवाह के फैलने का अंदेशा ही बताया जा रहा है क्योंकि उस इलाके में बीते दिनों बच्चा चोरी, मानव अंगो की तस्करी जैसे अपराध लगातार बढ़ गए हैं इसलिए इस तरह की घटना घटी. बीते कुछ सालों में ये एक नई सामान्य बात है जहां जनता बड़ी ही आसानी से लोगों को पीट कर मारने में कोई संकोच नहीं कर रही है और लगातार इन घटनाओं को धर्म का लबादा ओढ़ाने वाले भी बुरी तरह से सक्रिय हैं. आप अगर विश्लेषण करें तो पाएंगे कि आपके प्रोफाइल पर भी ऐसी किसी घटना के होते ही इस तरह के लोगों को अचानक ऑक्सीजन मिल जाता है और ये अपनी जी जान झोंक देते हैं. इन्हें इस तरह के काम में कोई आनंद मिलता है या वो भी किसी मनोवैज्ञानिक विकार के शिकार हैं ये अलग विषय है. फिलहाल तो ये समझा जा सकता है कि हम लगातार भीड़ बनते जा रहे हैं.

एक पूरे परिवार को मार डाला था
ये वही भीड़ है जिसने कई बार लोगों को इसी तरह मारा है. ये वही भीड़ है जिसके किसी घोषणा कर दिए जाने के बाद गांव भर के लोगों ने मिलकर एक पूरे परिवार को मार डाला था. ये वही भीड़ है जिसने पहले जब किसी को मारा था तो उस समय इसे क्रिया पर प्रतिक्रिया कहा गया था. ये वही भीड़ है जिसके उन्माद को किसी भी वजह से समर्थन मिला था, ये वही भीड़ है जो एक मास हिस्टीरिया की शिकार है या बनाई जा रही है, जो हमें लगातार चेतावनी दे रही है कि मैं लादेन हूं. अगर कोई देश मुझे खड़ा कर रहा है तो वो इस मुगालते में न रहे कि मैं उसका कुछ नहीं बिगाड़ूंगी जिस दिन मुझे मौका मिला मैं उसे भी लीलने से नहीं चूकूंगी क्योंकि अब मुझे गुस्सा कम और मजा ज्यादा आने लगा है.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: April 21, 2020, 6:00 PM IST
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