संजना संवरना तो आदमियों का काम है

पहले नर ही सौंदर्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता था. यहां तक की प्राचीन ग्रीक साम्राज्य में मुख्य धारा के फैशन में महिलाओं को फैशन के लिए अपूर्ण माना जाता था. जबकि पुरुषों को सौंदर्य के प्रतीक के तौर पर देखा जाता था.

Source: News18Hindi Last updated on: July 26, 2020, 4:38 PM IST
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संजना संवरना तो आदमियों का काम है
मेल ग्रूमिंग (फोटो साभार- pexels/cottonbro)
टॉम एंड जैरी वैसे तो एक चूहे जैरी औऱ बिल्ले टॉम की पकड़म पकड़ाई पर आधारित कार्टून श्रंखला है. लेकिन इसमें बीच में कहानी का एक हिस्सा और होता है जब टॉम को एक बिल्ली नज़र आती है. और वो उसे लुभाने में लग जाता है. जब हम इस बिल्ली को देखते हैं तो पाते हैं कि बिल्ली की बड़ी-बड़ी आंखे हैं. निहायत खूबसूरत पलकें है. होंठो पर लिपस्टिक है. वो पूरी तरह से सजी संवरी हुई है. टॉम हर बार उसे आकर्षित करने की कोशिश करता है. हर बार बिल्ली दूसरे ताकतवर बिल्ले का हाथ थाम कर निकल जाती है.

टॉम एंड जैरी से भी पुरानी कार्टून फिल्म मिकी माउस में मिकी की दोस्त मिनी भी हमेशा सजी संवरी रहती है. उसके मेकअप और जैरी जिस बिल्ली को लुभाना चाहता है दोनों के मेकअप में कोई विशेष अंतर नहीं है. अलबत्ता एक चुहिया है और दूसरी बिल्ली. इसी तरह माशा एंड दे बेयर में भी भालू जिस मादा भालू के सामने प्रेम प्रस्ताव रखता है वो भी हमेशा दूसरे ताकतवर भालू का चुनाव करके चली जाती है. गूफी से लेकर अंकल स्क्रूच तक जितने भी कार्टून किरदार हैं वो जब अपनी जाति की मादा को पसंद करते हैं तो वो किसी औऱ के साथ चली जाती है. इन सभी मादा किरदार को बेहद ही खूबसूरती से दिखाया गया है.
इससे इतर मेडागास्कर की हिप्पो जब अपने साथियों के साथ अमेरिका के चिड़ियाघर से भाग कर अफ्रीका पहुंचती है तो वहां पर उसे एक दूसरा हिप्पो मिलता है जिसका नाम उसके व्यक्तित्व के हिसाब से रखा गया है, ‘मोटो-मोटो’.

‘मोटो-मोटो’ मादा हिप्पो को अपनी तरफ खींचने में सफल हो जाता है, लेकिन ‘मोटो-मोटो’ रोमांटिक बातें नहीं कर सकता है, उसका मकसद सिर्फ मादा हिप्पो को हासिल करना है. ये बात मादा हिप्पो को नागवार गुज़रती है औऱ वो ‘मोटो-मोटो’ को नकार कर अपने बचपन के प्यार ज़िराफ के पास चली जाती है क्योंकि वो उसे दिल से चाहता है.
यहां कुछ बाते ऐसी हैं जो आपको कहानी के तौर पर लुभाती है, जैसे मादा हिप्पो का जिराफ को चुनना, जैसे टॉम से लेकर गूफी तक सभी किरदार जिस मादा की तरफ आकर्षित होते हैं वो सुंदर और सजी संवरी रहती है. सवाल ये उठता है कि क्या वाकई में मादा ( चाहे फिर वो किसी भी प्रजाति की हो) ऐसा ही करती. अगर प्रकृति के नियमों को मानें तो शायद इसका जवाब ना में मिलेगा. लेकिन हम ऐसा होते देखते हैं , हमारे बच्चे इन्ही बातों को देखते हुए बढ़ते हैं क्योंकि इन कहानियों को लिखने वाला इंसान है औऱ इंसान के मुताबिक सजती-संवरती तो महिलाएं हैं. इसलिए वो चाहे टॉम एंड जैरी लिखे या गेम ऑफ थ्रोन्स. उसके ज़हन में औरत की छवि एक जैसी ही उभरती है.

तो फिर सच क्या है
सच इसके उलट होता है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने से पहले हम इस बात की पुष्टि कर लेते हैं औऱ इसे साधारण तरीके से समझते हैं. बरसात का मौसम है और बारिश की बूंदे जैसे ही ज़मीन पर पड़ती है मोर आल्हादित होकर नाचने लगता है. ये बातें साहित्यिक भी हैं और प्राकृतिक भी, दरअसल खूबसूरत पंखों को फैलाने वाला नर होता है. मोरनी के पंख इतने बड़े नहीं होते हैं या यूं कहिए हम जिस सुंदरता का बखान करते रहें है वो नर को मिली है. इसी तरह शेरनी साधारण दिखती है लेकिन शेर की घनी दाढ़ी, बलिष्ठ पुट्ठे, और पतली कमर (जी हां पतली कमर, शेर की कमर पतली होती है) उसे आकर्षक बनाती है. इसी तरह मुर्गे की कलगी उसे आकर्षक बनाती है. ‘हनीक्रीपर’ उष्णकटिंबधीय इलाकों में पाया जाने वाला सांग बर्ड है जिसके पंखों को देखकर आप दूर से पहचान सकते हैं कि कौन सा नर है कौन मादा है. इसी तरह ‘हाउस फिंचेस’ नाम के पक्षी में भी आकर्षक रंग नर को ही मिले हैं. वहीं ‘स्कारलेट रंम्पड टेंगर’ पक्षी में भी सजावट नर में देखने को मिलती है. दरअसल इस दुनिया को रचने वाले ने बहुत की शानदार कलाकारी के साथ सब कुछ रचा है. जहां विपरीत लिंग की तरफ आकर्षण रोमांच तो पैदा करता है लेकिन उसके साथ ही अपनी प्रजाति को बढ़ाने और संभालने के लिए बहुत ही क्रूर हालातों से लड़ते हुए आगे बढ़ना होता है. जहां बच्चे के जन्म के दौरान मादा के ज़हन में सिर्फ एक ही बात होती है कि उसकी संतान यानि ऑफस्प्रिंग में अऩुवांशिक तौर पर अंतर्जातीय और अंत:जातीय संघर्ष करने की कूवत होनी चाहिए. इसलिए वो हमेशा उसी के साथ प्रजनन करना पसंद करती है जो उनकी प्रजाति में ताकतवर हो. इसलिए जानवरों में मादा उसी नर के प्रति आकर्षित होती है जो उजले रंगों से सजा हुआ और ताकतवर हो. पक्षियों में एक गुण और ज़रूरी होता है गाना.चूंकि जानवर पूरी तरह से प्रकृति पर ही निर्भर हैं इसलिए उन्हें ताकतवर नर का चुनाव करने के लिए जो प्रवृत्ति मिली है उसे वो रंगों यानि नर की सजावट से पहचानती है. यही वजह है कि मादा जुगनू नहीं बल्कि नर जुगनू चमकता है. मच्छरों में नर मच्छर भिनभिनाता है, जबकि खून चूसने का काम मादा का है क्योंकि उसे प्रजनन करना है.

चूंकि लगभग सभी जानवरों और पक्षियों में पॉलीगेमी यानि एक से ज्यादा नर के साथ संबंध बनाने की व्यवस्था होती है. इसलिए सभी में नर ही ज्यादा सजे संवरे होते हैं. इस तरह से नर, अपने प्राकतिक जेवरों यानि सींग, पंख, कलगी, बाल, शारीरिक क्षमता, सीटी बजाना या गाना, इन तरीकों से मादा को लुभाते हैं.

विज्ञान औऱ वैज्ञानिकों ने क्या समझा
विकासवाद के जनक डार्विन बताते हैं कि निजी तौर पर संघर्ष करने के लिए जो लक्षण प्राणियों में पाए जाते हैं, वो प्राकृतिक चुनाव की प्रक्रिया के तहत आते हैं. जबकि अपनी प्रजाति की किसी मादा या नर के साथ संबंध स्थापित करने के लिए अपनी ही प्रजाति के दूसरे जीवों के साथ संघर्ष करने की जो प्रक्रिया होती है वो लैंगिक चुनाव कहलाती है. दरअसल लैंगिक चुनाव हमेशा मादा के पास होता हैं वहीं नर को खुद को साबित करना होता है. और खुद को साबित करने के लिए उसके पास कुछ तरीके होते हैं जिसमें दिखना, लड़ना औऱ गाना शामिल होता है.

डार्विन बताते हैं कि पक्षियों के बीच में रंगों को लेकर जो भेद होता है वो ‘सेक्सुअल डाइक्रोमेटिज्म’ कहलाता है. जहां मादा पक्षी आसानी से चमकीले रंगों का चुनाव कर लेती है. दरअसल डाइक्रोमेटिक का अर्थ एक तरह की कलर ब्लाइंडनेस होता है जिसमें प्राणी प्राथमिक तीन रंगो में से केवल दो रंगों को ही पहचान सकता है. सेक्सुअल डाइक्रोमेटिज्म में वो अपने से भड़कीले रंग को चुनता है. खास बात ये है कि मादा को हल्के रंग इसलिए भी मिले हैं क्योंकि उसे बच्चों को जन्म देने के साथ साथ उन्हें पालना भी होता है. और अपने हल्के रंगों की वजह से वो दूसरे शिकारी प्राणियों से खुद की और अपने बच्चों की आसानी से रक्षा कर लेती है. क्योंकि वो आसानी से साथी के रंग को पहचान लेती है. और खुद को छिपा लेती है.
वहीं कुछ शोध ये भी बताती हैं कि नर की सजावट देखकर मादा को ये पता चल जाता है कि नर कितना स्वस्थ है. यहां दिलचस्प बात ये है कि जिन प्रजातियों में नर अंडों का निषेचन यानि देखरेख करते हैं और मादा खाना लाने और अपने इलाके की रक्षा का जिम्मा संभालती है वहां पर मादा ज्यादा आकर्षक होती है मसलन, ‘फैलोरोप्स’, ‘सैंडपाइपर’ और ‘बटन क्वैल’. इसी तरह हॉर्नबिल तो उन पक्षियो में से होता है जो ताउम्र एक ही साथी के साथ रहता है. और यहां तक कि अपना घोंसला भी नहीं छोड़ता है.

फिर औरतें क्यों सजती हैं
दरअसल ये बात पूरी तरह से सच नहीं है या यूं कहना चाहिए कि औरतें सुंदर होना चाहिए या उन्हें सजना संवरना चाहिए, ये एक ऐसा झूठ है जिसे कई सौ सालों से पैतृक व्यवस्था के तहत धीरे-धीरे हमारी सोच में डाला गया. ये प्रक्रिया इतनी सतत रही है कि इसने शारीरिक ही नहीं मानसिक औऱ अऩुवांशिक तौर पर भी इंसानों पर असर किया है. और हमारे वैचारिक सौंदर्य शास्त्र में महिलाएं ही सुंदरता का रूप होती गई, उनकी सुंदरता भगवान की रचना है, वो साहित्य में कविताओं में, उपमा अलंकारो में इस कदर समाहित हुई कि हमने प्रकृति के सौंदर्य शास्त्र की तरफ ध्यान ही नहीं दिया.

खास बात है कि ये बदलाव कुछ सौ सालों की देन है. इससे पहले नर ही सौंदर्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता था. यहां तक की प्राचीन ग्रीक साम्राज्य में मुख्य धारा के फैशन में महिलाओं को फैशन के लिए अपूर्ण माना जाता था. जबकि पुरुषों को सौंदर्य के प्रतीक के तौर पर देखा जाता था.

यही नहीं चाइना के कई प्राचीन राजवंशों में पुरुषों के कपड़े महिलाओं से ज्यादा सजावट भरे और ढंकने वाले होते थे. इनके लिए ‘लोंगियाउंन’, ‘ब्रोकन स्लीव्स’, ‘माउसोलियम’ जैसे शब्द प्रचलित हैं, इससे पता चलता है कि पुरुष जो कपड़े पहनते थे वो ज्यादा फैशनेबन औऱ शरीर को ढंकने वाले होते थे. यहां तक कि अठारंहवीं सदी में फ्रांस के किंग लुइस पंद्रहवे का जिन कपड़ों में पोर्ट्रेट देखने को मिलता है, उसमें वह सर में लंबे बालों की विग, स्टाकिंग्स औऱ हाई हील वाले जूते पहने हुए हैं. वो हाथों में एक लंबी तलवार लिए हुए हैं लेकिन उनके खड़े होना का तरीका किसी ऩृतक की तरह का है. आज के दौर में अगर हम तलवार को अलग हटा दें तो बाकि पूरा रवैया किसी नामर्दी या कायरता की तरह लिया जाएगा. लेकिन उस दौर में लुइस पुरुषत्व का प्रतीक माने जाते थे. यहां तक की अगर हम भारतीय राजाओं के चित्रों पर नज़र डालें तो हम पाएंगे कि उनके शरीर पर जेवरों की सजावट और कपड़े ठीक वैसे ही होते थे जैसे कोई जानवर को प्रकृति सुंदर सींगो या घने बालों से नवाज़ती है.

भारत में तो पहले से ही थी स्वंयवर की प्रथा
प्राचीन भारत में होने वाली स्वंयवर की प्रथा उसी लैंगिक चुनाव को ज़ाहिर करती है जिसका ज़िक्र डार्विन ने विकासवाद के सिद्धांत में किया है. रामायण में राम जी का शिव धनुष तोड़ना सीता को इसलिए आकर्षित करता है क्योंकि राम वहां मौजूद सभी राजाओं में ज्यादा ताकतवर औऱ बलिष्ठ थे. स्वंयवर में महिला उसी पुरुष का चुनाव करती थी, जो उसे आकर्षक औऱ ताकतवर लगता था. यहां तक कि आज भी कई आदिवासी जनजातियों में ये प्रथा कायम है. यही नहीं पुरूष भी महिला को पाने की खातिर जहां खुद को सजाता संवारता था, वहीं अपनी ताकत के बल पर भी उसे अपनी ओऱ आकर्षित करने का प्रयास करता था.

पुरुष प्रभावी सोच ने बदला नजरिया
‘विलेंडडोर्फ’ की ‘वीनस’ एक मूर्ति है जो 2400-2200 बीसीई के दौरान बनाई गई थी. उसमें वीनस यानि रति का प्रतीक महिला जिसे सौंदर्य की देवी माना जाता है, उसकी मूर्ति आज के सौंदर्य शास्त्र से बिल्कुल विपरीत है. उसमें महिला मोटी, बड़े नितंब वाली है. यही नहीं खजुराहो में बनाई गई मूर्तियों की आकृति भी कुछ इसी तरह की मिलती है. जो ये बताती है कि प्रकृति में महिलाओं के सौंदर्य को उनकी प्रजनन क्षमता से देखा गया है. यानि वो महिला जो प्रजनन करने में सहज हो औऱ सेहतमंद है वही महिला सुंदर मानी जाती है. खास बात ये है कि जानवरों में भी यही बात देखी जाती है. क्योंकि हर जीवित प्राणी अपनी संतति यानि ऑफस्प्रिंग को बेहतर बनाना चाहता है. इतिहास बताता है कि फ्रांस की क्रांति से पहले तक सजने संवरने का काम महिलाओं से ज्यादा पुरुष के हिस्से था. या कुछ क्षेत्रों में ये दोनों पर लागू होता था. लेकिन 19 वीं सदी के आते आते. जब पुरूष समाज हावी होने लगा और महिलाओं को सुंदरता का प्रतीक माना जाने लगा. यहां तक कि वक्त के साथ साथ महिला होने का अर्थ सुंदर होना औऱ उपभोग की वस्तु होना बन गया. 1837 में क्वीन विक्टोरिया के रानी बनने के बाद एक बहुत बड़ा बदलाव आया औऱ लंबे ढंके हुए गाउन, पेटीकोट औऱ पूरी तरह से सजी संवरी हुई महिलाएं सुंदर माना जानी लगी. यहां तक कि सोच में ये बदलाव आया कि महिलाओं को घर औऱ बच्चों संभालने तक सीमित करके देखा जाने लगा. आगे चलकर जब 1890 में चार्ल्स गिब्सन ने गिब्सन गर्ल के नाम से एक महिला का रेखाचित्र तैयार किया तो उसे ही सौंदर्य का प्रतीक माना गया. इस चित्र में लड़की का शरीर को बिल्कुल अलग तरह से दिखाया गया था. लड़की दुबली पतली थी और उसके चेहरे का रंग पीला पड़ा हुआ था. आगे चलकर विश्व युद्ध का दौर आते आते तक दुनिया भर में खाने पीने की दिक्कतें बढ़ने लगी औऱ चूंकि महिला युद्ध में शामिल नहीं थी, इसलिए उनकी ज़रूरतों को गैर ज़रूरी समझा गया और उनके खान पान पर ज्यादा राशनिंग हुई. इस तरह से अभाव के चलते महिलाएं दुबली होने लगी और उनका रंग पीला पड़ने लगा. जो आगे चलकर एक फैशन सिंबल बन कर उभरा औऱ ये माना जाने लगा कि महिलाएं दुबली होती है तो सुंदर होती हैं. इस तरह उनके अभाव को उनकी सौंदर्य के साथ जोड़ दिया गया औऱ महिलाओं के शोषण में एक कड़ी और जुड़ गई.

और धीरे धीरे फैशन, सजन संवरना, गोरा दिखना, सब कुछ महिलाओं का काम औऱ उनकी ज़रूरत बन कर रह गया. और प्रकृति ने जो सुंदरता का शास्त्र तैयार किया है इंसान उसके बिल्कुल विपरीत ये मान कर चलने लगा कि ‘इतना हसीन चेहरा, इतनी प्यारी आंखे हैं, आंखों से छलकता प्यार, कुदरत ने बनाया होगा फुरसत से तुझे मेरे यार’.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: July 26, 2020, 4:38 PM IST
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